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नेपाल-चीन सीमा पर आई बाढ़ और भूस्खलन: अंतरराष्ट्रीय मीडिया का विश्लेषण

नेपाल-चीन सीमा पर २०२६ साल अशोज १० गते आई बाढ़ और भूस्खलन ने नेपाल में ७०० से अधिक लोगों की जान ले ली है, जबकि हजारों लोग लापता हैं। त्रिशूली और भोटेकोशी नदी प्रणालियों में हिमनद का बड़ा हिस्सा टूटकर गिरा, जिससे यह बाढ़-भूस्खलन हुआ, जिसने नेपाली सहित विभिन्न देशों के पर्यटक और तीर्थयात्री प्रभावित हुए। चीनी और नेपाली बचाव दल केरुङ सीमा नाके समेत प्रभावित क्षेत्रों में खोज अभियान जारी रखे हुए हैं। इस आपदा में पुनर्निर्माण और राहत कार्य के लिए चार से पांच अरब डॉलर की आवश्यकता होने का अनुमान लगाया गया है।

इस घटना ने विश्व के प्रमुख संचार माध्यमों का ध्यान आकर्षित किया है। अमेरिकी पत्रिका “द न्यूयोर्कर” के पत्रकार ईशान थरूर ने इस आपदा को वैश्विक जलवायु अन्याय का प्रतीक बताया है। उन्होंने जलवायु न्याय से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हुए लिखा है कि नेपाल का वैश्विक उत्सर्जन में हिस्सा नगण्य होने के बावजूद हिमनद प्रणालियाँ असमान रूप से लागत वहन कर रही हैं।

“द न्यूयॉर्क टाइम्स” ने इस घटना की वैज्ञानिक दृष्टि से गहराई से व्याख्या की है। इस पत्रिका के अनुसार, लगभग १७,००० फुट ऊंचाई पर स्थित हिमनद का लगभग २,००० फुट चौड़ा भाग टूटकर नीचे गिरा, जिससे मार्ग में आने वाली सभी चीजें क्षतिग्रस्त हुई हैं। कनाडा के कॅल्गरी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डैनियल शूगर ने उपग्रह चित्रों के अध्ययन से बताया है कि इस क्षेत्र का निचला हिस्सा विस्फोट से क्षतिग्रस्त दिख रहा है।

“द गार्डियन” ने इस आपदा का विश्लेषण मुख्यत: बचाव और मानवीय संवेदनाओं के नजरिए से किया है। बाढ़ के पश्चात बनने वाले अवरोधक ताल ने और भी बाढ़ के खतरे को बढ़ा दिया है, जिससे बचाव कार्य को कठिनाई हुई है।”रायटर्स” ने इस घटना के आंकड़ों को लगातार अपडेट करते हुए मृतकों और लापता व्यक्तियों की संख्या में बदलाव को प्राथमिकता दी है। २२ वर्षीया माटी माया तामांग ने अपने आठ वर्षीय पुत्र जोएल घले के साथ पुनर्मिलन की मार्मिक कथा भी रायटर्स द्वारा प्रस्तुत की गई है।