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सरकार चलाएगी या निजी क्षेत्र को देगी?

२८ साउन, विराटनगर । बाहर पुराने संरचनाएं जो पेड़ों और झाड़ियों से ढकी हुई हैं। अंदर कपड़े और जंग से ढके हुए मशीनें, मकड़ी के जाले और ओस की खुशबू। चारों ओर कूड़ा और जमा हुआ पानी, कहीं मशीनों पर छोड़े गए फटे बोरे, कहीं क्वाइल निकालकर छोडे गए मोटर जो नजरअंदाज हो चुके हैं। नेपाल की पहली उद्योग, विराटनगर जुट मिल्स की वर्तमान स्थिति कुछ ऐसी ही है। कभी यह मिल ८ हजार लोगों को रोजगार देता था, लेकिन अब इसके लाल दीवार पर अभी भी सफेद अक्षरों में लिखे गए नारे दिखाई देते हैं – ‘उत्पादन बढ़ाएं, मिल बचाएं, कचरा घटाएं, नुकसान बचाएं।’ लेकिन वर्षों से न तो कोई उत्पादन है और न ही मिल सक्रिय है। दीवारें कई जगह फटी हुई हैं और दक्षिण-पश्चिमी दीवार ध्वस्त हो चुकी है। छत से पानी रिसता है और जरूरी पार्ट्स खो चुके हैं। १९९३ में स्थापित यह जुट मिल्स कई वर्षों से बंद है। इसे पुनः चालू करने के लिए सरकार ने एक अध्ययन दल का गठन किया है। टीम बन जाने के बाद मिल फिर से शुरू होने की उम्मीद जगी है। लेकिन कमजोर भौतिक संरचना, पुराने मशीनों और प्रतिस्पर्धी बाजार की वजह से मिल संचालित करना कठिन है। सरकार स्वयं संचालित करेगी या निजी क्षेत्र को लीज पर देगी इस पर चर्चा जारी है। जिनके मुताबिक मिल्स के पूर्व संचालक फूलकुमार लालवानी बताते हैं कि जुट मिल्स कम पूंजी में चलाया जा सकता है। ‘संचालन मुश्किल नहीं है, मशीनें उपयोगी हैं। कम निवेश में चलाना संभव है,’ उन्होंने कहा, ‘लेकिन सरकार स्व चलाने के बजाय लीज पर देना उचित होगा।’

मिल संचालक समिति के अध्यक्ष नन्दलाल देवकोटा कहते हैं कि मिल तुरंत संचालित हो सकता है। सरकार द्वारा अध्ययन समिति गठित करने के बाद यह संभावना और बढ़ी है। समिति ने संचालन की तैयारी की है और सरकार का सहयोग इसे आसान बनाता है। सरकार खुद चलाने के बजाय निजी क्षेत्र को जिम्मेदारी देना उपयुक्त समझते हैं। ‘५०–६० करोड़ निवेश करके मिल संचालित किया जा सकता है,’ उन्होंने कहा, ‘सरकार उद्योग संचालन से ज्यादा सहजीकरण करेगी। एक टीम को जिम्मेदारी देना बेहतर होगा।’ समिति की सलाह के अनुसार व्यवहार करने का निर्णय लिया गया है। जुट उत्पादन की तकनीक में बदलाव न होने पर भी पुराने मशीनों का उपयोग किया जा सकता है। लेकिन परंपरागत तरीके से मिल्स चलाना संभव नहीं, उद्योग विशेषज्ञ धर्मानंद सञ्जेल बताते हैं। जुट मिल्स के पुराने मशीनें वर्तमान बाज़ार की प्रतिस्पर्धा के लिए पर्याप्त गुणवत्ता के उत्पाद नहीं दे पाती। मौजूदा अन्य जुट मिल्स भी बंद होने की कगार पर हैं, इसलिए पुरानी तकनीक में उद्योग चलना संभव नहीं है। आधुनिक और तकनीक-संगत उत्पादन के बिना बाजार प्रतिस्पर्धा नहीं हो सकेगी, देवकोटा ने कहा। ‘वर्तमान अन्य जुट मिल्स की स्थिति भी अच्छी नहीं है, बांग्लादेश से पट्टुओं का निर्यात नहीं हो रहा है,’ उन्होंने कहा, ‘विराटनगर के अन्य जुट उद्योग नई तकनीक से चल रहे हैं। नई तकनीक लाए जाने पर उद्योग चल सकता है।’ जुट के नए और पर्यावरण-मित्रवत उत्पादन की सुविधा हो तो जुट मिल्स संचालित हो सकता है। ‘भारतीय बाजार के नजदीक है, जुट की थैलियाँ और अन्य सामग्री बनाई जा सकती हैं,’ देवकोटा ने कहा, ‘मिल का क्षेत्र बड़ा है, अन्य उद्योग भी शुरू किए जा सकते हैं।’

उनके अनुसार मिल की इमारत के अंदर के सभी मशीन नहीं हैं। कुछ छोटे मशीन चुरा लिए गए हैं। बड़े हिस्सा खंडहर में हैं। हाल में मशीन चलाने के लिए लाए गए कुछ छोटे मशीनरी भी चोरी हो गए हैं। उद्योग खंडहर की तरह हो चुका है, लेकिन हर घंटे बजने वाली घंटी अभी भी बजती रहती है। एक समय में ८ हजार कारीगर तीन शिफ्ट में काम करते थे, अब केवल ९ कर्मचारी बचे हैं, जिनमें ५ सुरक्षा गार्ड हैं। वे सुरक्षा गार्ड बारी-बारी से घंटी बजा रहे हैं। छत बारिश में पानी रोकने में असमर्थ है, लेकिन जर्जर संरचना के बावजूद कार्यरत कर्मचारियों को मिल बस चलने की थोड़ी उम्मीद है। सुपरवाइजर मनोज खड्काले बताया कि संरचनाएं मरम्मत करके मिल दुबारा शुरू की जा सकती हैं। इमारतें मजबूत हैं, उन्होंने कहा।

विराटनगर जुट मिल्स के स्थापना के साथ ही मोरङ-सुनसरी औद्योगिक कॉरिडोर और देशभर में उद्योग स्थापना की लहर आई थी। नेपाल की औद्योगिक क्रांति के साथ ही प्रजातांत्रिक आंदोलन भी इसी मिल से शुरू हुआ था। यह मिल २०४६ दशक तक सरकार द्वारा संचालित था। निजीकरण की बात करते हुए गोल्छा ऑर्गनाइजेशन को जिम्मेदारी दी गई, लेकिन संचालन नहीं कर सका। २०५८ में सरकार ने २ हजार कर्मचारियों को ५५ करोड़ रुपए भुगतान कर मिल बंद कर दिया। फिर २०६९ में विनसोम इंटरनेशनल कोलकाता को संचालन दिया गया। समझौते के मुताबिक ६ महीने में ३३ केवीए बिजली उपलब्ध कराए जाने थे, लेकिन ढाई साल तक बिजली न मिलने पर २५ साल के लिए लीज पर ली गई कम्पनी को वापस कर दिया गया। वसन्त वन का अध्यक्ष बनने के बाद २०७५ में कुछ समय मिल पुनः चालू हुआ। सूत्री उत्पादन शुरू किया गया, लेकिन कुछ ही समय बाद बंद हो गया। सूत्री के लिए जोड़े गए छोटे उपकरण भी वर्तमान में उद्योग परिसर में नहीं हैं, वह चोरी हो चुके हैं।

जुट मिल्स पर लंबे समय से अध्ययन कर रहे पत्रकार अनन्तराज न्यौपाने कहते हैं कि संरचनाओं की जटिलता के कारण मिल संचालन कठिन है। ‘मशीनें पुरानी हैं। नई तकनीक आ चुकी है, पुरानी विधि से चलाना व्यर्थ है,’ वे कहते हैं, ‘जुट की थैलियाँ, बैग आदि बनाया जा सकता है, लेकिन राज्य संचालित करना उपयुक्त नहीं है। निजी क्षेत्र को जिम्मेदारी लेनी चाहिए।’