अमेरिका में कार्यरत एक नेपाली ने अपनी मानसिक तनाव को गाड़ी के इंजन में दिखने वाली ‘चेक-इंजन’ लाइट से तुलना करते हुए अपनी समस्या को पहचानने का प्रयास किया। गेराज संचालक टेङ्गा ने अपनी पत्नी के घर छोड़ देने के बाद हुए मानसिक दर्द और उससे बाहर निकलने के लिए अपनाए गए उपायों के बारे में अपने दोस्तों से खुलकर बात की। अंततः टेङ्गा और उस नेपाली ने अपनी आंतरिक पीड़ाओं को स्वीकार करते हुए मानसिक स्वास्थ्य सुधार के लिए काउंसलिंग और उपचार का रास्ता चुना।
“मेरी बूढी ने घर छोड़ा, म्यान!” टेङ्गा के मुख से यह बात कितनी सहजता और फुर्ती से निकली, मानो वह मुझे सदियाँ पुराना जानता हो। मैं आश्चर्य में पड़ गया। हम तो उसी दिन से मिले थे। मैं अपनी पुरानी टोयोटा कैमरी के डैशबोर्ड पर जलती रहने वाली जिद्दी ‘चेक-इंजन’ लाइट की समस्या सुलझाने के लिए गेराज गया था; किसी अपरिचित व्यक्ति की पारिवारिक कहानी सुनने के लिए नहीं।
लेकिन टेङ्गा ने हुड के नीचे अपना सिर डालकर, हाथ में रिंच पकड़ते हुए कोई नट-बोल्ट कसते हुए बातें शुरू कीं। “अहो!” मेरे मुंह से इतनी ही आवाज निकली। हमारी भाषा में किसी की पीड़ा पर मरहम लगाने के कई मधुर और तीखे शब्द होते हैं, लेकिन इस विदेशी देश की अंग्रेज़ी में मेरा यह ‘अहो!’ सूखे रोटी की तरह कठोर और सख्त सुन पड़ा।
बाहर की सर्द हवा से गेराज के अंदर थोड़ा गर्म था। बाईं ओर के कोने में लगी पुरानी बिजली का हिटर जोर से आवाज़ कर रहा था। दीवार पर टंगी पुरानी रेडियो पर धीमे स्वर में सत्तर के दशक का कोई ब्लूज़ गीत बज रहा था, एक अलग युग का। जलते हुए मोबिल का गंध, रबर की खुशबू और किसी कोने में फैली कड़क ब्लैक कॉफी की सुगंध ने गेराज के अंदर एक मजेदार लेकिन अजीब तरह का माहौल बना रखा था, जहां नए व्यक्ति के लिए ज्यादा देर टिकना कठिन होता था।





