
समाचार सारांश
- चित्रकार नवीन नाब्लो ने पाटन की मौनता और सड़क के कुत्तों को केंद्र में रखकर गैलरी एमक्यूबी, पाटन में ‘टेम्पल्स, नेचर एंड पोक्चेज्’ नामक प्रदर्शनी शुरू की है।
- नवीन ने कहा है कि उन्होंने अपने आसपास के वातावरण और पाटन की गलियों को कैनवास पर उतारने के लिए इंटरनेट की तस्वीरों के बजाय अपनी खुद की फोटो का उपयोग किया है।
काठमाडौं की भीड़-भाड़ और शोर-गुल के बीच एक ऐसी दुनिया भी है, जहाँ समय कुछ पल के लिए थम जाता है। पाटन की गलियों, छोटे पत्थर के मूर्तियों और चैत्य के सामने आराम करते या सोते हुए कुत्तों को देखकर आप वही थमा हुआ समय महसूस कर सकते हैं। उनमें एकाकीपन और थकान की छवि झलकती है।
चित्रकार नवीन नाब्लो ने गैलरी एमक्यूबी, पाटन में अपनी एकल प्रदर्शनी ‘टेम्पल्स, नेचर एंड पोक्चेज्’ में उन कुत्तों और पाटन की मौनता को कैनवास पर उकेरने का प्रयास किया है। यह उनकी दूसरी एकल चित्रकला प्रदर्शनी है।
प्रदर्शनी में प्रस्तुत चित्र दर्शकों को शहरी जीवन की सच्चाई और उनकी आत्मीय मनोदशा दोनों को प्रतिबिंबित करते हैं।
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नवीन का परिवार ताप्लेजुंग से झापा स्थानांतरित हुआ था। ताप्लेजुंग में जन्मे नवीन का बचपन झापा में बीता और वहीं तक उनकी पढ़ाई भी हुई। बाद में उनके पिता ने उन्हें काठमांडू भेजने का प्रण किया, बस एक शर्त थी कि उन्हें प्लस टू में अच्छे अंक लाने होंगे।
परीक्षा के दौरान चित्रकला बनाने के लिए नवीन को डांट-फटकार और मार भी झेलनी पड़ी। लेकिन अंत में उन्होंने अच्छे अंक हासिल कर काठमांडू की यात्रा की। वर्ष 2009 में वे और उनके भाई काठमांडू आए और बैचलर की पढ़ाई शुरू की। नवीन को बचपन से ही ललित कला में रुचि थी, उन्होंने काठमांडू विश्वविद्यालय में बैचलर इन फाइन आर्ट्स (BFA) में दाखिला लिया और 2013 में BFA तथा 2016 में मास्टर्स इन फाइन आर्ट्स (MFA) पूरी की।
उनका जीवन ज्यादातर कैनवास जैसा शांत दिखता है, लेकिन अंदर की कहानी संघर्ष और अकेलेपन से भरी हुई है। लगभग 15 साल काठमांडू में बिताने के बाद नवीन अब चबहिल में बहनों के साथ रहते हैं और अधिकतर समय कैनवास में खोए रहते हैं। उनके सभी भाई विदेश में बस गए हैं। हाल ही में उनके जुड़वां भाई ने विदेश में मकान खरीदा, जब नवीन काठमांडू की गलियों में इस प्रदर्शनी के लिए विषय खोज रहे थे।

‘सभी बाहर हैं, मेरे भाई ने भी घर खरीदा। मैं तो यहां कलाकार बनकर कठिनाइयों से जूझ रहा हूँ,’ वे कहते हैं।
वे सहज बोलते हैं, लेकिन उनकी बातों में कलाकार की अकेलेपन और आत्म-बोध की छाया स्पष्ट मिलती है। यही पारिवारिक दूरियाँ और शहर की एकांतता उनकी कला की सबसे बड़ी प्रेरणा है।
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पहले नवीन रंगीन बड़े चित्र और पोर्ट्रेट बनाते थे।
लेकिन अब वे विश्वसनीय पेन और स्याही (पेन एंड इंक) की विधि में पूरी तरह परिवर्तन कर चुके हैं। छोटे कैनवास पर वे सावधानी से रेखाचित्र बनाते हैं जो मिटाया न जा सके। काला स्याही जितना आकर्षक होता है, उतना ही कठिन होता है क्योंकि इससे कोई गलती सुधारना संभव नहीं।
‘अगर एक बार गीला हो गया तो इसे कम करना संभव नहीं, कागज को साफ़-सुथरा रखना भी बेहद मुश्किल है,’ नवीन तकनीकी पक्ष बताते हैं।
इस प्रदर्शनी में 30 से अधिक ऐसे चित्र मौजूद हैं। इनमें विशेष बात है – खाली जगह अर्थात श्वेत स्थान।

प्रदर्शनी में अधिकांश कैनवास के खाली हिस्से सफेद रखे गए हैं ताकि विषय केंद्रित रहे। फ्रेम के किनारे तक न बढ़ाये गए ये चित्र दर्शकों का ध्यान केंद्र विषय पर केंद्रित करते हैं।
‘श्वेत स्थान विषय को फोकस करता है। यदि कोई दूसरा विषय जोड़ा जाता है, तो वह विषय के साथ मेल खाना चाहिए, नहीं तो अव्यवस्था होती है,’ वे बताते हैं।
इस प्रकार बने मिनिमलिस्टिक चित्र संग्रह इस प्रदर्शनी की मुख्य विशेषता है।
प्रदर्शनी के कई चित्रों में पाटन के विभिन्न स्थानों पर आराम करते कुत्ते दिखाई देते हैं। ये कुत्ते गतिहीन हैं, सभी आराम कर रहे, थके हुए या किसी का इंतजार कर रहे हैं।
कुत्तों को विषय बनाने के पीछे नवीन की एक कहानी है।
सरकार द्वारा तोड़े गए सुकुम्बासी बस्ती के भग्नावशेष के सामने एक बार एक कुत्ता उदास भाव से सो रहा था। नवीन ने उसकी फोटो खींची और स्टूडियो जाकर चित्र बनाया। यहीं से कुत्तों को मुख्य विषय बनाने का विचार आया।
फिर वे कुत्ते ढूंढ़ते रहे और लगातार चित्र बनाते गए।
‘काठमांडू पहुंच कर मनुष्य जीवन की दौड़-धूप और चुनौतियां बहुत कठिन लगती हैं। इन कुत्तों की थकान में मैं खुद को देखता हूँ,’ नवीन कहते हैं।
वे अपनी चित्रों में इंटरनेट की तस्वीरों का नहीं बल्कि खुद की खींची हुई तस्वीरों का उपयोग करते हैं। उनका मानना है कि अपनी आँखों से देख कर फोटो लेने में अलग दृष्टिकोण होता है।
हालांकि वे चिंतित हैं कि आजकल कला में यूट्यूब और इंस्टाग्राम से पश्चिमी कला की नकल करने का चलन बढ़ रहा है। उनकी सोच है कि अपने आसपास के वातावरण, संस्कृति और गलियों को ही कैनवास पर उतारना आवश्यक है।
‘हमें अपने आसपास के विषयों को बनाना चाहिए, यही वास्तविक होता है,’ नवीन कहते हैं। ‘भविष्य में सौ साल बाद कोई देखें तो पहचान सके कि यह चित्र कहाँ का है – नेपाल के पाटन की गलियां।’
पाटन क्षेत्रफल में छोटा जरूर है, लेकिन यहाँ सैकड़ों मंदिर और चैत्य हैं। सबकी अलग-अलग कहानियाँ हैं। रोज़मर्रा के पात्र, चाहे कुत्ते या इंसान हों, विविध हैं। नवीन ने खासकर मंदिरों के सामने आराम करते कुत्तों को कैनवास में उतारा है।

उनके ये चित्र समय को थमा हुआ दिखाते हैं और समाज में धार्मिक सहिष्णुता तथा सह-अस्तित्व को कलात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं। काले स्याही के प्रत्येक स्ट्रोक में पाटन के कुत्ते और मंदिर की आकृतियाँ शहर को कुछ पल विश्राम और सोच के लिए आमंत्रित करती हैं।
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नवीन नाब्लो एकल चित्रकला तक सीमित नहीं हैं।
वे कार्टून और कैरिकेचर की दुनिया में भी सक्रिय हैं। उनका कैरिकेचर शैली जिसमें सिर बड़ा और शरीर छोटा होता है, बहुत लोकप्रिय है, जो मानवीय भावनाओं को प्रबल रूप से प्रदर्शित करता है।
लगभग 40 वर्ष की उम्र में भी नवीन दिखने में 25 के जैसे लगते हैं और कला तथा जीवन दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ा रहे हैं। वे जानते हैं कि कला से बड़ा आर्थिक लाभ नहीं होता, इस सच्चाई को स्वीकार करके वे अपनी इच्छा अनुसार अकेलेपन में जीना पसंद करते हैं।





फोटो: चंद्रबहादुर आले / नवीन नाब्लो





