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राहुल गांधी के धरने के बाद मोदी सरकार के मंत्री क्यों तुरंत पहुँचे?

समाचार सारांश

संग्रहित तथ्यों पर आधारित। संपादकीय समीक्षा के बाद।

  • राहुल गांधी ने मंगलवार को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास के बाहर अचानक धरना दिया, जिसके बाद मोदी सरकार ने वार्ता के लिए मंत्री जितेंद्र सिंह को भेजा।
  • नीट पेपर लीक मामले को लेकर संसद में चर्चा के लिए सरकार तैयार होने के कारण राजनीतिक विश्लेषक इसे दबाव का संकेत मान रहे हैं।
  • विपक्षी नेताओं के प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन के दौरान सरकार की विनम्रता को सार्वजनिक धारणा में सरकार के खिलाफ मजबूती का संकेत माना जा रहा है।

6 साउन, काठमाडौं। राहुल गांधी ने मंगलवार को नई दिल्ली के 7 लोक कल्याण मार्ग स्थित प्रधानमंत्री आवास के बाहर अचानक धरना दिया। यह किसी को भी पहले से पता नहीं था। राहुल के धरने पर बैठने के बाद ही मीडिया को इसकी जानकारी हुई।

विपक्ष के कई नेता CJP और सोनम वांगचुक के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने जन्तर मंतर जा रहे थे। तभी राहुल ने 7 लोक कल्याण मार्ग पर धरना देने का निर्णय लिया।

उस दिन NCP (शरद पवार समूह) के प्रमुख शरद पवार और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल जन्तर मंतर पहुंचे थे। वे प्रदर्शनकारियों से मिले।

सुप्रिया सुले भी 7 लोक कल्याण मार्ग पहुंची, जहां राहुल गांधी और प्रियंका गांधी धरने पर थीं। बाद में उन्हें वहां से गिरफ्तार करके ले जाया गया।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मोदी सरकार ने तुरंत राहुल गांधी से वार्ता करने का आग्रह किया। 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी सरकार का विपक्षी विरोध पर इस तरह सक्रिय होना दुर्लभ है।

प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह को सरकार की ओर से राहुल से वार्ता करने की जिम्मेदारी दी गई।

जितेंद्र सिंह ने बताया कि सरकार नीट पेपर लीक और CJP के नेतृत्व वाले प्रदर्शन के दौरान प्रशासनिक व्यवहार पर बात करने को तैयार है।

शुरुआत में राहुल ने सहमति जताई, लेकिन बाद में पीछे हट गए, जितेंद्र सिंह ने बताया।

दिल्ली पुलिस ने राहुल को 7 लोक कल्याण मार्ग से हटाया और फिर उन्हें हिरासत में लिया।

सरकार की यह ‘विनम्रता’ क्यों?

जितेंद्र सिंह ने कहा, “जब हम वहां पहुंचे, तो मैंने बहुत सम्मानपूर्वक राहुल से आग्रह किया कि विरोध प्रदर्शनों से समाधान नहीं निकलेगा। यदि सरकार संसद में नीट परीक्षा, पेपर लीक और संबंधित मुद्दों पर चर्चा करने को तैयार है, तो धरना स्थगित किया जा सकता है और सहयोग संभव होगा।”

मोदी सरकार के इस व्यवहार को कई राजनीतिक विश्लेषकों ने अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है।

पंजाब विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र प्रोफेसर आशुतोष कुमार का कहना है कि संसद में चर्चा के लिए तत्पर होना सरकार के दबाव में होने का स्पष्ट संकेत है।

प्रो. कुमार कहते हैं, “सरकार दबाव में है। भारत की जनसंख्या में युवा प्रचुर हैं। युवा मतदाता भी हैं, जो पहले मोदी समर्थक थे। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। बीजेपी को वोट गंवाने का डर है। नीट मध्यम वर्ग का मुद्दा है, जिसमें 20 से 25 प्रतिशत मतदाता मोदी समर्थक थे।”

“मध्यम वर्ग अत्यंत महत्वाकांक्षी है। सरकार ने तत्काल प्रतिक्रिया विपक्ष के प्रति प्रेम से नहीं दी, यह डर से हुई है। ‘न खाऊंगा न खिलाऊंगा’ का भ्रम टूट रहा है। यह छवि पर असर डाल रहा है। सरकार को इसे समझना होगा।”

“यह सरकार के लिए एक ‘जागरण कॉल’ है। पेपर लीक ने शहरी और मध्यम वर्ग को धोखा दिया है। सरकार की मजबूत छवि कमजोर हुई है। अब सरकार सार्वजनिक बहस के लिए तैयार है।”

राहुल के विरोध प्रदर्शन को सोमवार शाम भारत के सभी टीवी चैनलों ने प्राथमिकता से दिखाया। भारत में टीवी चैनलों का जनमत निर्माण पर बड़ा प्रभाव होता है।

राहुल ने CJP के जन्तर मंतर के प्रदर्शन से अलग जगह चुनी।

मोदी सरकार की रणनीति

मंगलवार शाम वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा, “यह दुर्लभ दिनों में से एक है। राहुल गांधी लगभग सभी खबरों में हैं। इस बार खास बात यह है कि विपक्ष नहीं, सरकार सवालों के जवाब देने को बाध्य है।”

प्रो. कुमार का अनुमान है कि तत्काल वार्ता करना और फिर पीछे हटना सरकार की रणनीति हो सकती है।

कुमार कहते हैं, “मीडिया में राहुल की बातें आनी शुरू हो गई थीं। मोदी इसे लगातार चलने नहीं दे सकते थे। खेल अभी बाकी है।”

राजदीप सरदेसाई सार्वजनिक धारणा के अनुसार सरकार को कठघरे में खड़ा बताते हैं।

उन्होंने कहा, “संसद सत्र चल रहा है। CJP के संसद मार्च में बड़ी भीड़ थी। विपक्षी नेता प्रधानमंत्री आवास के बाहर थे। ऐसी स्थिति में मीडिया सरकार को समर्थन के लिए बहुत देर तक नहीं दे सकता। सार्वजनिक धारणा यह दिखाती है कि सरकार दबाव में है। इसलिए सरकार वार्ता के लिए तैयार नहीं है कहना गलत होगा।”

उन्होंने आगे कहा, “सरकार को वार्ता करनी पड़ी। आज के समय में धारणा बहुत महत्वपूर्ण है। नड्डा जी ने CJP के प्रवक्ता से मिला। जितेंद्र सिंह राहुल से वार्ता के लिए पहुंचे।”

“मैं यह नहीं कह सकता कि मोदी की छवि कमजोर हुई है। बीजेपी चुनाव जीत रही है। जनता में थकान है। लोग सवाल पूछ रहे हैं। जेन जेड के समझ आने के बाद मोदी के अलावा कोई प्रधानमंत्री नजर नहीं आता। यह थकान क्रोध में बदलेगी या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है।”

राहुल ने जन्तर मंतर की बजाय 7 लोक कल्याण मार्ग क्यों चुना?

सोमवार को CJP के संसद मार्च में भारी भीड़ थी।

राहुल पहले से ही नीट पेपर लीक के विषय पर अभियान चला रहे थे। लेकिन CJP के आंदोलन से बहुत से लोग जुड़े हुए थे।

यह कांग्रेस और राहुल के लिए चुनौती थी। अभिजीत दीपक का पिछला आम आदमी पार्टी से संबंध कांग्रेस के लिए असुविधाजनक था। वे राहुल की भारत जोड़ो यात्रा का विरोध करते थे और कटाक्ष भी करते थे।

प्रो. कुमार के अनुसार, राहुल अपने मुद्दे का श्रेय दूसरों को देना नहीं चाहते थे। अभिजीत का अतीत कांग्रेस के लिए परेशानी बनता।

राजदीप सरदेसाई कहते हैं, “सोमवार के संसद मार्च में CJP का बड़ा असर था। वहां नयापन था। दूसरी ओर यह मुद्दा कांग्रेस ने उठाया, इसलिए राहुल ने भी महसूस किया। आम आदमी पार्टी CJP का समर्थन कर रही थी। कांग्रेस को टेकओवर का डर था, इसलिए उसने पहले ही एक अन्य मोर्चा खोल दिया।”

राजदीप कहते हैं, “विपक्षी नेताओं के प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन के बाद मीडिया ने आवश्यक कवरेज दिया। इसका फायदा भी हुआ, मीडिया इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता था।”

नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से यह सवाल लगातार उठता रहा है कि क्या राहुल उन्हें चुनौती दे पाएंगे या नहीं।

संसद के मानसून सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने राहुल पर निशाना साधा था।

राहुल के खिलाफ आलोचनाएँ

राहुल के खिलाफ मुख्य दो आलोचनाएँ हैं। पहला, वे राजनीतिक परिवार से आए हैं। भारत में राजनीति अब वंशवाद से आगे बढ़ रही है। अब सामान्य पृष्ठभूमि के नेता उभर रहे हैं। नरेंद्र मोदी इसका मुख्य उदाहरण हैं।

दूसरा आलोचना यह है कि राहुल राजनीतिक रूप से प्रखर नहीं हैं। कांग्रेस ने ये कमजोरियाँ दिखाने से बचा रखा है, या कुछ नेताओं ने समझा भी हो, लेकिन पार्टी सामूहिक रूप से राहुल, सोनिया और प्रियंका को नेतृत्व से हटाने की स्थिति में नहीं है।

हाल ही में इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने इस राजनीतिक विचार को लंबा बौद्धिक समर्थन दिया है। गुहा मोदी के प्रखर आलोचक हैं और भारत के सम्मानित इतिहासकारों में शामिल हैं।

द टेलीग्राफ में प्रकाशित अपने लेख में गुहा ने गांधी परिवार को मोदी के पक्ष में बताया है। गुहा की सबसे कड़ी आलोचना राहुल के लिए है। वे स्वीकार करते हैं कि राहुल अच्छे इंसान हैं।

गुहा के अनुसार राहुल में अनुशासन, गंभीरता और ठोस राजनीतिक अनुभव की कमी है।

उन्होंने अनुशासन की मिसाल भारत जोड़ो यात्रा को बताया। वे मेहनत करते हैं, लेकिन निरंतरता नहीं है। वे बीच-बीच में ही मेहनत करते हैं।

बीजेपी के प्रतिस्पर्धी लगातार मेहनत कर रहे हैं। गुहा के अनुसार राहुल को सोशल मीडिया पर खर्च की गई ऊर्जा पार्टी को मजबूत बनाने में लगानी चाहिए।