सुपारी और केराउ के बाद तरबूजे के बीज तस्करी का संदेह, 3 अरब की आयात कहां गई?
११ असार, काठमांडू। पिछले वर्षों में तीसरे देशों से सुपारी, केराउ, मिर्च और छोकड़ा आयात कर भारत की ओर तस्करी करने में दलालों का गठजोड़ चलता था।
सरकार ने इन वस्तुओं के आयात पर कोटा प्रणाली लागू करने के बाद तस्करी के रास्ते लगभग बंद हो गए। लेकिन अब फिर से दलालों ने रातोंरात करोड़ों कमाने के लिए एक नई वस्तु को अपना हथियार बना लिया है, ‘खरबूजा-तरबूजे के बीज।’
नेपाल में व्यावसायिक रूप से तरबूजे की खेती कितनी होती है? सरकार के पास इसका कोई खास आंकड़ा नहीं है। राष्ट्रीय आलू, तरकारी तथा मसला विकास केंद्र के अनुसार नेपाल में लगभग २५०० हेक्टेयर क्षेत्र में केवल तरबूजे की खेती होती है और प्रति हेक्टेयर ३० से ४० टन तक उत्पादन होता है।
लेकिन, सीमा शुल्क विभाग के आंकड़े देखें तो चालू आर्थिक वर्ष के ११ महीनों में ‘मेलन सीड’ के नाम पर ३ अरब रुपये से अधिक के लगभग १९ हजार टन खरबूजा-तरबूजे के बीज आयात हुए हैं, जबकि पिछले वर्ष २०८१/८२ की समान अवधि में मात्र १४ करोड़ रुपये से अधिक का ही आयात था।
मसला विकास केंद्र के प्रमुख पदम अधिकारी बताते हैं कि इस समय इस बीज की मांग कम है। नेपाल में खरबूजा-तरबूजे के बीज मुख्यतः विदेश से ही आते हैं। ‘नेपाल में लगभग ९ मीट्रिक टन बीज की खपत होती है, हाइब्रिड बीज लगाने पर ७ मीट्रिक टन काफी होता है,’ अधिकारी ने कहा, ‘अन्यथा ९ मीट्रिक टन तक जरूरत होती है।’
करोड़ों के तरबूजे के बीज आयात में सीमा शुल्क छली (कस्टम स्कैम) की बड़ी भूमिका है, सरकारी अधिकारी स्वयं पुष्टि करते हैं। तारे होटल के खाने, बेकरी, मिठाई, तरकारी के ग्रेवी और पोषक खाद्य पदार्थों में उपयोग के लिए बोरे में रखे बीज (जिसे बाज़ार में मगज या दिउल कहा जाता है) को व्यापारी ‘कृषि बीज’ के नाम से कस्टम पासिंग करा रहे हैं।
रोपाई के लिए तो दूर, खाने के लिए भी नेपाल में इतनी अधिक तरबूजे के बीज की खपत संभव नहीं है। तो फिर अफ़्रीका और मध्य पूर्व के देशों से ये बीज नेपाल क्यों लाए जा रहे हैं?
साफ जवाब है – भारत की तरफ तस्करी।
भारत सरकार ने स्वदेशी उत्पादन की सुरक्षा के लिए विदेशों से आने वाले खरबूजा बीज पर कड़ी पाबंदी लगाई है। इस कारण दलाल नेपाल की खुली सीमा और लचीली कस्टम प्रणाली का फ़ायदा उठा रहे हैं, क्षेत्र के जानकार बताते हैं।
‘कस्टम आंकड़ों में दिखाए गए बीज खेती करने के लिए या खाने के लिए इतने नहीं आते, बोरे से हटाए गए मगज को व्यापारी खेती के बीज बताकर ला रहे हैं,’ एक सरकारी अधिकारी ने कहा, ‘कृषि बीज कहने पर कस्टम ड्यूटी केवल करीब १% लगती है, लगभग फ्री ही होती है। लेकिन अगर इसे खाद्य पदार्थ बताकर लाए तो वैट, कृषि सुधार शुल्क और अन्य कर लगते हैं। व्यवसायी कर से बचने के लिए कस्टम में धोखाधड़ी करते हैं, जिससे आंकड़े भ्रामक दिखते हैं।’
आयात में कितना वृद्धि हुई?
सीमा शुल्क विभाग के आंकड़ों के अनुसार पिछले वित्तीय वर्ष के ११ महीनों में नेपाल ने ५९५.२२ टन (५ लाख ९५ हजार २२२ किलो) खरबूजा-तरबूजे के बीज का आयात किया था, जिसकी राशि केवल १४ करोड़ ३ लाख ४६ हजार रुपये थी।
लेकिन चालू वित्तीय वर्ष के समान अवधि में यह आयात असामान्य रूप से बढ़कर १८,८१३ टन (१ करोड़ ८८ लाख १३ हजार ८ सय ४७ किलो) तक पहुंच गया, जिसका कुल मूल्य ३ अरब ६ करोड़ ५३ लाख ३८ हजार रुपये के करीब है।
पिछले साल के ५९५ हजार किलो से बढ़कर इस साल १ करोड़ ८८ लाख किलो होना मात्रा के आधार पर ३१.६ गुना वृद्धि है। वहीं, मूल्य के आधार पर पिछले साल के १४ करोड़ रुपये का आयात अचानक बढ़कर ३ अरब ६ करोड़ रुपये तक पहुंचने का मतलब २१.८ गुना वृद्धि है।
आयात का मार्ग और गंतव्य भी बदला
इस साल आयात का मार्ग और गंतव्य भी पूरी तरह बदल गए हैं। पिछले वर्ष भारत, ईरान और पाकिस्तान से बीज आते थे, लेकिन इस साल ईरान और पाकिस्तान से आयात शून्य रहा, और भारत से आयात घटकर केवल ५,९०३ किलो रह गया है।
पिछले वर्ष अफगानिस्तान से मात्र २,०४,४०० किलो (३ करोड़ ८४ हजार रुपये) का बीज आया था, जबकि इस साल ६,४४,९४,८२४ किलो (१ अरब ७ करोड़ ६४ लाख ६१ हजार रुपये) की भारी मात्रा में बीज आयात हुआ है।
पिछले वर्ष यूएई से आयात मात्र ७१,७०० किलो था जिसकी कीमत १ करोड़ २७ लाख ८ हजार रुपये थी, जबकि चालू वित्तीय वर्ष में यह मात्रा तेजी से बढ़कर २५,५१,६०४ किलो हो गई है, जिसका मूल्य ४१ करोड़ ६२ लाख ७६ हजार रुपये के करीब है।
यही नहीं, यूएई से इस साल २४ लाख ७९ हजार ९०४ किलो अतिरिक्त बीज लाया गया, जो ४० करोड़ ३५ लाख ६८ हजार रुपये अधिक है।
सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा अफ्रीकी देशों का है। पिछले वर्ष नाइजीरिया और सूडान से कोई तरबूजे का बीज नेपाल नहीं आया था, लेकिन इस वर्ष ये दोनों देश दूसरे और तीसरे सबसे बड़े आयातक बन गए हैं।
चालू वित्तीय वर्ष में नाइजीरिया से ५८ लाख ११ हजार ७२० किलो बीज, जिसकी कीमत ९३ करोड़ १७ लाख ९१ हजार रुपये है, आयात हुआ है।
इसी तरह पिछले वर्ष शून्य आयात वाला सूडान भी इस वर्ष ३४ लाख ७२ हजार ४५३ किलो बीज के साथ ५२ करोड़ ४३ लाख २४ हजार रुपये का मूल्य लेकर आया है। तुर्की से भी इस वर्ष ३,०१,७५० किलो बीज (६ करोड़ ५७ लाख ७७ हजार रुपये) का आयात किया गया है।
चीन और उज्बेकिस्तान में मामूली उतार-चढ़ाव
चीन और उज्बेकिस्तान से आयात में खास बदलाव नहीं हुआ है। पिछले वर्ष चीन से १,२०,०१० किलो बीज आया था, जिसकी कीमत ५ करोड़ ५ लाख ३३ हजार रुपये थी। इस वर्ष मात्रा थोड़ी बढ़कर १,२४,९३५ किलो हुई, लेकिन आयात मूल्य घटकर २ करोड़ ९३ लाख २८ हजार रुपये रह गया है।
उसी तरह उज्बेकिस्तान से पिछले वर्ष ६९,३५० किलो (१ करोड़ २४ लाख ६० हजार रुपये) का आयात हुआ था, जो इस वर्ष बढ़कर ९६,००० किलो (१ करोड़ ६९ लाख २५ हजार रुपये) हो गया है।
आयात बढ़ने में भारत का कनेक्शन
नेपाल में कम खपत होने वाले बीज अफ्रीका, नाइजीरिया और अफगानिस्तान से लाए जाने का मुख्य कारण भारतीय बाजार है। भारत में मिठाई और ड्राई फ्रूट्स के रूप में खरबूजा-तरबूजे के बीज की भारी मांग है। यहां लगभग ६५ हजार टन वार्षिक खपत होती है, जबकि आंतरिक उत्पादन केवल ४० हजार टन ही है।
सस्ती कीमत पर अफ्रीका और चीन से बीज आने पर भारतीय किसान प्रभावित हुए। इसके बाद भारत के विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) ने आयात पर प्रतिबंध लगाना शुरू किया।
भारतीय मीडिया के अनुसार भारत ने जून २०२३ से खरबूजा बीज आयात पर मात्रात्मक प्रतिबंध लगाया। पहले उद्योगों को ३५ हजार टन अप्रशोधित मगज लाने की अनुमति दी गई थी, बाद में दो महीने के लिए ही सीमित आयात खुला। लेकिन इसके बाद भारत ने पूरी तरह उद्योगों के लिए भी आयात बंद कर दिया।
नए नियमों के तहत ‘भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण’ से लाइसेंसधारी और अपनी प्रोसेसिंग इकाई वाले ही कोटा के भीतर आयात कर सकेंगे।
भारतीय बंदरगाहों पर आयात पर सख्ती के कारण तस्करों ने नेपाल के रास्ते को चुना है, जानकार बताते हैं। मुम्बई के ‘न्हावा शेवा पोर्ट’ पर अप्रैल २०२३ में राजस्व गुप्तचर निदेशालय (DRI) के एक ऑपरेशन में अफ्रीका से ‘रहर की दाल’ बताकर १.३९ अरब रुपये के २,७१० टन तरबूजे के बीज जब्त किए गए थे। भारत में सीधे पहुंचाना संभव न होने पर नेपाल की खुली सीमा तस्करों के लिए आसान मार्ग बनी है।
पुलिस की लगातार गिरफ्तारी अभियान
नेपाल में आए तरबूजे के बीज की भारत तस्करी की असलियत सीमावर्ती जिलों में पुलिस द्वारा बरामदगी से भी साबित होती है।
चार दिन पहले ८ असार को जिला पुलिस कार्यालय कलैया बारा ने सिमरौनगढ़ नगरपालिका-६ से एक ट्रक से १२,५६० किलो (३१४ बोरे) खरबूजा बीज जब्त किया, जिसकी अनुमानित कीमत २३ लाख रुपये थी। चालक ने सीमा शुल्क बिल नहीं दिखाया, इसलिए पुलिस ने ट्रक जब्त कर लिया।
उससे पहले २७ जेठ को रुपन्देहीं पुलिस ने भैरहवा में एक व्यापारी के गोदाम से कस्टम छली कर लाए गए ३५ बोरे तरबूजा के बीज, जिसकी कीमत २३ लाख ३२ हजार रुपये थी, बरामद किए।
यही दिन रौतहट सीमा क्षेत्र में तस्करी का एक बड़ा खेप पकड़ने के लिए पुलिस ने ६ राउंड आंसू गैस छोड़ी। तनावपूर्ण ऑपरेशन के बाद १२,८८० किलो कद्दू के बीज के नाम पर जब्त बीज बाद में तरबूजे के मगज निकले।
२२ असोज २०८२ को रुपन्देहीं से मिनी ट्रक के जरिए भारत ले जाने के लिए १२५ बोरे बीज भी जब्त हुए थे।
देश की आवश्यकताओं से कई गुना अधिक असभ्य आयात होने के बावजूद सरकारी नियामक संस्थाएं कानूनी छिद्र दिखाकर कोई कार्रवाई नहीं करतीं।
नेपाल में खरबूजा बीज का पंजीकरण नहीं
नेपाल में खरबूजा बीज की कोई जाति पंजीकृत नहीं है। बीज बिजन गुणवत्ता नियंत्रण केंद्र के सूचना अधिकारी प्रकाश आचार्य ने बताया कि खरबूजा बीज फिलहाल परीक्षण के दौर में है।
उनके अनुसार तरबूजे की दो-तीन जातियां पंजीकृत हैं, और बीज बाहर से लाए जाते हैं। सीमा शुल्क विभाग में आयातित बीज का HS कोड फल के एक ही कोड के साथ रखा जाता है, इसलिए बीज और फल को अलग करना मुश्किल होता है।
नेपाल में बीज आयात के लिए कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होती है। राष्ट्रीय बीज बिजन समिति की सूची में शामिल होने और राजपत्र में सूचना प्रकाशित होने के बाद ही व्यावसायिक खेती की अनुमति मिलती है।
आयातकर्ता को दस्तावेज के साथ अनुमति के लिए केंद्र से सिफारिश लेनी होती है। इसके बाद ही प्लांट क्वारंटीन और कीटनाशक प्रबंधन केंद्र फाइटो-सैनिटरी आवश्यकताओं के आधार पर प्रवेश अनुमति देता है।
आचार्य के अनुसार अनुमति के बिना इतनी बड़ी मात्रा में आयात संभव नहीं है। उन्होंने बताया कि नेपाल से बीज निर्यात के लिए भी अब तक किसी ने सिफारिश नहीं ली है।
‘आयात ही नहीं, निर्यात के लिए भी हमें सिफारिश देनी होती है,’ उन्होंने कहा, ‘अब तक किसी ने नहीं ली।’ सीमा शुल्क विभाग खरबूजा और तरबूजा को अलग नहीं करता और दोनों को ‘मेलन सीड’ के अंतर्गत दर्ज करता है, जिससे आंकड़ों में और भ्रम की स्थिति बनती है, केंद्र ने बताया।
आयातित बीज को सीमा शुल्क पर रोक लगाने की मांग उठती रही है, लेकिन कृषि मंत्रालय के अधिकारी कहते हैं कि बाजार और तस्करी नियंत्रण उनकी जिम्मेदारी नहीं है।
कृषि मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार, मंत्रालय के अधीन प्लांट क्वारंटीन केवल बीमारी और कीड़ों की जांच करता है, न कि बीज का उपयोग।
‘हम केवल आज़माते हैं कि वस्तु सुरक्षित है या नहीं, और उस में कोई बाहरी जीवाणु-कीट है या नहीं,’ वे कहते हैं, ‘बीज माती में जाएगा और जैविक जोखिम ज्यादा होगा, उस पर कड़ाई करते हैं, लेकिन जब व्यापारी कस्टम में कहते हैं कि ये बीज खेती के लिए नहीं, व्यावसायिक या खाद्य प्रयोजन के लिए हैं तो हम रोक नहीं सकते।’
बीज का उपयोग, भंडारण, बिक्री और तस्करी की निगरानी और नियंत्रण उद्योग वाणिज्य तथा आपूर्ति मंत्रालय और बाजार निरीक्षण एजेंसियों का कर्तव्य है।
इतनी बड़ी मात्रा में असामान्य आयात जारी रहने पर ‘मार्केट इंटेलिजेंस’ और वाणिज्य प्रशासन चुप नहीं रह सकते, जानकार कहते हैं। जैसे सुपारी, छोकड़ा और केराउ के असामान्य आयात पर वाणिज्य मंत्रालय ने कोटा तय किया था, वैसे ही खरबूजा-तरबूजे के बीज पर नीति बनानी पड़ सकती है।
चार वर्षों का खरबूजा बीज आयात डेटा
पिछले चार वर्षों के आंकड़ों के विश्लेषण में खरबूजा-तरबूजे के आयात मात्रा और इसके लिए खर्च की गई राशि दोनों में वृद्धि देखी गई है।
आर्थिक वर्ष २०७८/७९ में आयात सिर्फ ९९ टन थी और मूल्य था २ करोड़ ३ लाख रुपये।
अगले वर्ष २०७९/८० में आयात बढ़कर १२७ टन हुई और खर्चा २ करोड़ १४ लाख रुपये रहा।
इसके बाद के वर्षों में आयात तेजी से बढ़ा। वित्तीय वर्ष २०८०/८१ में ५०२ टन का आयात हुआ, जिसकी कीमत ९ करोड़ १३ लाख रुपये थी।
पिछले वर्ष २०८१/८२ में आयात १२८६ टन तक पहुंच गई, और इस पर २५ करोड़ ७० लाख रुपये खर्च हुए।
