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‘पशुबलि समाप्त करने के लिए करुणा और सह-अस्तित्व की अनुभूति आवश्यक है’

५ असार को काठमांडू में स्नैहा’ज केयर और आईपीएफएन नेपाल के सहकार्य से पशुबलि प्रथा समाप्ति के लिए ‘आध्यात्मिक संवाद’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। स्नेहा श्रेष्ठ ने कहा, ‘‘जहां पूजा-आराधना होती है, जहां भक्तिभाव होता है, वहां हत्या और हिंसा होना विडंबना है,’’ साथ ही उन्होंने जोर दिया, ‘‘ऐसी प्रथा अब समाप्त होनी चाहिए।’’ धर्म-परंपरा के नाम पर हो रही पशुबलि प्रथा पर पुनर्विचार आवश्यक है, यह उनका विचार था।

पशुबलि समाप्ति के लिए इस चर्चा में विभिन्न आध्यात्मिक गुरु और जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ सहित अन्य लोगों ने भाग लिया। जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ अरुणा उप्रेती ने पशुबलि को समाज में विद्यमान एक हानिकारक प्रथा बताते हुए समय के अनुसार परिवर्तित करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा, ‘‘पहले सती प्रथा भी ऐसी ही कुरीति मानी जाती थी, आज वह समाप्त हो चुकी है। बलि प्रथा को भी इसी तरह समाप्त करना होगा।’’

आध्यात्मिक गुरु रामचंद्र भंडारी ने बलि के वास्तविक धार्मिक अर्थ को ‘त्याग’ के रूप में स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि धर्मग्रंथों में बलि को हिंसा से जोड़कर नहीं, बल्कि आत्मसंयम, त्याग और सकारात्मक परिवर्तन से जोड़कर व्याख्यायित किया गया है, इसलिए धार्मिक अभ्यास का सही अर्थ समझना आवश्यक है।

कार्यक्रम में उपस्थित आध्यात्मिक गुरुयों ने जीव के प्रति सम्मान, करुणा और अहिंसा की संस्कृत को समाज में और प्रबल बनाने के लिए धार्मिक समुदायों को अग्रणी भूमिका निभाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने धार्मिक विश्वास और सांस्कृतिक प्रथाओं को समय के अनुसार व्याख्या करते हुए मानवता, सहिष्णुता और जीवमैत्री मूल्यों को प्राथमिकता देने पर ज़ोर दिया।