एन्डोस्कोपी और कोलोनोस्कोपी पाचन तंत्र के जाँच के लिए किए जाने वाले दो अलग लेकिन महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं हैं। ये दोनों परीक्षण पाचन तंत्र के अंदर सीधे निरीक्षण करने, समस्या की पहचान करने और आवश्यक होने पर उपचार में मदद करते हैं। ये दोनों एक समान नहीं हैं और शरीर के अलग-अलग हिस्सों की जांच करते हैं।
लक्षणों के आधार पर किस परीक्षण की आवश्यकता कब होती है?
एन्डोस्कोपी आमतौर पर बार-बार एसिडिटी, छाती में जलन, भोजन निगलने में कठिनाई की समस्या होने पर की जाती है। इसके अलावा बार-बार उल्टी या वाकवाकी, पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द, मल में काला रक्त दिखना या मल का रंग बदलना, अचानक वजन कम होना, रक्तसहित उल्टी जैसे लक्षणों में भी यह सलाह दी जाती है।
कोलोनोस्कोपी मुख्य रूप से निचले पाचन तंत्र की समस्या दिखने पर, मल में रक्त आना, दीर्घकालिक दस्त या कब्जियत, पेट के निचले हिस्से में दर्द, कोलन कैंसर का पारिवारिक इतिहास और ४५–५० वर्ष की उम्र के बाद नियमित स्क्रीनिंग के लिए की जाती है।
किस अंग की जांच कैसे होती है?
एन्डोस्कोपी
मुख से एक पतली, लचीली ट्यूब ‘एन्डोस्कोप’ घुसाकर भोजन नली, पेट और छोटी आंत के शुरुआती हिस्से की जाँच की जाती है।
कोलोनोस्कोपी
गुदा के मार्ग से कोलोनोस्कोप डालकर बड़ी आंत, रेक्टम और सिग्मॉइड कोलन की पूरी जाँच की जाती है। इसमें मिलने वाले पॉलिप को तुरंत हटाया जा सकता है, जो कैंसर को रोकने में मदद करता है।
परीक्षा की तैयारी और प्रक्रिया कैसी होती है?
एन्डोस्कोपी और कोलोनोस्कोपी से पहले ६ से ८ घंटे भूखे रहना आवश्यक होता है। कुछ दवाइयों को रोकना पड़ सकता है, जैसे रक्त पतला करने वाली दवाएं। लिखित सहमति भी लेनी होती है।
एन्डोस्कोपी
– आमतौर पर ५–१० मिनट लगते हैं।
– हल्की नींद लाने वाली दवा दी जा सकती है।
– मुख के माध्यम से ट्यूब डाली जाती है।
कोलोनोस्कोपी
इसमें २०–४५ मिनट लग सकते हैं। पूरी आंत को साफ करने के लिए पिछले दिन विशेष ‘लेक्सेटिव’ का सेवन करना पड़ता है। सेडेशन दिया जा सकता है, जिससे मरीज को सामान्यतः कोई असुविधा नहीं होती।
इन परीक्षणों से क्या पता चलता है?
एन्डोस्कोपी से
– अल्सर, गैस्ट्राइटिस, हायटस हर्निया, ट्यूमर, गांठ
– जीईआरडी (गैस्ट्रोइसोफेगल रिफ्लक्स रोग)
– बेरट्स इसोफेगस, जो अन्ननली की कोशिकाओं में परिवर्तन होता है
– सिलीएक रोग, ग्लूटेन के कारण होने वाला आंत का रोग
– बायोप्सी लेकर कैंसर की जांच की जा सकती है।
कोलोनोस्कोपी से
– बड़ी आंत या मलाशय के कैंसर की शुरुआती पहचान
– पॉलिप को हटाने की प्रक्रिया ‘पोलिपेक्टॉमी’
– इन्फ्लेमेटरी बाउल डिजीज यानी आंत की दीर्घकालिक सूजन
– जैसे अल्सरेटिव कोलाइटिस
– डायवर्टिकुलोसिस, जो बड़ी आंत में छोटे थैली जैसे संरचनाएं बनना
– रक्तस्राव के स्रोत का पता लगाना
जोखिम और साइड इफेक्ट्स
एन्डोस्कोपी
दुर्लभ: आंत फटना, रक्तस्राव, संक्रमण
सामान्य: गले में खराश, हल्का पेट दर्द
कोलोनोस्कोपी
दुर्लभ: आंत फटना, रक्तस्राव
सामान्य: पेट फूला हुआ महसूस होना, गैस निकलना, हल्का पेट दर्द
ये परीक्षण अनुभवी गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट द्वारा किए जाने पर अत्यंत सुरक्षित माने जाते हैं।
किसे और कब परीक्षण कराना चाहिए?
४५ साल से ज्यादा उम्र के सभी लोगों को बड़ी आंत के कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए कोलोनोस्कोपी करवाने की सलाह दी जाती है। यदि परिवार में बड़ी आंत का कैंसर का इतिहास हो तो ४० वर्ष से पहले भी परीक्षण शुरू किया जा सकता है। बार-बार पाचन संबंधी समस्याएं दिखने पर एन्डोस्कोपी आवश्यक हो सकती है।
