
२२ साउन, काठमाडौं। वर्तमान में कूटनीति में महिलाओं की भागीदारी को मापने का कार्य केवल एक ही ‘मेट्रिक’ पर आधारित है। वह मापदंड है राज्य द्वारा नियुक्त राजदूत पदों पर महिलाओं का प्रतिशत। “वुमेन इन डिप्लोमेसी इंडेक्स” के अनुसार, वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा २२.५ प्रतिशत है। यह संख्या महत्वपूर्ण है क्योंकि यह औपचारिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व के माध्यम से सत्ता और पहुँच को दर्शाती है। इससे अधिकार के विकेन्द्रीकरण की सरकार की इच्छा भी झलकती है। इसे ट्रैक किया जाना चाहिए और संख्या में वृद्धि होनी चाहिए। लेकिन केवल इसे मापना अब पूरी कहानी नहीं बताता। यह मेट्रिक एक खास इस दुनिया के लिए बनाया गया था, जहां अंतरराष्ट्रीय सहयोग मुख्य रूप से दूतावासों के जरिए होता था। मंत्रालयों और औपचारिक सरकारी वार्ताओं के जरिए सहयोग होता था। वह दुनिया अभी भी मौजूद है। लेकिन वर्तमान विश्व उन परंपराओं से कहीं आगे बढ़ चुका है। आज जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बढ़ा है, महामारी और विस्थापन बढ़े हैं। मानवीय संकट भी गंभीर हुए हैं। इस तरह की समस्याएं वैज्ञानिक संस्थाओं के गठबंधन से हल होती हैं। नागरिक नेटवर्क के जरिए समाधान होते हैं। सीमापार साझेदारी (क्रॉस-बॉर्डर पार्टनरशिप) से समाधान निकलते हैं। ये संगठन विदेश मंत्रालयों से बाहर काम करते हैं। कूटनीति विकसित हो रही है, लेकिन इस नई कूटनीति में महिलाओं की भागीदारी मापने के लिए कोई ढांचा विकसित नहीं किया गया है। इससे मापे जाने वाले तथ्यों और वास्तविक दुनिया के बीच की खाई और बढ़ गई है। शांति प्रक्रिया में यह डेटा के अंतर का विरोधाभास सबसे अधिक स्पष्ट होता है।
औपचारिक आंकड़े निराशाजनक हैं। १९९२ से २०१९ के बीच विश्व की बड़ी शांति प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागीदारी न्यूनतम रही। वार्ताकारों में महिलाएं केवल १३ प्रतिशत थी जबकि हस्ताक्षरकर्ताओं में ६ प्रतिशत। २०२४ तक औपचारिक संघर्ष समाधान वार्ताओं में महिला वार्ताकारों की संख्या और घटकर ७ प्रतिशत तक सीमित हो गई है। ये आंकड़े औपचारिक संस्थाओं की असफलता को बयां करते हैं। हालांकि वार्ताक्रम में महिलाओं को शामिल करने की बात हुई है, लेकिन ये आंकड़े आधे चित्र मात्र दिखाते हैं। पहली बार अनौपचारिक शांति प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागीदारी पर संगठित अध्ययन किया गया। ऐसे वार्ताऐं नागरिक समाज के नेतृत्व में होती हैं और अक्सर औपचारिक सरकारी वार्ताओं के साथ-साथ संचालित होती हैं। ये वार्ताऐं आधिकारिक वार्ताओं को स्थिर बनाए रखने में मददगार होती हैं। इस अध्ययन को “जॉर्जटाउन इंस्टिट्यूट फॉर वुमेन, पीस एंड सिक्योरिटी” ने किया। अध्ययन किए गए ६३ औपचारिक शांति प्रक्रियाओं में से ३८ में समानांतर “ट्रैक टू” प्रक्रियाएं चल रही थीं। इनमें लगभग तीन-चौथाई मामलों में पहचाने गए महिला समूहों की सक्रिय भागीदारी थी।
यह भिन्नता केवल महत्वपूर्ण नहीं बल्कि संरचनात्मक भी है। महिलाएं समझौता संभव बनाने का अधिकांश कार्य कर रही हैं, लेकिन वह कमरे से बाहर रखी जाती हैं जहाँ समझौतों पर हस्ताक्षर होते हैं। इसके उदाहरण भी हैं। लाइबेरिया की महिला शांति आंदोलनों ने धार्मिक और राजनीतिक भेदभाव से ऊपर उठकर गृहयुद्ध को समाप्त करने में योगदान दिया। उत्तरी आयरलैंड में ‘गुड फ्राइडे समझौता’ के दौरान महिला गठबंधनों ने पुरानी बाधाओं को सुलझाने में मदद की। सूडान, कोलंबिया और कई स्थानीय प्रक्रियाओं में महिला नेतृत्व वाले नेटवर्क विवाद सुलझाने का काम कर रहे हैं। कूटनीतिज्ञों के कक्षों से बाहर ये महिलाएं भरोसा पुनर्निर्माण का कार्य जारी रखती हैं।
महिलाओं के अज्ञात योगदान पर अंतरराष्ट्रीय समन्वय अब मुख्य रूप से विदेशी मामलों के मंत्रालयों से बाहर के लोगों पर निर्भर हो गया है। यह बात कोविड-१९ महामारी के दौरान प्रमाणित हुई। महामारी के समय महिलाओं ने विश्व स्वास्थ्य और सामाजिक कार्यबल का लगभग ७० प्रतिशत हिस्सा संभाला। वे केवल अग्रसर देखभालकर्ताओं के रूप में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय निकायों, समुदायों, स्थानीय सरकारों, गैरसरकारी संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को सीमापार जोड़ने वाले समन्वयकारी की भूमिका में भी थीं। इसे अब स्वास्थ्य विशेषज्ञ ‘स्वास्थ्य कूटनीति’ के नाम से वैश्विक स्तर पर पहचान रहे हैं। यह किसी भी सरकार की अकेले हल करने में असमर्थ खतरों का प्रबंधन करने की क्षमता और कौशल है। यह क्षमता टीकों तक पहुंच, महामारी की पूर्वतैयारी, शरणार्थी स्वास्थ्य और रोग निगरानी में आवश्यक है।
लेकिन कोविड-१९ के दौरान विश्व स्तर पर बनाए गए ११५ राष्ट्रीय कार्य दलों में से ८५ प्रतिशत में पुरुषों की संख्या महिलाओं से अधिक थी, जबकि महिलाएं ही महामारी के जवाब में आगे थीं। समन्वय का कार्य महिलाओं का था लेकिन मान्यता नहीं मिली। जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में भी यही कहानी दोहराई गई है। जलवायु प्रभाव महिलाओं और बच्चों को असमान रूप से प्रभावित करता है। महिलाएं स्थानीय अनुकूलन प्रयासों का नेतृत्व कर रही हैं। वे खाद्य असुरक्षा, पानी की कमी, आपातकालीन राहत और विस्थापन जैसे कार्यों में स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय निकायों के साथ समन्वय कर रही हैं। मध्यस्थता, विश्वास निर्माण और विभाजित समुदायों के बीच वार्ता कूटनीतिक कार्य के मुख्य पहलू हैं। उपलब्ध आंकड़े स्पष्ट करते हैं जब नागरिक समाज के प्रतिनिधि शामिल होते हैं, तो शांति समझौतों के असफल होने की संभावना ६४ प्रतिशत तक कम होती है। ठंडे युद्ध के बाद ४० शांति प्रक्रियाओं के विश्लेषण ने यह दिखाया कि महिलाओं के सक्रिय हिस्सेदारी वाले क्षेत्रों में लगभग हमेशा समझौता होता है। महिलाएं कूटनीतिक कार्यों में सक्रिय हैं, मगर वे अक्सर आंकड़ों में शामिल नहीं होतीं।
मापन क्यों महत्वपूर्ण है? यह चर्चा औपचारिक प्रतिनिधित्व के खिलाफ नहीं बल्कि इसके समर्थन में है। महिला राजदूतों, मंत्रियों और वार्ताकारों की संख्या बढ़ाना अब भी आवश्यक है। यदि वर्तमान गति बनी रही तो कुछ देशों को अपने कूटनीतिक संस्थानों में समानता प्राप्त करने में एक से अधिक शताब्दी लग सकती है। इससे औपचारिक संस्थानों पर दबाव बढ़ेगा। मापन दृश्यता को निर्धारित करता है। दृश्यता शक्ति को आकार देती है। इसलिए संस्थाएं वही मापती हैं, उसे ही मान्यता देती हैं, उसी पर धन आवंटित करती हैं और वैधता प्रदान करती हैं। यदि कूटनीतिक प्रभाव केवल औपचारिक नियुक्तियों से मापा जाए तो महिला नेतृत्व के अनेक क्षेत्रों को अनदेखा किया जाएगा। कार्य मौजूद है, लेकिन कूटनीति की परिभाषा इसको बाहर रखती है। वर्तमान प्रयोग किए जाने वाले ढांचे से कूटनीति तेजी से विकसित हो रही है।
अब महिला अंतरराष्ट्रीय दिवस के अवसर पर पूछे जाने वाले प्रश्न प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं हो सकते। यह प्रश्न और बड़ा हो सकता है। सामान्यतः प्रश्न यह होता है कि कूटनीतिक संस्थाओं में अधिक से अधिक महिलाओं को कैसे लाया जाए? इसमें कोई कमी नहीं है। वास्तव में इससे बेहतर जवाब मिलने चाहिए। एक और प्रश्न भी है – क्या वास्तव में कूटनीति में महिलाओं की भागीदारी कम है या महिलाएं जिन तरीकों से मापी जाती हैं, उनमें कूटनीति छूट रही है? चलिए विचार करते हैं कि कौन से संकेत चूक रहे हैं। सूडान में महिला शांति निर्माताओं ने सूक्ष्म कूटनीति की। उन्होंने एक छाया शांति समझौता बनाया जिसने जेनेवा में हुई औपचारिक वार्ताओं को दिशा दी। इसके लिए क्रॉस-बॉर्डर साझेदारी, गठबंधन प्रबंधन और निरंतर राजनीतिक रणनीति आवश्यक थी। कोटे डिवोर में महिला मध्यस्थताओं ने कावली क्षेत्र में अंतर-समुदाय संघर्ष कम किया और हस्ताक्षरित शांति समझौता तैयार किया। वे पहली बार कानूनी रूप से इसके क्रियान्वयन की गारंटी बनीं। सीरिया में महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने लापता व्यक्तियों के लिए संयुक्त राष्ट्र का बिल्कुल नया तंत्र स्थापित कराया। ये सभी महिलाएं राजदूत की पदवी नहीं रखती थीं और न ही “वुमेन इन डिप्लोमेसी इंडेक्स” में शामिल होती हैं, फिर भी उन्होंने नतीजे बदले।
महिलाएं पहले ही सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। क्या विश्व इसे उचित नाम देने के लिए तैयार है? यह मान्यता महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि कूटनीति के लिए जरूरी है।





