दक्षिण एशिया में यौन हिंसा पीड़ितों को क्षतिपूर्ति प्राप्त करने में चुनौतियां

न्याय की उपलब्धि के लिए दक्षिण एशियाई अभियान ने नेपाल सहित दक्षिण एशिया के छह देशों में यौन हिंसा पीड़ितों के लिए क्षतिपूर्ति तक पहुँच के संबंध में किए गए अध्ययन का प्रतिवेदन प्रकाशित किया है। ६ साउन, काठमाडौं। दक्षिण एशिया में यौन हिंसा पीड़ितों को क्षतिपूर्ति प्राप्त करने से जुड़ा एक व्यापक अध्ययन प्रतिवेदन सार्वजनिक किया गया है। यह प्रतिवेदन न्याय समावेशी अभियान नामक दक्षिण एशियाई नेटवर्क द्वारा नेपाल, भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका और मालदीव में एक ही समय में जारी किया गया है।
२७ सदस्य संस्थाओं वाले दक्षिण एशियाई सामाजिक नेटवर्क समाज द्वारा किए गए अध्ययन पर आधारित इस प्रतिवेदन ने क्षेत्रीय स्तर पर यौन हिंसा पीड़ितों के लिए क्षतिपूर्ति, न्याय तक पहुँच और कानूनी व्यवस्थाओं की स्थिति का विश्लेषण किया है। प्रतिवेदन में बांग्लादेश, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका में यौन हिंसा पीड़ितों के लिए उपलब्ध क्षतिपूर्ति प्रणाली, कानूनी प्रावधानों और व्यावहारिक कार्यान्वयन का उच्च स्तरीय समीक्षा की गई है। अध्ययन में अधिकांश दक्षिण एशियाई देशों में यौन हिंसा पीड़ितों के लिए न्याय और क्षतिपूर्ति प्राप्त करना अभी भी एक चुनौती बना हुआ है, इसका निष्कर्ष निकाला गया है।
प्रतिवेदन के अनुसार, नेपाल का अपराध पीड़ित संरक्षण अधिनियम, २०७५ पीड़ितों के अधिकारों के संरक्षण के लिए दक्षिण एशिया में सबसे व्यवस्थित और मजबूत कानूनी संरचना प्रदान करता है। हालांकि, द्वंद्व कालीन यौन हिंसा के पीड़ित अभी भी प्रभावकारी क्षतिपूर्ति प्राप्त करने में असमर्थ हैं, यह भी प्रतिवेदन में उल्लेखित है। अध्ययन ने नेपाल को यौन हिंसा पीड़ितों के अधिकार संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट अभ्यास प्रस्तुत करने वाले दो देशों में से एक के रूप में पहचाना है, जो अन्य देशों के लिए सीखने का उदाहरण है।
अंत में, प्रतिवेदन ने दक्षिण एशियाई सरकारों, दाता संगठनों और नागरिक समाज संस्थाओं से यौन हिंसा पीड़ितों के लिए प्रभावी और त्वरित क्षतिपूर्ति प्रणाली लागू करने के लिए ठोस कदम उठाने का आह्वान किया है। विशेष रूप से बांग्लादेश, पाकिस्तान और मालदीव में, चाहे दोषी फौजदारी मामले में प्रमाणित हो या न हो, पीड़ितों को सीधे सम्बोधित करने वाला राष्ट्रीय क्षतिपूर्ति कोष स्थापित करने का आग्रह किया गया है। इससे पीड़ितों को दोषी प्रमाणित होने तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा और वे समय पर राहत तथा क्षतिपूर्ति प्राप्त कर सकेंगे, ऐसा विश्वास व्यक्त किया गया है।





