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धन कमाने की प्रतिस्पर्धा में खोता जा रहा जीवन का अर्थ

पिछले दो-तीन दशकों तक नेपाली समाज की मुख्य पहचान सामूहिकता, पारिवारिक निकटता, सांस्कृतिक सह-अस्तित्व और प्रकृति के साथ सहज संबंध रही थी। किसी व्यक्ति की सफलता केवल उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि से नहीं, बल्कि परिवार और समुदाय के सम्मान से जुड़ी मानी जाती थी। गांव के चौतरी संवाद के केंद्र होते थे, पड़ोसी सुख-दुख के साझेदार और परिवार केवल रक्त संबंध नहीं बल्कि जीवन का आधार था। लेकिन 21वीं सदी में आते-आते यह सामाजिक संरचना तेज़ी से परिवर्तनशील हो रही है। आज के नेपाली समाज के स्वरूप को बदलने वाली तीन प्रमुख शक्तियाँ बन चुकी हैं – बाध्यकारी वैदेशिक रोजगार, अनियंत्रित शहरीकरण और चौबीसों घंटे मनुष्य की चेतना को प्रभावित करने वाला सामाजिक नेटवर्क। ये तीनों तत्व आर्थिक अवसरों, उपभोग क्षमता और जीवनशैली में अभूतपूर्व बदलाव ला रहे हैं। पर यह बदलाव समाज को एक भौतिकवादी प्रतिस्पर्धा की ओर धकेल रहा है, जहां साधन प्राप्ति की दौड़ में व्यक्ति जीवन के वास्तविक उद्देश्य और संबंधों के मूल्यों को भूलता जा रहा है।

वैदेशिक रोजगार, शहरीकरण और सामाजिक नेटवर्क के प्रभाव में हम भौतिक समृद्धि की दौड़ में अंधाधुंध भाग रहे हैं। लेकिन यह दौड़ हमारे पारिवारिक मूल्यों, आत्मिक शांति और सामाजिक सद्भाव को कमजोर कर रही है। इस संकट का सबसे पहला और प्रत्यक्ष प्रभाव परिवार पर पड़ा है। रेमिटेंस देश की अर्थव्यवस्था को सहारा देते हुए गरीब परिवारों को गरीबी की रेखा से ऊपर उठाने में मदद कर रही है। कर्णाली के दुर्गम गांवों से लेकर मधेश के मैदानों और पहाड़ों तक बड़े और मजबूत मकान बने हैं। लेकिन इन्हीं कंक्रीट के घरों के भीतर भावनात्मक शून्यता बढ़ रही है। लाखों युवा खाड़ी की रेगिस्तान में पसीना बहाते हुए घर में एक पीढ़ी अभिभावकों की सान्निध्य से वंचित होकर बड़े हो रहे हैं।

पति-पत्नी लंबे समय तक अलग रहने के कारण अविश्वास बढ़ने से संबंध-विच्छेद बढ़े हैं। पिछले वर्ष देशभर में लगभग 24 हजार 522 संबंध-विच्छेद के मामले दायर हुए थे, जो अब तक की सबसे बड़ी संख्या है। बच्चे पिता के कंधे और मां की गोदी की बजाय महंगी बोर्डिंग स्कूल के हॉस्टल में पाले जा रहे हैं। वृद्ध माता-पिता गांव के खाली घरों या शहर के आधुनिक मकानों में भावनात्मक खालीपन और अकेलेपन से जूझ रहे हैं। परिवारों में भौतिक समृद्धि आई है पर आंतरिक संबंध और भावनाएं टूट रही हैं। दूसरी ओर, फेसबुक, इंस्टाग्राम और टिकटॉक लोगों को दूसरों के जीवन का संपादित संस्करण दिखाते हैं। सफलता की चमक तो दिखती है, संघर्ष छिपाया जाता है। उपलब्धियां प्रदर्शित होती हैं, असफलताएं छुपाई जाती हैं। अर्थशास्त्री रिचर्ड इस्टरलिन के अध्ययन में भी यह बात सामने आई है कि व्यक्ति की संतुष्टि उसकी वास्तविक आय से अधिक उसके “खुद को दूसरों की तुलना में कहां देखकर महसूस करता है” से जुड़ी होती है।

परिणामस्वरूप, लोग खुद को संतुष्ट नहीं कर पाते। तकनीक ने मानवीय संबंधों को पहले से अधिक जुड़े हुए दिखाया है, लेकिन भावनात्मक तौर पर हम दूर होते जा रहे हैं। संवाद के माध्यम बढ़े हैं लेकिन अंतरंगता कम हुई है। संपर्कों की संख्या बढ़ी है पर संबंधों की गहराई कमजोर हुई है। गांव धीरे-धीरे खाली हो रहे हैं और शहर अनियंत्रित रूप से फैल रहे हैं। सामाजिक नेटवर्क ने वास्तविक जीवन की तुलना में आभासी दुनिया को अधिक आकर्षक और प्रभावशाली बना दिया है। इससे व्यक्ति की मनोविज्ञान पर सीधा प्रभाव पड़ा है। तुलना, असंतुष्टि, मानसिक तनाव और अकेलापन आज के साझा सामाजिक समस्याएं बन चुकी हैं। बाहरी तौर पर परिवार और समाज समृद्ध, आधुनिक और विकसित दिखाई देते हैं, लेकिन अंदर संबंधों का विस्थापन, मानवीय मूल्यों का क्षरण और आत्मिक शून्यता का संकट गहरा होता जा रहा है। इसलिए आज की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ आर्थिक समृद्धि नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना, सामाजिक सद्भाव और संबंधों की गर्माहट बनाए रखना भी है।