2 आसार, म्याग्दी। म्याग्दी के सदरमुकाम बेनी बजार के नजदीक जलजला गाउँपालिका-८ लुप्राङ में अंगूर खेती का सफल परीक्षण हुआ है। समुद्र तल से लगभग एक हजार आठ सौ मीटर ऊंचाई पर स्थित लुप्राङ में श्रीहरी कृषि तथा पशुपक्षी फार्म की संचालक ताराकुमारी रेग्मी ने अंगूर खेती का परीक्षण किया है। ‘चार साल पहले भारत से लाकर प्लास्टिक के टनल के अंदर लगाए गए अंगूर के दो पौधों ने उत्पादन देना शुरू कर दिया है,’ उन्होंने बताया, ‘पिछले साल प्रति किलो 450 से 500 रुपए के दाम पर 35 हजार रुपए मूल्य के अंगूर घर से ही बेचने में सफल रहे। इस बार दाने ज्यादा लगे हैं इसलिए उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है।’
नेपाल में सामान्यत: जात के अनुसार 500 से 1500 मीटर की ऊंचाई और 15 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान वाला स्थान अंगूर खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है। इसके लिए दिनभर अच्छी धूप मिलना आवश्यक है। अंगूर के दाने पकने तक यदि बारिश नहीं होती और अंगूर बोटों पर रहते हैं, तो कृषि प्राविधिकों से सलाह लेकर अंगूर खेती का विस्तार करने की योजना है, उन्होंने बताया।
अपने दो बेटों को पढ़ाने के लिए पांच साल बागलुङ बजार में रहने वाली रेग्मी ने घर लौटने के बाद अंगूर, टमाटर और संतरा की खेती के साथ बकरी पालन शुरू किया था। ‘मेरे दोनों बेटे कक्षा पांच तक गांव के ही स्कूल में पढ़े लेकिन स्कूल दूर होने के कारण पांच साल बागलुङ में डेरा बनाकर कक्षा दस तक पढ़ाया,’ ताराकुमारी ने बताया, ‘कक्षा दस उत्तीर्ण करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए दोनों बेटे काठमांडु गए, फिर वे घर लौटे और धान की खेती वाले खेतों में संतरे के पौधे रोपने लगे, तब रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने कहा था कि यह असफलता की दिशा में कदम है।’
देश में ही उद्यमशील बनकर स्वरोजगार, आत्मनिर्भरता और आय अर्जन की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित ताराकुमारी को स्थानीय स्कूल के शिक्षक और उनके पति सुबह, शाम और छुट्टियों में बगान में काम में सहयोग करते हैं। उनके बाग में रसात से लेकर 150 संतरा और नींबू के पेड़ हैं। उन्होंने बताया कि पिछले साल संतरा बिक्री से 4 लाख 80 हजार रुपए की आमदनी हुई। प्लास्टिक टनल के अंदर अंगूर के अलावा टमाटर की खेती भी कर रही हैं। उन्होंने बढ़ते हुए संतरा बगान के भीतर सेम की खेती भी की है। अंगूर गाँव में ही बिकता है जबकि संतरा पोखरा और तरकारी कुश्मा क्षेत्र में उपभोग किया जाता है। कृषि फार्म से वार्षिक 10 से 12 लाख रुपए की बचत देख कर, पहले संतरा लगाने पर आलोचना करने वाले लोग हैरान रह गए। उनके उदाहरण से कई लुप्राङवासियों ने धान, मक्का, कोदो की खेती के विकल्प के रूप में संतरा की खेती शुरू कर दी है।
उनको राष्ट्रिय कृषि आधुनिकीकरण परियोजना, जलजला गाउँपालिका और वृद्धिमुखी उद्यमशीलता रोजगार प्रवर्द्धन कार्यक्रम के तहत तकनीक, पूर्वाधार निर्माण, कौशल आधारित प्रशिक्षण, व्यावसायिक योजना तैयारी, भ्रमण और प्रदर्शनियों की व्यवस्था कर सहयोग दिया गया है। नाग्लिवाङ होते हुए लुप्राङ से जोड़ने वाली सड़क का स्तरोन्नति न होने के कारण उत्पादन को बाजार तक पहुँचाने में समस्या होती है और बंदर भी एक मुख्य समस्या है, कृषक ताराकुमारी ने शिकायत की। इस वर्ष जेठ 12 को आई झड़ी ने खाद्य फसलों, संतरा और तरकारी खेती को नुकसान पहुंचाया है, कृषकों ने अपनी समस्या बताई है।
