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वैदेशिक रोजगार पीड़ितों के न्यायसंगत सेवा के लिए प्रो-बोनो कानूनी सेवा अनिवार्य करने की मांग

२२ जेठ, काठमाडौं। वैदेशिक रोजगार के दौरान ठगी का शिकार हुए श्रमिकों और उनके परिवारों को न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए कानूनी पेशेवरों द्वारा प्रदान की जाने वाली नि:शुल्क सेवा (प्रो–बोनो) को अनिवार्य बनाने पर जोर दिया गया है। यह बात अंतर्राष्ट्रीय आप्रवासन संगठन और पिपुल फोरम फर ह्युमन राइट्स के संयुक्त आयोजन में काठमाडौँ में सम्पन्न ‘‘वैदेशिक रोजगार में लगे श्रमिक तथा उनके परिवारों की न्याय तक पहुंच’’ विषयक कार्यशाला में उठाई गई।

कार्यक्रम में प्रस्तुत कार्यपत्र में अधिवक्ता सोमप्रसाद लुइटेल ने बताया कि वैदेशिक रोजगार सम्बन्धी विवादों का निपटारा होने में ५ से १० साल तक का समय लगता है, और जिते मामलों में से केवल लगभग ११ प्रतिशत को क्षतिपूर्ति मिल पाती है। उन्होंने कहा कि कानूनी पेशेवरों को वैदेशिक रोजगार पीड़ितों को नि:शुल्क कानूनी सलाह और सहायता प्रदान करने के लिए आगे आना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘वकील द्वारा समाज को दिया गया योगदान ही प्रो–बोनो सेवा है। अब नेपाल बार काउंसिल को वकीलों के लाइसेंस नवीनीकरण के समय निश्चित अवधि के लिए प्रो–बोनो सेवा को अनिवार्य करना चाहिए।’

पिपुल फोरम ने अब तक ३६ हजार से अधिक वैदेशिक रोजगार पीड़ितों को नि:शुल्क कानूनी सहायता प्रदान की है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य द्वारा प्रदान की जाने वाली कानूनी सहायता और वकीलों द्वारा व्यक्तिगत तौर पर दी जाने वाली प्रो–बोनो सेवा दोनों को एक साथ चलाना आवश्यक है। नेपाल बार एसोसिएशन की उपाध्यक्ष सरस्वती श्रेष्ठ ने बताया कि बार ने ‘‘प्रो–बोनो निर्देशिका २०७५’’ जारी कर सभी ९० बार इकाइयों को सर्कुलर भेज दिया है। उन्होंने बताया, ‘हमने बार कार्यालय में प्रति वर्ष वरिष्ठ अधिवक्ताओं सहित कम से कम पांच नि:शुल्क मामले देखने के लिए प्रोत्साहित किया है, इसके लिए अलग डेस्क और कक्ष की व्यवस्था भी की गई है।’

नेपाल बार काउंसिल के सदस्य और वरिष्ठ अधिवक्ता रवि नारायण खनाल ने प्रो–बोनो सेवा को वकील का मानवीय धर्म बताया। उन्होंने अपनी जन्मदिन के अवसर पर एक मामला नि:शुल्क देखने की ‘‘प्रो–बोनो बर्थडे’’ अवधारणा रखी, तथा विदेशों में रह रहे पीड़ितों के बयानों को तकनीकी माध्यम से लेने की व्यवस्था करने का सुझाव दिया। काठमाडौँ स्कूल ऑफ लॉ के डाक्टर ज्ञानु गौतम ने कानून के छात्रों को अनुसंधान और ड्राफ्टिंग कार्य में संलग्न कर स्थानीय स्तर पर ‘‘लिगल क्लिनिक’’ संचालन पर जोर दिया। आईओएम नेपाल की पूर्णिमा लिम्बुले न्याय की पहुँच नागरिकों का मौलिक अधिकार बताते हुए कहा कि वैदेशिक रोजगार विभाग में दर्ज हजारों शिकायतों में से अत्यल्प ही निष्कर्ष निकले जाने पर चिंता व्यक्त की।

चर्चा में शामिल प्रतिभागियों ने कहा कि स्थानीय स्तर पर गाउँपालिका और नगरपालिका के न्यायिक समितियों के साथ समन्वय बढ़ाकर कानूनी साक्षरता बढ़ाई जानी चाहिए जिससे श्रमिक ठगी से बच सकें और न्याय प्राप्ति की प्रक्रिया सुगम हो। शिकायत प्रक्रिया के संबंध में केवल १५ प्रतिशत पीड़ितों को जानकारी है और प्रमाण के अभाव में मुकदमे हारने की स्थिति बनी रहती है, इसलिए इस क्षेत्र में व्यापक सुधार की आवश्यकता है, यह कार्यशाला का निष्कर्ष रहा।