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सड़क सुविधा से गांव लौटने लगे ग्रामीण

समाचार सारांश

  • तमोर कॉरिडोर निर्माण के बाद धनकुटा के दुर्गम क्षेत्रों में सड़क पहुंचने से विस्थापित हुए स्थानीय लोग अपने गांव लौटने लगे हैं।
  • सड़क के जरिए कृषि उत्पाद का बाजार सुनिश्चित होने पर फलामेटार क्षेत्र के महेन्द्र न्यौपाने सहित किसानों ने व्यावसायिक फलोत्पादन में निवेश बढ़ाया है।
  • चौबिसे गाउँपालिका के अध्यक्ष राजकुमार चेम्जोंग के अनुसार सड़क के साथ-साथ विद्युत और संचार सेवाओं के विस्तार से पलायन करने वाले परिवार फिर से गांव लौट रहे हैं।

४ साउन, धनकुटा। पहले फलामेटार पहुंचने के लिए चार-पाँच घंटे की कड़ी चढ़ाई-उतारचढ़ाव करनी पड़ती थी। बीमार पड़ने पर डोको में अस्पताल ले जाना पड़ता था। गांव में फल तो उगते थे, लेकिन बाजार तक न पहुंच पाने की वजह से फल सड़ जाते थे। इस कारण कई लोग अपने पैतृक गांव छोड़ गए थे। कुछ मुख्यालय की ओर गए, तो कुछ शहर की तरफ निकले थे।

लेकिन अब वहीं गांव में फिर से रौनक लौट आई है। इस बदलाव की मुख्य वजह बनी है—सड़क।

तमोर कॉरिडोर निर्माण के बाद धनकुटा के पहाड़ी क्षेत्रों के दुर्गम बस्तियों तक सड़क पहुंची, जिससे सालों पहले विस्थापित हुए परिवार अपने गांव लौटने लगे हैं। सड़क ने सिर्फ दूरी ही कम नहीं की, बल्कि गांव में संभावनाओं के नए द्वार भी खोले हैं।

चौबिसे गाउँपालिका–४ फलामेटार के महेन्द्र न्यौपाने उस बदलाव के जीता जागता उदाहरण हैं। लगभग दो दशक पहले विदेशी रोजगार से लौटकर वे गांव में कुछ करने का सपना देख रहे थे, लेकिन सड़क, बाजार और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण धनकुटा मुख्यालय में रहने को मजबूर थे।

गांव में फलोत्पादन होता था, लेकिन बाजार तक पहुंचाने का तरीका नहीं था। फल पकने के बाद खुद खाने, रिश्तेदारों को देने और बाकी फल सड़ने के हालात बने रहते थे। बीमार होने पर अस्पताल जाना भी कठिन था, इसलिए उन्हें गांव छोड़ना पड़ा।

लेकिन तमोर कॉरिडोर बनने के बाद उनकी सोच बदल गई।

चौबिसे गाउँपालिका–४ फलामेटार के महेन्द्र न्यौपाने

आजकल वे आधा समय गांव में और आधा समय मुख्यालय में बिताते हैं। गांव लौटने के बाद लगभग ३० रोपनी जमीन पर आम, एवोकाडो, सुपारी, सजिवन सहित विभिन्न व्यावसायिक फलोत्पादन का विस्तार किया है।

‘पहले फल बेचने का रास्ता नहीं था,’ उन्होंने कहा, ‘अब व्यापारी सीधे बगिया तक आते हैं। चाहे मुख्यालय हो या धरान-इटहरी, बेचने में सुविधा हुई है। खाद, बीज और अन्य सामग्री लाने में भी कोई समस्या नहीं है।’

उनके अनुभव से साफ समझ आता है कि सड़क ने कृषि में कितना बदलाव लाया है।

फलामेटार धनकुटा की सबसे दुर्गम बस्तियों में से एक माना जाता था। वर्षा के मौसम में गांव बाहरी दुनिया से लगभग कट जाता था। लेकिन अब सड़क के साथ विद्युत, पेयजल, संचार और परिवहन सेवाओं का विस्तार हुआ है। इससे स्थानीय उत्पाद आसानी से बाजार तक पहुंचे हैं और दैनिक आवश्यक सामग्री गांव में उपलब्ध होने लगी है।

ऐसा ही बदलाव स्मृति लिम्बू के परिवार को भी गांव लौटने पर मजबूर कर गया।

सुविधाओं के अभाव में २०७८ में गांव छोड़ चुके उनके परिवार ने कुछ वर्षों बाद फिर से अपने गांव लौटना शुरू कर दिया है। अब वे गांव में ही व्यवसाय कर रहे हैं।

‘पहले बहुत सुविधाएं नहीं थीं, बीमारी पड़ने पर तो और मुश्किल होती थी,’ लिम्बू ने कहा, ‘अब सड़क के कारण सामान लाना आसान हो गया है। शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार में भी सुविधा हुई है, इसलिए हम फिर से गांव लौट आए।’

केवल फलामेटार ही नहीं, तमोर कॉरिडोर के तहत आने वाले सदामटार, हंसमोरङ और भैंसेटार जैसे क्षेत्रों में भी पलायन किए परिवार लौटने लगे हैं।

स्थानीय विनोद भंडारी के अनुसार, फलामेटार के अलावा अन्य क्षेत्रों से भी कुछ परिवार गांव लौटे हैं।

घर लौटे कुछ किसान कृषि शुरू कर चुके हैं, कुछ होटल और दुकानें चला रहे हैं, जबकि कई पुराने घरों की मरम्मत कर स्थायी रूप से बस गए हैं।

‘पहले गाड़ी पकड़ने के लिए चार-पांच घंटे पैदल चलना पड़ता था,’ भंडारी याद करते हैं, ‘उत्पाद बेच पाना मुश्किल था। अब गाड़ी सीधे गांव आती है और सामान भी वहीं पहुंच जाता है। जीवन बहुत आसान हो गया है।’

सड़क के कारण बंजर खेत फिर से हरियाली से भरने लगे हैं। उत्पाद बाजार तक पहुंचने के भरोसे से किसानों की फसल में पूंजी लगाने की संख्या बढ़ी है।

चौबिसे गाउँपालिका के अध्यक्ष राजकुमार चेम्जोंग के अनुसार, हाल के वर्षों में सड़क नेटवर्क के विस्तार से धनकुटा की सातों स्थानीय इकाइयों में गांव लौटने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

उनका कहना है कि सड़क के साथ-साथ गांव-गांव में विद्युत, पेयजल, इंटरनेट और टेलीफोन सेवाएं पहुंची हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कृषि बाजार और स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाने से पलायन को और प्रभावी तरीके से रोका जा सकेगा।

धनकुटा के पहाड़ी इलाकों में सड़क ने सिर्फ परिवहन सुविधा ही नहीं दी है, बल्कि गांव छोड़ चुके लोगों को अपनी मिट्टी से जुड़ने का आत्मविश्वास भी दिया है।

एक समय सुनसान होते जा रहे बसेरा में फिर से बच्चों की हँसी गूंजने लगी है, खेत-खलिहान हराभरा दिखने लगे हैं और ग्रामीण भविष्य की तलाश में शहर की बजाय अपने गांव की ओर लौट रहे हैं।

यह बदलाव दर्शाता है कि कभी-कभी एक सड़क सिर्फ दो जगहों को ही नहीं जोड़ती, बल्कि टूटे रिश्तों को भी जोड़े।