ऊर्जा और जलस्रोत प्रबंधन में प्रदेशों ने संघीय सरकार के साथ ‘थ्री एस’ प्रस्ताव प्रस्तुत किया

समाचार सारांश
संपादकीय समीक्षा की गई।
- प्रदेश सरकार ने ऊर्जा एवं जलस्रोत प्रबंधन में संघ, प्रदेश और स्थानीय तह के बीच समन्वय, सहअस्तित्व और सहयोग को लागू करने की नीति की मांग की है।
- नदियों का वैज्ञानिक वर्गीकरण कर स्ट्रालर ऑर्डर प्रणाली के अनुसार तीनों सरकारों के अधिकार क्षेत्र स्पष्ट करने का विधेयक में प्रस्ताव है।
- ऊर्जा मंत्रालय विद्युतीय उपकरणों में ऊर्जा दक्षता लेबलिंग अनिवार्य करने तथा जलस्रोत संबंधी विधेयक संसद में पेश करने की तैयारी कर रहा है।
५ सावन, काठमांडू। प्रदेश सरकार ने ऊर्जा तथा जलस्रोत के उपयोग, संचालन और प्रबंधन के मामले में संघीय सरकार के समक्ष ‘थ्री एस’ (समन्वय, सहअस्तित्व और सहयोग) नामक प्रस्ताव प्रस्तुत किया है।
ऊर्जा, जलस्रोत और सिंचाई मंत्रालय द्वारा आज आयोजित सातों प्रदेशों के ऊर्जा मंत्रियों और ऊर्जा सचिवों की भागीदारी में हुए विषयगत समिति के बैठक में प्रदेशों ने यह प्रस्ताव रखा।
बैठक में मंत्रालय द्वारा ‘जलस्रोत संबंधी प्रचलित कानून संशोधन एवं एकीकरण के लिए तैयार विधेयक’ और ‘नवीकरणीय ऊर्जा तथा ऊर्जा दक्षता से संबंधित विधेयक’ पर प्रदेश सरकारों से विचार-विमर्श किया गया।
प्रदेशों की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए: मांग
चर्चा के दौरान प्रदेश मंत्री और सचिवों ने प्रस्तावित विधेयक में प्रदेश सरकार की भूमिका, अधिकार, जिम्मेदारियां और प्रबंधन स्पष्ट नहीं होने की बात कही। उन्होंने संघ, प्रदेश और स्थानीय तह के बीच समन्वय, सहअस्तित्व तथा सहयोग व्यवहार में लागू करने पर ज़ोर दिया।
बैठक की जानकारी देते हुए ऊर्जा मंत्रालय के सहसचिव महेश्वर श्रेष्ठ ने बताया कि प्रदेशों ने अधिकारों के दोहरेपन को समाप्त करने की मांग उठाई।
‘अभी तक एक ही नदी या क्षेत्र में संघ, प्रदेश और स्थानीय तह सभी बार-बार कार्य कर रहे हैं, लेकिन आवश्यक समन्वय नहीं है,’ उन्होंने कहा, ‘प्रदेशों की मुख्य चिंता थ्री एस अर्थात समन्वय, सहअस्तित्व और सहयोग की अवधारणा व्यवहार में लागू नहीं हो पाई है।’
उनके अनुसार मंत्रालय ने तीनों सरकारों के बीच प्रभावी समन्वय कर सहयोग तथा सहअस्तित्व के आधार पर कार्य करने का प्रतिबद्धता जताई है। जलस्रोत एवं नवीकरणीय ऊर्जा संबंधित दोनों विधेयकों में प्रदेश तथा स्थानीय तह के सुझाव शामिल किए जाएंगे।
नदियों का वैज्ञानिक वर्गीकरण किया जाएगा
प्रस्तावित जलस्रोत विधेयक के माध्यम से नदियों का वैज्ञानिक वर्गीकरण कर तीनों सरकारों के अधिकार क्षेत्र स्पष्ट रूप से बांटा जाएगा।
सचिव श्रेष्ठ के अनुसार नदी के आकार और प्रवाह के आधार पर प्रबंधन की जिम्मेदारी तय करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित ‘स्ट्रालर ऑर्डर’ प्रणाली अपनाई जाएगी।
इस प्रणाली के अनुसार पहले और दूसरे ऑर्डर की छोटी नदियाँ और सहायक नदियाँ स्थानीय तह के अधिकार क्षेत्र में आएंगी। तीसरे ऑर्डर की मध्यम आकार की नदियाँ प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी होंगी, जबकि चौथे ऑर्डर और उससे ऊपर की नदियाँ, जैसे कोशी, गंडकी, कर्णाली और अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से जुड़ी नदियाँ संघीय सरकार के क्षेत्राधिकार में आएंगी।
‘अभी एक ही नदी में तीनों सरकारों के अधिकार मिलने से भ्रम की स्थिति है,’ श्रेष्ठ ने कहा, ‘वैज्ञानिक वर्गीकरण से अधिकारों के दोहरेपन को हटाकर समन्वय और सहअस्तित्व मजबूत होगा।’
ऊर्जा दक्षता में ‘स्टार लेबलिंग’ अनिवार्य होगी
चर्चा का एक अन्य महत्वपूर्ण विषय नवीकरणीय ऊर्जा तथा ऊर्जा दक्षता संबंधित विधेयक था। इस विधेयक के तहत ऊर्जा संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए विद्युत उपकरणों में ३ से ५ तारों तक की ऊर्जा दक्षता लेबलिंग अनिवार्य की जाएगी और उपकरण के गुणवत्ता के नियमन का प्रावधान होगा।
प्रदेश मंत्रियों ने अधिकार वितरण में व्यवहारिक पक्षों को भी ध्यान में रखने की सलाह दी। मंत्रालय ने प्राप्त सुझावों को शामिल कर विधेयक को अंतिम रूप देकर कानून मंत्रालय को भेजने की तैयारी की सूचना दी है।
स्थायी विकास के लिए तीनों स्तरों के बीच सहयोग आवश्यक : मंत्री श्रेष्ठ
बैठक में ऊर्जा मंत्री विराटभक्त श्रेष्ठ ने कहा कि ऊर्जा एवं जलस्रोत क्षेत्र के स्थायी विकास के लिए संघ, प्रदेश और स्थानीय तह के बीच प्रभावी समन्वय, साझा स्वामित्व एवं परिणाममुखी सहयोग जरूरी है।
संविधान द्वारा परिकल्पित समृद्ध नेपाल का लक्ष्य तीनों स्तरों की सरकारों के सहयोग से ही प्राप्त हो सकता है, उनका कहना था।
उन्होंने बैठक को केवल चर्चा तक सीमित न रखते हुए संयुक्त कार्ययोजना, स्पष्ट जिम्मेदारियां, समय पर कार्यान्वयन और नियमित निगरानी के लिए आधार तैयार करने का अवसर मानने का आह्वान किया।
मंत्री श्रेष्ठ ने बताया कि सरकार ने नदियों को केवल जलस्रोत के रूप में नहीं बल्कि सभ्यता, संस्कृति, जैव विविधता, पर्यावरणीय संतुलन और मानव अस्तित्व के आधार के रूप में संरक्षण की नीति अपनाई है।
धार्मिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और सामाजिक महत्व की नदियों का वैज्ञानिक अध्ययन होगा और नदी से जुड़े आदिवासी समुदायों की परंपरा, संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्य राष्ट्रीय सम्पदा के रूप में संरक्षित किए जाएंगे।
उनके अनुसार नदी संरक्षण, वैज्ञानिक प्रबंधन और सतत उपयोग को केंद्र में रखकर नया जलस्रोत नीति और कानूनी संरचना तैयार करने की प्रक्रिया चल रही है।
‘वाटर ऑडिट’ और ‘रिवर बेस्ड मास्टर प्लान’ जैसे योजनाओं के माध्यम से जलस्रोत का संरक्षण और उपयोग संभव होगा, उन्होंने जोर दिया।
विधेयक संसद में प्रस्तुत करने की तैयारी
मंत्री श्रेष्ठ ने कहा कि संघीय शासन व्यवस्था के अनुसार जलस्रोत विधेयक का मसौदा तैयार हो चुका है और इसे इसी संसद सत्र में पेश करने की तैयारी है।
प्रदेश सरकारों से चर्चा के बाद विधेयक को अंतिम रूप देकर कानून मंत्रालय को भेजा जाएगा और फिर संसद में प्रस्तुत किया जाएगा।
संविधान में प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग का अधिकार तीनों स्तरीय सरकारों को दिया गया है, उन्होंने कहा कि विधेयक पारित होने पर प्रदेश और स्थानीय तह अपने अधिकार क्षेत्र में आवश्यक कानूनी प्रावधान बना सकेंगे।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी स्तरों की सरकारों की अपनत्व सुनिश्चित करते हुए कानून निर्माण के लिए मंत्रालय प्रतिबद्ध है।
बैठक में जलस्रोत विकास, उपयोग तथा संरक्षण के लिए संघ, प्रदेश और स्थानीय तह के बीच प्रभावी समन्वय, जलस्रोत तथा जलविद्युत परियोजनाओं में अधिकार और जिम्मेदारी का स्पष्ट वितरण, सतह और भूमिगत जलस्रोत संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण, जल पुनर्भरण क्षेत्र संरक्षण, एकीकृत जलस्रोत प्रबंधन और नवीकरणीय ऊर्जा प्रचार जैसे विषयों पर भी विस्तृत चर्चा हुई।
प्रतिभागियों ने जलस्रोत के सतत उपयोग एवं नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के लिए तीनों स्तरों की सरकारों के बीच स्पष्ट भूमिका, कानूनी व्यवस्था और प्रभावी समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया।





