कृषिमन्त्री के ‘बिचौलिया खत्म’ के वादे फेल, कीमत न मिलने पर किसानों ने सड़क पर टमाटर फेंक कर किया प्रदर्शन
उत्पादन लागत के उचित दाम न मिलने के कारण काठमांडू के माइतीघर में किसानों ने टमाटर सड़क पर फेंककर विरोध प्रदर्शन किया। किसानों ने सरकार से कृषि बीमा, न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी और बाजार में बिचौलियों को खत्म करने की मांग की है। कालिमाटी बाजार में स्थानीय टमाटर की कीमत प्रति किलो 10 रुपये से कम होने के कारण किसानों ने लागत भी पूरा नहीं कर पाने की शिकायत की। 31 असार, काठमांडू। बुधवार दोपहर करीब 12 बजे संघीय राजधानी काठमांडू के माइतीघर इलाके की सड़क कृषि उत्पादों से लाल हो गई। इसका कारण था—टमाटर को उचित मूल्य नहीं मिलने से किसान नाराज होकर सड़क पर टमाटर फेंकने लगे। उत्पादन लागत ज़्यादा होने और 10 रुपये प्रति किलो की कीमत पर भी टमाटर न बिकने की वजह से माइतीघर में किसानों ने विरोध स्वरूप टमाटर फेंका। किसानों के लिए खेत में मेहनत करना जितना कठिन है, उससे भी अधिक दुखद है अपनी पैदावार का उचित मूल्य न मिलना। किसान अपनी खून-पसीना से उगाए टमाटर को सड़क पर फेंक कर सरकार की ओर से उचित मूल्य न मिलने पर निराशा और गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। काठमांडू उपत्यका के स्थानीय किसान भूमिहीन होकर टनेल खेती कर रहे हैं और वे सड़क पर उतरे हैं। ‘हमारे पास कोई संघ-संस्था नहीं है, कोई नेतृत्व नहीं है, हम सभी खुद अपने खेतों में मेहनत करने वाले किसान हैं, आज हम कष्ट में हैं और यह आग लेकर सड़कों पर आए हैं,’ आंदोलन में शामिल किसानों ने बताया। माइतीघर में टमाटर पर टिका नारों को जोर-शोर से लगाते किसानों में बम लामा तामांग के चेहरे पर निराशा और गुस्सा साफ नजर आ रहा था। वे और लगभग सौ किसान ‘हरियो क्रान्ति’ लिखा बैनर लेकर नारे लगाते रहे। ‘किसानों को खाने का मौका दो, मूल्य प्रबंधन में सरकार नियंत्रण करे, बिचौलियों को बाजार से हटाओ, किसानों को सस्ते क़र्ज़ दो, कृषि बीमा लागू करो, किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य दो, समय पर खाद, बीज और अधिकार सुनिश्चित करो!’ वे नारे लगाते रहे। कृषि, वन तथा पर्यावरण मंत्री गीता चौधरी के विरुद्ध किसानों का आक्रोश भी दिखा। तामांग के अनुसार, एक किलो टमाटर उगाने में कम से कम 25 रुपये खर्च होता है, लेकिन वर्तमान में 10 रुपये प्रति किलो भी बेच पाना मुश्किल है, जिस वजह से उन्हें सड़क पर आना पड़ा। ‘10 रुपये में बेचकर भी घाटा होता है, यह समस्या कोई नई नहीं, लगभग एक माह से हम इस घाटे के साथ जूझ रहे हैं,’ उन्होंने कहा, ‘टनेल में लोकल टमाटर उगाते हैं जिसमें बहुत निवेश होता है, कैसे टिक पाएगा?’ बिचौलियों के बिना बाजार प्रबंधन न होने से भारतीय टमाटर आसानी से बाजार में आ रहे हैं और स्वदेशी पैदावार को उचित बाजार नहीं मिल पा रहा है, किसानों ने यह गुनाह किया। कालिमाटी फल-फूल और सब्जी बाजार विकास समिति ने भारतीय सब्जियों का कोई तथ्यांक नहीं दिया है और नियंत्रण करने में असफल रही है, यह भी किसानों की चिंता है। ‘हमारी मांग है कि कालिमाटी रोजाना कीमतें न बदले,’ तामांग ने बताया, ‘चाहे टमाटर हो या कोई दूसरी सब्जी, यदि निश्चित मूल्य तय हो तो किसानों को बड़ी राहत मिलेगी।’ करोड़ों का निवेश और रोज़गार संकट के बीच माइतीघर में प्रदर्शन कर रहे किसानों के लिए यह साधारण खेती नहीं, बल्कि व्यवसायिक खेती है जिसमें वे 80 से 100 टनेल में खेती कर रहे हैं। ‘हर टनेल में 5 से 10 मजदूरों को काम पर रखा है,’ तामांग ने बताया, ‘जमीन का किराया, मजदूरों की तनख्वाह, खाद और बीज के खर्च होते हैं, 10 रुपये में टमाटर बेचकर कैसे खर्च पूरा करें?’ अगले दिन सब्जी लदे वाहन रोक कर भी जब असर नहीं पड़ा तो किसान माइतीघर मंडला पहुंचे और प्रदर्शन किया। आंदोलन में शामिल सभी किसानों ने कहा, ‘खेत में खून-पसीना बहाकर उगाया है, लेकिन मूल्य निर्धारण बिचौलियाओं द्वारा होता है। कौड़ी नहीं मिलने से बेहतर है सड़क पर टमाटर फेंकना।’ यह कोई पहली बार नहीं जब किसान इस तरह सड़क पर अपनी उपज फेंककर विरोध कर रहे हैं। समस्या भी नई नहीं है। कुछ दिन पहले गोरखा के गण्डकी गाउपालिका-8 घ्यालचोक के किसानों ने खेत में उगे भांटा और बोड़ी को सड़क पर फेंकना पड़ा था जब बिचौलियों ने 5 से 12 रुपये की कीमत दी तो निवेश निकालना मुश्किल बताया। माल ढुलाई में 600 से 700 रुपये खर्च होने के बावजूद बेचने पर लागत नहीं निकल पाने की वजह से किसानों को अपनी उपज सड़क पर फेंकनी पड़ी। देश के कई हिस्सों में टमाटर, फूलगोभी, भिंडी, बोड़ी या दूध को सड़क पर फेंककर किसान अपनी समस्याएं दर्ज करा चुके हैं। यह स्थिति राज्य तंत्र की कमजोरी को दर्शाती है, जिसे किसी सरकार ने हल नहीं किया है। कृषिमंत्री चौधरी ने मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाले 100 दिन पूरे होने पर 25 असार को पत्रकार सम्मेलन में बिचौलिया खत्म करने और किसानों को उचित मूल्य दिलाने का वादा किया था। मंत्री चौधरी ने कृषि को देश की मुख्य आर्थिक आधार बनाने का संकल्प व्यक्त किया और बिचौलिया खत्म करने के लिए नीतिगत सुधार का हवाला दिया। उन्होंने न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने और किसान-मित्रतापूर्ण बाजार प्रबंधन के लिए सरकार की प्रतिबद्धता जताई। मंत्री ने किसानों की समस्याओं को समझने के लिए मंत्रालय में रात-दिन काम करने और कालाबाजारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का आश्वासन भी दिया। प्रधानमंत्री बालेंदर शाह की सरकार ने भी अपनी 100 दिन की कार्यसूची में कृषि उत्पादों की खरीद के लिए ऋण कारोबार का भुगतान अधिकतम 25 दिनों के भीतर अनिवार्य करने की घोषणा की थी। यदि भुगतान इस अवधि में न हो तो खरीदार को किसानों को ब्याजसहित भुगतान करने का निर्देश भी जारी करना था। लेकिन किसानों का कहना है कि सरकार का यह निर्णय अबतक व्यवहार में नहीं आया है। इस वजह से उन्हें प्रदर्शन करने पर मजबूर होना पड़ा है। वे कहते हैं कि यह सब दावे केवल भाषणों तक सीमित हैं। नीति सुधार के बावजूद कागज पर ही शक्तियां सुनवाई योग्य हैं और असल में बिचौलियाओं का जाल मजबूत है। किसान और उपभोक्ता दोनों पुरानी समस्याओं से जूझ रहे हैं। किसान के उचित मूल्य न मिलने से उपभोक्ता महंगा सामान खरीदने को मजबूर हैं, जैसा कि बुधवार को कालिमाटी फलफूल एवं सब्जी बाजार विकास समिति द्वारा प्रकाशित थोक मूल्य विवरण से स्पष्ट है। समिति के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक छोटे लोकल टमाटर का न्यूनतम थोक मूल्य 8 रुपये और अधिकतम 12 रुपये प्रति किलो है। औसतन किसानों को करीब 9.50 रुपये प्रति किलो मिलता है। टनेल में उगाए छोटे टमाटर का औसत मूल्य 14.60 रुपये है जबकि बड़े नेपाली टमाटर की औसत थोक कीमत 38.75 रुपये प्रति किलो है। लेकिन उपभोक्ताओं तक पहुंचने पर ये टमाटर 50 से 70 रुपये तक बिकते हैं। व्यापारी उपभोक्ताओं को महंगे दाम पर बेचकर यह जताते हैं कि किसानों को बेहतर मूल्य मिला। तरकारी व्यवसायियों ने किसानों के आरोपों को खारिज किया है। नेपाल फलफूल और सब्जी व्यवसायी महासंघ के अध्यक्ष भरतप्रसाद खतिवड़ा ने व्यापारियों को मूल्य न देने या सिंडिकेट बनाने के आरोप अस्वीकार करते हुए इसे अत्यधिक उत्पादन का परिणाम बताया। ‘हर साल टमाटर की कीमतें बाहर से आने की वजह से नहीं घटती, बल्कि देश में उत्पादन अधिक होने से कीमतें कम होती हैं,’ खतिवड़ा ने कहा, ‘मूल्य नियंत्रण को लेकर कोई कार्टेलिंग की शिकायत नहीं है।’ सलाद में उपयोग होने वाले बड़े टमाटर महंगे होते हैं लेकिन तरकारी और अचार के लिए टनेल व लोकल छोटे टमाटर का उत्पादन पर्याप्त होने से कीमतें कम हैं। उन्होंने कहा कि उपभोक्ताओं को अधिक खर्च करना पड़ता है क्योंकि थोक बाजार और खुदरा बाजार की दूरी है। ‘आम लोग थोक बाजार से दूर हैं, सूर्यविनायक, जोरपाटी, बानेश्वर, लगनखेल जैसे बाहरी बाजार अलग तरीके से संचालित होते हैं,’ खतिवड़ा ने बताया, ‘थोक बाजार में खरीदी पर कीमत 30-35 रुपये के करीब रहती है, लेकिन बाहर खुदरा दुकानों में यह नियंत्रण बाहर होता है।’ उन्होंने कहा कि वर्तमान में थोक बाजार में टमाटर की कीमतें विरोधाभासी रूप से 300 से 400 रुपये तक दर्ज की गई हैं। भारतीय टमाटर के कारण स्थानीय उत्पादन की कीमत न मिलने की बात कही जाती है, लेकिन खतिवड़ा के अनुसार अभी नेपाल में उत्पादन अधिक फसल हो रहा है और भारतीय टमाटर ज्यादा नहीं आया है। कालिमाटी तरकारी बाजार सूची में भारतीय टमाटर शामिल नहीं है। किसान कब तक ऐसा करेंगे? किसानों की मांग बहुत बड़ी नहीं है। वे चाहते हैं—कृषि बीमा, न्यूनतम समर्थन मूल्य, सुगम बाज़ार पहुंच और बिचौलियों का नियंत्रण। कृषि प्रधान देश में राज्य समय पर बाजार प्रबंधन न करने से किसान बार-बार अपनी पैदावार सड़क पर फेंककर विरोध कर रहे हैं। यह सरकार की कृषि नीति के प्रति सबसे बड़ी विडंबना है। मंत्री चौधरी के जैसे सचमुच बिचौलिया खत्म करने तथा किसान को अपनी पैदावार सड़क पर फेंकने की मजबूरी से राहत दिलाने के लिए सरकार को तुरंत बाज़ार संरचना में हस्तक्षेप करना होगा, विशेषज्ञ बताते हैं।
तस्वीर: आर्यन धिमाल





