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लाङटाङ यात्रा के अविस्मरणीय पड़ाव

खेल पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए रसुवा के लाङटाङ में दूसरी लाङटाङ ट्रेल रन प्रतियोगिता आयोजित की गई है। बागमती प्रदेश के मुख्यमंत्री इन्द्र बानियाँ, पर्यटन मंत्री सूरज श्रेष्ठ और आर्थिक मामिला मंत्री प्रभात तामाङ ने प्रतियोगिता का उद्घाटन किया। २००९ साल में स्थापित क्यान्जिन की ऐतिहासिक याक चीज़ उद्योग स्थानीय हिमाली अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। ६ असार, काठमाडौँ।

मनुष्य के जीवन में कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं, जो सिर्फ नए स्थान ही नहीं दिखातीं, बल्कि जीवन को नई दृष्टि भी प्रदान करती हैं। हिमालय की गोद में मौजूद लाङटाङ घाटी में मेरी छह दिवसीय यात्रा भी ऐसी ही एक अविस्मरणीय अनुभव रही। प्राकृतिक सुंदरता, चुनौतीपूर्ण पदयात्रा, हिमालयी संस्कृति के साथ मिलन और खेल पर्यटन के उत्साह से भरी यह यात्रा आज भी स्मृति में प्रफुल्लित है। यात्रा की शुरुआत एक सामान्य मुलाकात से हुई। काठमाण्डू के नयाँ बानेश्वर में फ़ोटो पत्रकार भरतबन्धु थापा के साथ चाय पीते हुए उन्होंने अचानक पूछा, “लाङटाङ चलना है?” मैंने झिझक नहीं करी और सहमति दे दी।

पहले दिन स्याफ्रुबेन्सी से बाँसबारी तक: जेठ १९ की सुबह सामाखुसी से हम चार बसों में रसुवा की ओर प्रस्थान किए। खिलाड़ियों, आयोजकों, अधिकारियों, स्वास्थ्यकर्मियों और संवाददाताओं सहित सौ से अधिक प्रतिभागी थे। काठमाण्डू के व्यस्त जीवन को छोड़कर टोखा, नुवाकोट होते हुए रसुवा के स्याफ्रुबेन्सी पहुंचे और फिर पैदल यात्रा शुरू हुई, जो वास्तव में लाङटाङ की परिचायक बनी। मेरा जन्मभूमि जुम्ला के पहाड़ी इलाके में होने के कारण उँच-नीच करते रास्ते नए नहीं थे। इसलिए यात्रा अपेक्षाकृत सुगम थी, पर लंबे समय तक विस्रामदायक काठमाण्डू की जीवनशैली के बाद शरीर को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। चढ़ाई ने शरीर को कठोर परीक्षा में डाला। ऊर्जा तामाङ के नेतृत्व में टोली बाँसबारी की तरफ बढ़ रही थी। शाम तक की कठिन यात्रा से थके जरूर थे, पर मन प्रफुल्लित था। नदी की ठंडक, जंगल की शांति और यात्रा का थकान पहली रात को यादगार बना गई। होटल न होने के कारण संचारकर्मी टेंट में रात बिताने के लिए मजबूर थे।

दूसरे दिन लाङटाङ घाटी की ओर यात्रा और भी कठिन हो गई। सुबह जल्दी से यात्रा आरंभ हुई और रिम्चे, लामा होटल, रिवरसाइड, घोड़ा तबेला होते हुए लाङटाङ उपत्यका की ओर बढ़े। रास्ते में हरे-भरे जंगल, झरने, नदियाँ और हिमालय की दृश्यावलियाँ थकावट को कम कर रही थीं। शाम को लाङटाङ घाटी पहुंचते ही शरीर थका हुआ था, लेकिन मन उत्साहित था। वहाँ २०७२ साल के विनाशकारी भूकंप की पीड़ा को निकट से समझने का अवसर मिला। स्थानीय लोगों ने पुराने लाङटाङ गाँव को हिमस्खलन और हिमताल की भीड़ ने बहा दिए जाने की दुखद कहानी साझा की। सैकड़ों लोगों की जान गई उस घटना को सोचकर मन भारी हो गया, पर फिर भी नए गाँव का पुनर्निर्माण कर आगे बढ़ने का साहस प्रेरणादायक था।