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अरुण गुप्तो – तथ्य और कल्पना के बीच यात्रा करने वाले यायावर

समाचार सारांश

संपादकीय समीक्षा।

  • अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक अरुण गुप्तो ने कपिलवस्तु और लुम्बिनी क्षेत्र की पृष्ठभूमि पर आधारित अपनी नई पुस्तक ‘Cracks in the Wind’ जारी की है।
  • यह कृति केवल आत्मकथा नहीं, बल्कि तथ्य और कल्पना का मिश्रण है, जो तराई-मधेस के बहुसांस्कृतिक समाज को जीवंत रूप में प्रस्तुत करती है, लेखक ने बताया।
  • प्राध्यापक गुप्तो वर्तमान में फ्लोरेंस और काठमांडू की कला तथा प्यालेस्टाइन को लेकर दो नई पुस्तकों पर काम कर रहे हैं।

अंग्रेजी साहित्य, आलोचना और सांस्कृतिक सिद्धांत के शिक्षक अरुण गुप्तो की बौद्धिक पहचान काफी विशिष्ट है।

उनकी संस्कृति और आलोचना सिद्धांत की पुस्तकें राउटलेज और रूपा जैसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों से प्रकाशित हो चुकी हैं। लेकिन इस बार उन्होंने एक अलग शैली में प्रस्तुत किया है।

रूपा पब्लिकेशन से हाल ही में प्रकाशित उनकी नई पुस्तक ‘Cracks in the Wind: Memoirs from Lumbini’ कोई थियोरिटिकल संवाद नहीं, बल्कि उनका बचपन, किशोरावस्था और तराई-मधेस के सीमांत समाज का जीवंत चित्रण है।

कपिलवस्तु के बहादुरगंज और लुम्बिनी क्षेत्र की पृष्ठभूमि में आधारित यह कृति केवल आत्मकथा नहीं है; इसमें तथ्य और कल्पना का संगम मिलता है। लेखक गुप्तो से इस पुस्तक और इसके अनोखे पात्रों पर बातचीत प्रस्तुत है:

आपकी नई पुस्तक ‘Cracks in the Wind: Memoirs from Lumbini’ हाल ही में प्रकाशित हुई है। अकादमिक नजरिये से मेमोअर को आप कैसे परिभाषित करते हैं?

यह पुस्तक केवल आत्मकथा नहीं है। अंग्रेजी साहित्य के अनुसार यह ‘मेमोअर’ है। मेरी समझ में ऑटोबायोग्राफी और मेमोअर में कुछ भिन्नता होती है। ऑटोबायोग्राफी में तथ्य होते हैं, मेमोअर में कुछ हद तक कल्पना भी मिलती है। यह मेरी कपिलवस्तु और लुम्बिनी क्षेत्र की बचपन तथा किशोरावस्था की कहानी है। लेकिन यह केवल मेरी निजी कहानी नहीं है; उस समय की सामाजिक परिवर्तन की कहानी भी है।

भारत की सीमा से लगे होने के कारण यहाँ अवधि, भोजपुरी और पहाड़ी समुदाय हैं; हिंदी और नेपाली भाषी लोग हैं। यह बहुसांस्कृतिक और वहां के लोगों की कहानी है।

जब आप तथ्य और कल्पना मिलाकर ‘फैक्ट एंड फिक्शन’ लिखते हैं तो कहीं यथार्थ खो जाने या पाठक का विश्वास कम होने का जोखिम नहीं होता?

यह एक बड़ी चिंता थी। लेकिन कहानी बहादुरगंज, कपिलवस्तु और बुद्ध के स्थल की पृष्ठभूमि पर आधारित है। मैंने बुद्ध का चरित्र तो नहीं बनाया, पर बुद्ध के विचारों जैसे पवित्र, गैर-राजनीतिक और स्वच्छ सोच रखने वाले पात्र बनाए। इसलिए बीच-बीच में मैजिकल रियलिज्म का प्रयोग किया है। बुद्धत्व जैसे विषय के लिए थोड़ी फिक्शन जरूरी थी, लेकिन मैं तथ्य आधारित फिक्शन पर ही रहा।

उदाहरण के लिए, मैंने बुद्ध की भिक्षुणी ‘खेमा’ का पात्र रचा, जिसे भारत के एक भिक्षु ने हमारे गाँव के हाई स्कूल में छोड़ दिया था और तीर्थयात्रा की। खेमा मेरी कक्षा की साथी थी। उस पुरुषप्रधान समाज में दोस्तों को पढ़ने और खेल में हिस्सा लेने नहीं देने को देखकर वह असंतुष्ट होकर जंगल चली जाती है। वहां मैंने बुद्ध की एक ‘छवि’ बनाने के लिए मैजिक या फिक्शन का इस्तेमाल किया।

पहले आपने साहित्य आलोचना, सिद्धांत, कला-संस्कृति और पुरातत्व जैसे विषयों में लिखा था। अब पिछले समाज और इतिहास की ओर क्यों मुड़े?

इसके दो कारण हैं। पहला, मेरे आसपास कई अनोखे पात्र थे, जिनके बारे में लिखने के लिए कल्पना का उपयोग करना पड़ा। दूसरा, वरिष्ठ प्राध्यापक श्रीधर लोहनी ने अपनी पुस्तक के बारे में कहा, “तुम हमेशा सिद्धांत पढ़ाते हो, पर इस किताब में तुमने सिद्धांत को मूर्त रूप दिया है।”

मुझे भी लगता है कि सैद्धांतिक लेखन रचनात्मक लेखन में बाधा नहीं डालता, लेकिन उसे मूर्त रूप देना लेखक की क्षमता पर निर्भर करता है।

जब मैं भारत के बाजार में यह किताब लेकर गया, तो वहाँ के प्रकाशक विश्वास नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने कहा, “तुम तो सिद्धांत पढ़ाने वाले हो, ऐसा उपन्यास कैसे लिखा?” लेकिन पांडुलिपि पढ़ने के बाद तीन-चार महीने में ही प्रकाशित कर दी।

उपन्यास या मेमोअर लिखने में 12 साल क्यों लगे?

मैं हमेशा कहता हूं कि रचनात्मक किताब लिखने में समय लगता है। किरण देसाई ने भी ‘The Inheritance of Loss’ लिखने में 9-10 साल लगाये। जल्दी में पात्रों का निर्माण अच्छा नहीं होता। मैं सैद्धांतिक किताबें जल्दी लिख लेता हूं। मेमोअर लिखने में 12 साल लगे। समय से पात्र का विस्तृत रूप और आंतरिक संवाद उभरता है। हेमिंग्वे ने भी ‘The Old Man and the Sea’ में पात्र के आंतरिक भाव को व्यक्त करने में काफी समय लगाया।

क्या आप एक साथ एक ही किताब पर काम करते हैं या विभिन्न विधाओं में हाथ डालते हैं?

मैं रविन्द्रनाथ टैगोर की बात याद करता हूं कि “पेशा में बदलाव से शांति आती है।” कभी-कभी एक ही विधा में लंबे समय तक लिखने से मन थक जाता है, तो कुछ महीने लिखना बंद कर देता हूं। बाद में देखता हूं तो गलतियां दिखती हैं और संपादन आसान होता है। उपन्यास लिखते हुए सैद्धांतिक लेखन में चला जाता हूं और इस तरह दोनों शैलियों का प्रदर्शन करता हूं। इसलिए दो-तीन विधाओं की किताबें एक साथ लिखता हूं।

क्या आप हमेशा फैक्ट और फिक्शन के बीच सत्य खोजते रहते हैं?

हाँ, मुझे यही पसंद है। मैं धार्मिक व्यक्ति नहीं हूं, लेकिन काठमांडू की देवी और मिथकों के प्रति गहरा लगाव रखता हूं। काठमांडू में 15-20 अलग-अलग देवी हैं। यदि हम केवल धार्मिक नियमों से उन्हें देखें और फिक्शनल न बनायें, तो उस पुरानी घाटी की मिथकीयता समझ नहीं आएगी। फैक्ट और फिक्शन हमेशा साथ-साथ चलना चाहिए। फिक्शन झूठ नहीं होती, यह सत्य को और प्रसिद्ध बनाती है। मैं दोनों को साथ मिलाने की कोशिश करता हूं।

आपकी अगली पुस्तक किस विधा में आने वाली है?

मैं अभी दो किताबों पर काम कर रहा हूं। एक में फ्लोरेंस और काठमांडू की कला और संस्कृति में समानता दिखाने की कोशिश कर रहा हूं। अपनी बेटी के साथ मिलकर ‘Dimensions of Art: From Florence to Kathmandu’ लिख रहा हूं।

दूसरी किताब प्यालेस्टाइन के युद्ध और वहां की पीड़ादायक घटनाओं पर आधारित मैजिकल रियलिस्टिक कहानी है, जो गैब्रियल गर्सिया मार्केज की शैली के करीब है।

तस्वीर और वीडियो – शंकर गिरी