बालेन्द्र शाह: नेपाल में प्रधानमंत्री अपने गुप्तचर एजेंसियों को सीधे नियंत्रण में क्यों रखना चाहते हैं?
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राष्ट्रीय जांच विभाग को प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन लाने वाले कानून संशोधन की प्रक्रिया को सरकार द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य और महत्व लेकर प्रतिक्रियाएं मिली हैं।
पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी ओली सरकार ने राजस्व जांच विभाग, संपत्ति शोधन विभाग और राष्ट्रीय जांच विभाग जैसे संस्थानों को प्रधानमंत्री कार्यालय के तहत लाकर शक्ति केंद्रित करने का प्रयास किया था, जिसे लेकर आलोचना हुई थी।
पिछली भदौ में हुई जनजीतिर आंदोलन के बाद बनी सुशीला कार्की नेतृत्व वाली सरकार ने गुप्तचर एजेंसी को गृह मंत्रालय के अधीन रखा और अन्य संस्थानों को संबंधित मंत्रालयों के अंतर्गत।
लेकिन फागुन में हुए आम चुनाव के बाद लगभग दो-तिहाई समर्थन पा चुकी राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी की सरकार गुप्तचर एजेंसी को प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन लाने के लिए कानूनी प्रावधान तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर रही है।
इस संबंध में चर्चा के लिए संबंधित प्रतिनिधि सभा समिति में भेजने के प्रस्ताव को कानून मंत्री सोबिता गौतम ने मंगलवार की संसद बैठक में रखा था।
पूर्व गुप्तचर प्रमुख के तर्क
भदौ २३ और २४ को जनजीतिर आंदोलन में तत्कालीन प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन राष्ट्रीय जांच विभाग ने प्रभावी भूमिका नहीं निभाई, इसकी आलोचना हुई थी।
जांच आयोग ने गुप्तचर संस्थाओं को हर सरकार परिवर्तन पर नजरअंदाज किए जाने के कारण सुधार की आवश्यकता बताई थी।
इसके बाद बनी सुशीला कार्की प्रधान मंत्री की सरकार ने पूर्व केपी ओली सरकार के फैसले को पलटकर राष्ट्रीय जांच विभाग को गृह मंत्रालय के अंतर्गत रखने का फैसला किया।
पूर्व राष्ट्रीय जांच विभाग प्रमुख देवीराम शर्मा कार्की ने कहा कि गृह मंत्रालय के अधीन रखने का फैसला गलत था और गुप्तचर एजेंसी को प्रधानमंत्री के अधीन होना चाहिए।
उन्होंने कहा, “गुप्तचर एजेंसी जो भी जानकारी देती है, उसका पहला उपभोक्ता सरकार का प्रमुख होता है। वह सरकार का प्रमुख शासन व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी लेता है। अगर कुछ गलत हुआ तो दोष सरकार और प्रधानमंत्री दोनों का है। यह व्यवस्था अभी उपयुक्त है।”
उन्होंने उल्लेख किया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री ओली ने गुप्तचर समेत अन्य वित्तीय संस्थाओं को अपने कार्यालय के अधीन लाने के कारण आलोचना झेली, और यह भी तर्क दिया कि यदि गुप्तचर एजेंसी अन्य मंत्रालयों के अधीन गई तो प्रधानमंत्री की कमजोरी दिखेगी।
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शर्मा ने कहा, “नेपाल में वर्तमान में शक्तिशाली देशों की रुचि बढ़ी है, इसलिए उनकी योजनाओं और कदमों की बारीकी से निगरानी करना ज़रूरी है। इस क्षेत्र में निवेश करने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए। एक गुप्तचर संस्था बनाई जानी चाहिए जिसे प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन रखा जाए और आंतरिक मामलों को देखे वाली संस्था गृह मंत्रालय के अंतर्गत हो। फिलहाल एक ही है, उसे समन्वय करते हुए प्रधानमंत्री निदेशालय के अधीन रखना उचित है।”
पूर्व गृह सचिव के द्वारा उजागर की गई कमियाँ
पूर्व गृह सचिव उमेश मैनाली ने राष्ट्रीय जांच विभाग को गृह मंत्रालय से अलग करना गंभीर कमजोरी बताई।
उन्होंने कहा, “गृह मंत्री शांति और सुव्यवस्था के लिए जवाबदेह होते हैं, लेकिन जब गुप्तचर एजेंसी प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन होगी तो ‘सेकेंड हैंड’ सूचना मिलने के कारण अच्छा काम नहीं होगा। आंतरिक सुरक्षा वाली एजेंसी गृह मंत्रालय के अंतर्गत ही होनी चाहिए।”
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को अपनी भूमिका का एहसास होना चाहिए, संस्थाओं को एक हाथ में लाना और स्वयं ऑपरेटर बनने के बजाय समन्वयकारी भूमिका निभाना ज़रूरी है।
नेपाल के गुप्तचर एजेंसी को देश के भीतर और बाहर प्रतिगुप्तचर अभियान चलाने का मार्ग प्रदान करने वाला कानून का मसौदा पूर्व सरकार ने सार्वजनिक किया था।
पूर्व गृह सचिव मैनाली ने बार-बार राष्ट्रीय जांच विभाग को प्रधानमंत्री कार्यालय में लाने और गृह मंत्रालय में वापस भेजने की प्रक्रिया को उजागर करते हुए इस विभाग को दो इकाइयों में विभाजित करने का सुझाव दिया है।
“इसे दो इकाइयों में बांटकर एक को प्रतिजासूसी (काउंटरइंटेलिजेंस) के तौर पर रखना चाहिए और दूसरी जो आंतरिक सुरक्षा देखे, उसे गृह मंत्रालय में रखना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि इस काम से राजनीतिक दलों की नीति में विरोधाभास दिख सकता है, लेकिन इसे समझने योग्य विषय के रूप में लेना चाहिए।
उन्होंने कहा, “जब केपी ओली ने इसे लागू किया तो विपक्ष ने विरोध किया, लेकिन अब वे इसे स्वीकार कर रहे हैं। कोई भी शक्तिशाली होना चाहता है। प्रधानमंत्री का मुख्य काम नीति निर्माण, समन्वय और निगरानी होना चाहिए।”
राष्ट्रीय जांच विभाग के पूर्व प्रमुख शर्मा का कहना है कि प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद कार्यालय के अधीन गुप्तचर एजेंसी रखने का सुझाव लंबे समय से था पर इसमें कम प्रगति हुई है।
उन्होंने कहा, “तब भी प्रधानमंत्री और गृह मंत्री दोनों को सीधे जानकारी चाहिए थी। प्रधानमंत्री इसे अपने अधीन रखना चाहते थे, लेकिन गृह मंत्री इसे छोड़ना नहीं चाहते थे।”
शर्मा बताते हैं कि इसका समाधान करने के लिए समन्वयकर्ता उच्च अधिकारियों को प्रधानमंत्री कार्यालय में रखा गया है।
सरकार का जवाब
नेपाल विशेष सेवा अधिनियम २०४२ में संशोधन के लिए बिल पंजीकृत करते हुए सरकार ने मंत्रिपरिषद के २०८२ असोज ९ के निर्णय के अनुसार राष्ट्रीय जांच विभाग को गृह मंत्रालय के अंतर्गत रखने की घोषणा की थी।
लेकिन नई सरकार ने वैशाख के अंतिम सप्ताह में मंत्रालयों के कार्यविभाजन की नई नियमावली जारी की,
जिसमें गुप्तचर एजेंसी को प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद कार्यालय के अधीन रखने की व्यवस्था की गई है।
सरकार ने कहा कि पिछला बिल अध्यादेश के माध्यम से किया गया संशोधन को बदलकर पुरानी व्यवस्था को बनाए रखेगा और इससे राष्ट्रीय जांच विभाग की क्षमता बढ़ेगी।
इस विषय पर राजनीतिक दलों में मतभेद हैं।
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इसी सप्ताह संसद में बात करते हुए कानून, न्याय और संसदीय मामले मंत्री सोबिता गौतम ने कहा कि प्रधानमंत्री के रूप में शांति-सुरक्षा का विशेष अधिकार होगा और सभी गुप्त सूचना सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंचनी चाहिए, इसलिए यह प्रणाली अपनाई गई है।
उन्होंने कहा, “सुविधाजनक या असुविधाजनक होने से परे यह जरूरी है कि सभी गुप्त सूचना होने पर ही सरकार प्रमुख यह निर्धारित कर सके कि देश और नागरिकों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हो। इसलिए इसे प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन रखा गया है।”
गोपनीय सूचनाएं अत्यंत संवेदनशील हैं, इसलिए गृह मंत्रालय के अधीन कार्यभार अधिक है, यह भी उन्होंने बताया।
“सीडीओ भी गृह मंत्रालय के अंतर्गत हैं, आपदा प्रबंधन भी गृह मंत्रालय अंतर्गत है। कई सुरक्षा निकाय गृह मंत्रालय के अंतर्गत हैं, लेकिन जब गुप्त सूचना सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंचती है तो उसे लेकर अगला कदम कौन-कैसे उठाएगा, उसका मुख्य निर्णय प्रधानमंत्री करता है।”
भदौ २३ और २४ की घटनाओं की जांच करने वाली आयोग ने राष्ट्रीय जांच विभाग में लगभग 2,000 कर्मियों की उपस्थिति और संसाधन संपन्न संस्था बनाने की सलाह दी थी।
रिपोर्ट में आंतरिक सुरक्षा एजेंसियों के समन्वय और आधुनिक तकनीक से लैस राष्ट्रीय जांच विभाग को आवश्यक बताया गया है।
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