
नेपाल में तीव्र शहरीकरण के बावजूद योजनाहीन भौतिक संरचनाओं ने कृषि भूमि के नुकसान और जोखिमपूर्ण बस्तियों में वृद्धि जैसी समस्याएं उत्पन्न की हैं। दीर्घकालिक समृद्धि के लिए भवन निर्माण से पहले वैज्ञानिक भूमि उपयोग और जोखिम-संवेदनशील शहरी योजना का प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है। ‘समृद्ध नेपाल’ यह शब्द मैंने अनेक बार भाषणों, नीतिगत दस्तावेजों, बैठकों और हर विकास नारे में सुना है। लेकिन जब मैं शहर की गलियों में चलता हूँ, नई बस्तियाँ फैलती देखता हूँ, बारिश के मौसम में डूबी सड़कों को निहारता हूँ और घरों की दीवारों के साथ संकरी होती सार्वजनिक जगहों को देखता हूँ, तो एक ही प्रश्न उठता है – क्या समृद्ध देश का निर्माण केवल कल्पना है या हमारी साझा प्रतिबद्धता?
हम पहले घर बनाते हैं, फिर सड़क की तलाश करते हैं। बस्ती बसने के बाद नालियों के लिए स्थान पर चर्चा होती है। नदी को मिचाकर घर बनाते हैं, बाढ़ आने पर कहते हैं – ‘यह तो किनारा था!’ हर मानसून में डूबी सड़कों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालकर कुछ दिन चर्चा करते हैं। लेकिन कुछ समय बाद फिर उसी जगह एक नया मकान बन जाता है और बस्ती फैलती रहती है। नेपाल तीव्र गति से शहरीकरण का सामना कर रहा है। नए शहर बन रहे हैं, पुराने शहर फैल रहे हैं, और भौतिक निर्माण की गतिविधियाँ बढ़ रही हैं। लेकिन स्वीकार करना होगा कि भौतिक संरचना निर्माण की गति योजनाओं से कहीं आगे है।
इसका परिणाम है नदियों सहित खुली सार्वजनिक जगहों का खत्म होना, कृषि भूमि का कंक्रीट में परिवर्तित होना और बुनियादी ढांचे का बढ़ती जनसंख्या की मांगों को पूरा करने में संघर्ष करना। कभी-कभी ऐसा लगता है कि हम शहर नहीं, समस्याएं निर्मित कर रहे हैं। हमारी विकास की पद्धति ऐसी है: पहले दीवारें खड़ी होती हैं, बाद में कमरे में जाने के लिए दरवाज़ा कहाँ होगा, यह सोचा जाता है। पहले शहर फैलता है, वर्षों बाद पूछा जाता है – ‘अब सड़क कहाँ निकाली जाए?’ शहर एक दिन में नहीं बनता। यह दशकों के सही और गलत निर्णयों का परिणाम है।





