२१ आसार तेह्रथुम। कभी-कभी किसी व्यक्ति का जीवन सिर्फ उसके वक्त की कहानी नहीं होता, यह समाज, पीढ़ी और एक भूगोल की कथा भी बन जाता है। नेपाली साहित्य में ऐसे अमिट छाप छोड़ने वाले साहित्यकार हैं लीलबहादुर क्षेत्री। भारत के असम राज्य के गुवाहाटी में जन्मे क्षेत्री के पूर्वज पूर्वी नेपाल के तेह्रथुम के छथर सुदाप से असम तक आए थे। नेपाली समाज की हकीकत, पलायन, गरीबी और मानवीय संवेदनाओं को केंद्र में रखते हुए लिखा गया उनका चर्चित उपन्यास ‘बसाइँ’ नेपाली साहित्य की एक कालजयी कृति बन गया। साहित्य अकादमी पुरस्कार, जगदम्बाश्री पुरस्कार और पद्मश्री सम्मान से सम्मानित क्षेत्री का निधन १३ मार्च २०२५ को गुवाहाटी में हुआ, पर उनकी रचनाएँ आज भी नेपाली साहित्य में उन्हें जीवित रखे हुए हैं।
इसी साहित्यकार की स्मृति में तेह्रथुम के छथर में दो दिन तक साहित्य, संस्कृति और सृजनात्मक कार्यक्रम आयोजित किया गया। ‘स्मृतिमा साहित्यकार लीलबहादुर क्षेत्री परिचर्चा तथा स्रष्टा सम्मान एवं पुरस्कार वितरण कार्यक्रम’ न केवल एक साहित्यकार को याद करने का प्रयास था, बल्कि साहित्य, संस्कृति, शिक्षा और पर्यटन को जोड़ते हुए समाज को अपनी मौलिक पहचान पर गर्व महसूस कराना भी था। छथर साहित्यिक समाज, शुक्रबारे का आयोजन तथा छथर गाउँपालिका के प्रबंधन में संपन्न इस कार्यक्रम का उद्देश्य लीलबहादुर क्षेत्री के साहित्यिक योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना, स्थानीय स्रष्टाओं का सम्मान करना और साहित्यिक वातावरण का निर्माण करना था।
कार्यक्रम के पहले दिन प्रतिभागियों ने साहित्यिक यात्रा के तहत क्षेत्री के पूर्वजों के गांव सुदाप का भ्रमण किया। उन्होंने बाल्यकाल बिताए परिवेश, उनकी प्रेरणा स्रोत और गांव के जीवनशैली का निकटतम अनुभव प्राप्त किया। जनकल्याण आधारभूत विद्यालय को पुस्तक भी हस्तांतरित की गई। विद्यार्थियों की रचनात्मक प्रस्तुतियाँ और साहित्य के प्रति उत्साह ने नई पीढ़ी में साहित्य के प्रति लगाव बनी रहने का प्रमाण दिया। शाम को आयोजित साहित्यिक-सांगीतिक कार्यक्रम में कविता वाचन, गीत-संगीत तथा सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने माहौल को साहित्यिक उत्सव में बदल दिया। इस कार्यक्रम में १० जिलों के स्रष्टाओं ने भाग लिया।
कार्यक्रम में माया मितु न्यौपाने, मुकुन्द प्रयास, कविता केशरी, ध्रुव एलेक्स, दीपा दीपहरी, वीरेंद्र खड्का, प्रमोद दुलाल, तारा काफ्ले सहित कई ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। दूसरे दिन की मुख्य आकर्षण परिचर्चा तथा स्रष्टा सम्मान एवं पुरस्कार वितरण रही। वक्ताओं ने लीलबहादुर क्षेत्री के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करते हुए उनकी रचनाओं को नेपाली समाज की जीवंत दस्तावेज बताया। विशेषकर ‘बसाइँ’ जैसी कृतियों ने नेपाली समाज की हकीकत, गरीबी, विस्थापन और मानवीय संवेदनाओं को विश्व के सामने परिचित कराया।
कार्यक्रम में पहली बार अपनी पुश्तैनी धरती पहुंची साहित्यकार लीलबहादुर क्षेत्री की बेटी डा. कृष्णा क्षेत्री भावुक दिखाई दीं। उन्होंने कहा, ‘पिता सम्मान उनके जन्मभूमि पर देख पाना मेरे लिए अत्यंत खुशी की बात है। हमारे जीवन का अधिकांश काल भारत के असम, गुवाहाटी में बीता, लेकिन आज यहां आकर उनके योगदान के प्रति दिखाए गए सम्मान से गर्व महसूस हो रहा है।’ कार्यक्रम में छथर गाउँपालिका-५ ओख्रेकी तृप्ति भण्डारी को ‘नवसर्जक सम्मान–२०८२’ दिया गया। साथ ही साहित्य, कला, संस्कृति तथा सामाजिक क्षेत्र में योगदान करने वाले छथर गाउँपालिका अध्यक्ष संतोष तिगेला, प्रगतिशील लेखक संघ के केन्द्रीय अध्यक्ष डा. देवी क्षेत्री दुलाल, साहित्यकार लीलबहादुर क्षेत्री की बेटी डा. कृष्णा क्षेत्री तथा राष्ट्रीय लोक और दोहरी गीत प्रतिष्ठान नेपाल, तेह्रथुम को सम्मानित किया गया।





