
प्राचीन काल में राजघराने और उच्च वर्ग की महिलाएं अपने ओठों को सजाने के लिए चुकंदर, केसर और हेबिस्कस जैसे प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त रंगों का उपयोग करती थीं। आज हमारे पास लिपस्टिक, लिप टिन्ट, लिप ग्लॉस जैसी अनेकों सौंदर्य उत्पाद उपलब्ध हैं। लेकिन कुछ सदियाँ पहले, जब यह आधुनिक कॉस्मेटिक उत्पाद उपलब्ध नहीं थे, तब ये महिलाएं अपने ओठों को कैसे सुंदर, गुलाबी और मोहक बनाती थीं, यह जानना दिलचस्प है। इतिहास बताता है कि प्राचीन भारत में सौंदर्य संवर्धन के लिए प्राकृतिक सामग्रियों का व्यापक उपयोग होता था। आयुर्वेद में त्वचा और ओठों की देखभाल के लिए विभिन्न जड़ी-बूटियां, फूल, फल और वनस्पतियों से बने लेप और रंगों का प्रयोग किया जाता था। रानी-महारानी रासायनिक उत्पादों की बजाय प्राकृतिक रंगों को प्राथमिकता देती थीं। ये रंग ओठों को आकर्षक और पोषित बनाते थे। इसलिए उनकी सुंदरता का रहस्य केवल मेकअप में नहीं, बल्कि प्राकृतिक सामग्रियों के नियमित प्रयोग और देखभाल में निहित था। हालांकि आज की तरह टिकाऊ लिपस्टिक या लिप टिन्ट उपलब्ध नहीं थे, फिर भी प्राकृतिक रूप से तैयार ये रंग ओठों को हल्का लाल या गुलाबी रंग देते थे। खास अवसरों, दरबार की सभाओं और धार्मिक अनुष्ठानों में इन प्राकृतिक सौंदर्य सामग्रियों का व्यापक उपयोग होता था।
प्राचीन काल से चुकंदर को प्राकृतिक रंग का एक प्रमुख स्रोत माना जाता है। इसका गहरा लाल रंग ओठों पर हल्का गुलाबी या लाल टिंट प्रदान करता है। चुकंदर में बेटालाइन नामक प्राकृतिक रंगद्रव्य के साथ विटामिन-सी और एंटीऑक्सिडेंट पाए जाते हैं, जो ओठों को सूखने से बचाते और स्वस्थ रखते हैं। आज भी कई लोग चुकंदर का रस निकालकर कपास की मदद से ओठों पर लगाते हैं। थोड़ी देर बाद हल्का पोंछने पर प्राकृतिक गुलाबी रंग उभरता है। केसर, जिसे राजघरानों का विलासी सौंदर्य सामग्री माना जाता है, विश्व के महंगे प्राकृतिक मसालों में शुमार है। प्राचीन भारत, फारस और मध्य एशिया के राजघराने इसे न केवल खाने में बल्कि सौंदर्य के लिए भी प्रयोग करते थे। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार कुछ रानी-महारानी केसर को गुलाबजल या दूध में मिलाकर चेहरे और ओठों पर लगाती थीं। केसर हल्का सुनहरा-लाल रंग देने के साथ ओठों को मुलायम बनाए रखने में भी सहायक माना जाता था।
गहरे लाल रंग वाला हेबिस्कस का फूल भी प्राकृतिक लिप कलर के रूप में लोकप्रिय था। इसके पत्ते पीसकर या रस निकालकर ओठों पर लगाया जाता था। हेबिस्कस में प्राकृतिक रंगद्रव्य के साथ एंथोसाइनिन जैसे एंटीऑक्सिडेंट पाए जाते हैं, जो त्वचा के पोषण में मदद करते हैं। कुछ जगहों पर हेबिस्कस के रस को मधुमक्खी के शहद, घी या तिल के तेल के साथ मिलाकर प्राकृतिक लिप बाम के रूप में प्रयोग किया जाता था। ऐसा माना जाता था कि इससे ओठों को रंग तो मिलता ही है, साथ ही वे चिर्पन से भी बचते हैं।
प्राचीन काल में विभिन्न क्षेत्रों की उच्च वर्ग और राजघराने की महिलाएं गुलाब के पत्ते, अनार के बीज या छिलके, मंजीष्ठा जैसी प्राकृतिक रंग देने वाली वनस्पतियों का भी इस्तेमाल ओठों और त्वचा की देखभाल के लिए करती थीं। कई प्राकृतिक रंगों को घी, तिल का तेल या मधुमक्खी के शहद के साथ मिलाकर दीर्घकाल तक टिकाऊ रंग के लिए लगाया जाता था। आज जैसे लिपस्टिक का आधुनिक स्वरूप माना जाता है, वह 19वीं सदी के अंत में विकसित हुआ। इससे पहले विश्व की विभिन्न सभ्यताओं में फूलों, फलों, खनिजों एवं वनस्पतियों से प्राप्त प्राकृतिक रंगों से ओठों को सजाया जाता था। भारत में आयुर्वेद और प्राकृतिक उपचार के प्रभाव के कारण वनस्पतिजन्य सामग्रियों का उपयोग अत्यधिक लोकप्रिय था। यदि आप रासायनिक लिपस्टिक के बजाय प्राकृतिक विकल्प चाहते हैं तो चुकंदर, केसर या हेबिस्कस से बने प्राकृतिक लिप कलर का उपयोग कर सकते हैं। हालांकि, ये प्राकृतिक रंग आधुनिक लिपस्टिक जितने लंबे समय तक टिकते नहीं हैं और इनके रंग भी हल्के होते हैं। किसी भी प्राकृतिक सामग्री का उपयोग करने से पहले एलर्जी या संवेदनशीलता के लिए त्वचा पर छोटे हिस्से का परीक्षण करना उचित रहता है। इस प्रकार, रानी-महारानी की सुंदरता का रहस्य महंगे कॉस्मेटिक उत्पादों में नहीं बल्कि प्रकृति द्वारा प्रदान किए गए रंगीन फूलों, जड़ी-बूटियों और फलों में छुपा था। उनके अपनाए गए ये प्राकृतिक उपाय आज ‘क्लीन ब्यूटी’ और ‘हर्बल स्किनकेयर’ की बढ़ती लोकप्रियता के साथ पुनः चर्चा में आए हैं।





