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पिछले वर्ष प्रचण्ड, आज बालेन शाह की निजी यात्रा

समाचार सारांश

OK AI द्वारा उत्पादन गरिएको। सम्पादकीय समीक्षा गरिएको।

  • प्रधानमंत्री बने के बाद बालेन शाह अपने पहले निजी भ्रमण पर कास्की के अस्तामावस्थित अन्नपूर्ण इको विलेज रिसॉर्ट में ठहरे हैं।
  • प्रधानमंत्री कार्यालय ने बताया कि यह बालेन शाह का निजी भ्रमण है और वे कल मुस्तांग जाएंगे।
  • अन्नपूर्ण इको विलेज शिवराज अधिकारी परिवार की तीन पीढ़ियों की मेहनत से बना रिसॉर्ट है, जहां एक साल पहले प्रचण्ड भी ठहरे थे।

५ भदौ, पोखरा। प्रधानमंत्री बालेन शाह पहली बार निजी भ्रमण पर निकले हैं और इस समय कास्की के पोखरा से १८ किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित अस्ताम गांव में हैं।

अपने निजी कार्यक्रमों को अक्सर गोपनीय रखना पसंद करने वाले प्रधानमंत्री शाह इस बार की यात्रा को भी ऐसे ही रखना चाहते थे।

सुरक्षा प्रोटोकॉल और उच्च पदाधिकारी की यात्रा होने के कारण उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी। प्रधानमंत्री कार्यालय ने आधिकारिक तौर पर बताया है कि यह यात्रा पूरी तरह निजी है।

प्रधानमंत्री से जुड़े सूत्रों ने बताया कि वे कल मुस्तांग जाएंगे, हालांकि अधिक कार्यक्रमों का विवरण अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।

वे जिस रिसॉर्ट में ठहरे हैं वह है अन्नपूर्ण इको विलेज रिसॉर्ट, जो शुक्रवार को कास्की पहुँचे थे। इस रिसॉर्ट के बारे में इन दिनों काफी खोज की जा रही है।

यह रिसॉर्ट समुद्र तल से लगभग १५०० मीटर की ऊंचाई पर अस्ताम की चोटियों पर स्थित है, जहां एक साल पहले प्रचण्ड भी ठहरे थे।

कांग्रेस-एमाले सरकार चलाने वाले और पार्टी के संस्थापक प्रचण्ड पिछले साल भदौ में अपनी जन्मभूमि कास्की पहुँचे थे।

ठीक एक साल पहले भदौ ५ तारीख को प्रचण्ड इसी रिसॉर्ट में ठहरे थे, और इसी दिन इस वर्ष प्रधानमंत्री शाह भी यहां आए हैं।

उस समय प्रचण्ड ने कुछ राजनीतिक बैठकें भी की थीं।

प्रचण्ड, जो कास्की के लेवाडे गांव के हैं, अस्ताम के गांव घूमें और संघर्ष के दौरान घायल नेत्र अधिकारी से मिले थे।

अब बालेन शाह अन्नपूर्ण इको विलेज में हैं, लेकिन यह पारिवारिक यात्रा होने के कारण उन्होंने किसी से कोई भेंट नहीं की है। सुरक्षा एजेंसियां भी इस यात्रा से अनजान हैं।

६० के दशक का अस्ताम गांव

प्रधानमंत्री बालेन शाह पहली बार यात्रा पर निकले तो लोग इस बारे में खोजबीन कर रहे हैं। ६० के दशक तक जब पर्यटक यहां आते थे, तो स्थानीय लोग भी आश्चर्यचकित हो जाते थे।

यहां मकानों की छतें खर-पतवार और पत्थरों से बनी थीं, पर्यटक हिम शृंखला को कैमरे में कैद करने के लिए आतुर रहते थे। उत्तर में ऊंचे पर्वत और दक्षिण में छंगासुर की चोटियां, नीचे मर्दी नदी बह रही है। सामने माछापुच्छ्रे, अन्नपूर्ण, धौलागिरी, मनास्लु दिखते थे, जिन्हें विदेशी पर्यटक बहुत पसंद करते थे।

कभी-कभी २-३ दिन एक ही जगह पर टेंट लगाकर बैठते और हिमालय की सुंदरता का आनंद लेते थे। पतले घर पूरे होते थे और कुछ लोग पोखरा बाजार का हिस्सा देख पाते थे। खेतों में काम करने वाले ग्रामीणों को पर्यटक पसंद करते थे।

माछापुच्छ्रे गाउँपालिका-६ के वडाध्यक्ष टेकिनाथ बराल कहते हैं, ‘हमें देख विदेशी लोग हैरान रह जाते थे, गांव वाले भी दंग रह जाते थे। लेकिन उस समय अस्ताम में कोई सड़क, बिजली नहीं थी, पीने के पानी की समस्या थी और जीवन कठिनाइयों भरा था।’

देश में विद्रोह भड़कने के समय भी पर्यटक लोग घान्द्रुक पहुंचने के लिए धम्पुस होते हुए चढ़ाई करते थे।

तीन पीढियों द्वारा सँवारा गया ‘अन्नपूर्ण इको विलेज’

आज का यह खूबसूरत और प्रसिद्ध पर्यटन स्थल अचानक नहीं बना, यह शिवराज और विश्वराज अधिकारी परिवार की तीन पीढ़ियों के परिश्रम और संघर्ष का परिणाम है।

सन् २००४/०५ से निकट के गांव से अस्ताम की पहाड़ी पर शिवराज अधिकारी ने पशुशाला स्थानांतरित कर शुरुआत की। उन्होंने खेती-योग्य और मल लाने में सुविधा के लिए खेत में पशुशाला बनाई। शिवराज ने सोचा कि अस्ताम होकर ट्रेकिंग करने वाले पर्यटकों को यहां रुकाया जा सकता है, इसलिए उन्होंने दो कमरे बनाए जहां खाने-पीने की व्यवस्था की।

शिवराज ने पारंपरिक पत्थर और मिट्टी से दो कमरे बनाए थे, जिनमें पर्यटक ठहर सकते थे और खेतों में जो मिलता था, वही खाने को दिया जाता था।

यही दो कमरे से आतिथ्य सेवा शुरू हुई और हजारों पर्यटकों की पसंद बन गई।

शिवराज के बाद उनके बेटे विश्वराज अधिकारी और उनके तीन भाई-बहनों तथा संतान ने रिसॉर्ट को बड़ा बनाया।

यह रिसॉर्ट नेपाली पर्यटकों के लिए भी आकर्षक है। इसमें २३ कमरे हैं और १५ रोपनी जमीन शामिल है। यहां योग ध्यान, पक्षी और बच्चों के लिए खेलने, खेती करने के लिए जगह है।

इको विलेज ने अन्य जगहों में भी इस तरह के पर्यटन विकास का मॉडल प्रदान किया है।

अंततः अस्ताम गांव का स्वरूप पर्यटन से प्रभावित होकर बदला है। अधिकांश घरों ने मेहमानों को ठहराना शुरू किया है। कई नए होटल खुल रहे हैं। ह्यांग्जाकोट होमस्टे संचालित हो रहा है और स्टार होटल निर्माण में हैं। पक्की सड़क और बिजली भी पहुंच गई है।

यह क्षेत्र स्थानीय स्वाद और संस्कृति को कायम रखते हुए रोजाना सैकड़ों पर्यटकों को आकर्षित करता है।

अन्नपूर्ण इको विलेज स्थापना की गई जमीन अधिकारी परिवार की पारंपरिक खेत रही है। विश्वराज अधिकारी बताते हैं, ‘घर से ३००-४०० मीटर दूर की फसल के लिए घर से खाद लेकर आना पड़ता था।’

सन् १९८९/९० के आसपास विश्वराज अधिकारी पर्यटन क्षेत्र में गए। उस समय पोखरा-हरिचोक से प्रारंभ होकर तिब्बती कैंप, मेलबोट, अस्ताम, धम्पुस होते हुए ऑस्ट्रेलियन कैंप तक ६-७ दिन की ‘पोखरा मैराथन’ पदयात्रा बहुत प्रसिद्ध थी।

पदयात्रा के दौरान विदेशी पर्यटकों को अस्ताम लेकर आकर घर पर ठहराने की परंपरा शुरू हुई।

पोखरा-बागलुङ राजमार्ग बन जाने के बाद पदयात्रा मार्ग धीरे-धीरे सुस्त हुआ और इस क्षेत्र का पर्यटन कम हो गया, पर अधिकारी परिवार ने फिर भी पर्यटन में भविष्य देखा।

विश्वराज, उनके पिता शिवराज (शिक्षक) और भाई पर्यटन व्यवसाय में जुटे। पोखरा में ट्रेकिंग सप, ट्रैवल एजेंसी और २००० के दशक में गेस्ट हाउस चलाया। कई चुनौतियों का सामना किया। शहर में काम सफल नहीं हुआ, लेकिन गांव लौटकर सफलता मिली।

इको विलेज का विचार : सीखते हुए काम करना

‘इको विलेज’ केवल व्यावसायिक नाम नहीं है, उन्होंने यूरोप और भारत के इको विलेज से प्रेरणा लेकर एवं काठमांडू के पर्यावरण मित्र परियोजना से सीख कर ‘करते-करते सीखने’ का नीति अपनाई है।

गांव की स्थानीय लकड़ी, पत्थर और मिट्टी का उपयोग करते हुए पारंपरिक घर बनाए और स्थानीय वास्तुकला का संरक्षण किया।

पर्यटकों को अपने फार्म के दूध, दही, घी, पनीर और स्थानीय जड़ी-बूटियों के साथ विशेष ‘इको टी’ प्रदान की जाती है, जो लोकप्रिय है।

कोरोना महामारी के दौरान जब शहर के व्यवसाय बंद थे, तब दोनों भाई गांव लौटकर प्रबंधन में लगे।

मुख्य संचालक विश्वराज अधिकारी प्रबंधन और बाजार व्यवस्था देखते हैं। उनके छोटे भाई ने सिंगापुर से होटल प्रबंधन की पढ़ाई की है और आतिथ्य तथा सेवा की गुणवत्ता में सुधार कर रहे हैं।

उनके भाई बेदनिधि अधिकारी ट्रेकिंग गाइड और योग-सेवा गुरु हैं। विश्वराज के बेटे भी योग और ध्यान की कक्षाएं चलाते हैं। अब यह जगह न केवल खान-पान के लिए बल्कि वेलनेस और योग केंद्र बन रही है।

यहां २५० घंटे का अंतरराष्ट्रीय योग शिक्षक प्रशिक्षण संचालित होता है, जिसे ३०० घंटे तक बढ़ाने की योजना है।

विश्वराज कहते हैं कि सरकार ने अभी तक इको टूरिज्म को सुव्यवस्थित नीति नहीं दी है। पांच सितारा बड़े होटल और कंक्रीट संरचनाओं को ही पर्यटन मानने की सोच से स्थानीय एवं प्राकृतिक पर्यटन की अनदेखी हुई है।

जमीन में जैविक खाद का उपयोग, गाई-भैंस पालन, स्थानीय उत्पादों का संवर्धन और पर्यटकों को प्राकृतिक वातावरण में आनंद देने से ही सच्चा इको टूरिज्म संभव होता है, जो उनकी मान्यता है।