
समाचार सारांश
सामग्री को संपादकीय समीक्षा के बाद प्रस्तुत किया गया है।
- आपदा के दौरान बड़ी संख्या में शव मिलने पर शव प्रबंधन में अभिलेखन, डीएनए नमूना संग्रह, टैगिंग और मैपिंग अनिवार्य होती है – डॉ. गोपाल चौधरी ने बताया।
- सड़ने लगे शवों को फ्रिज में रखना सुरक्षित नहीं होता, वैज्ञानिक दृष्टि से अस्थायी दफन उपयुक्त उपाय है।
- शवों को जलाने पर पहचान और रिश्तेदारों के धार्मिक-सांस्कृतिक अधिकार खराब हो सकते हैं इसलिए अस्थायी दफन को स्थायी अंतिम संस्कार न समझने का आग्रह किया।
बाढ़, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान खोज एवं उद्धार के साथ मृतक शवों का प्रबंधन एक बड़ी चुनौती होता है। बड़ी संख्या में शवों का मिलना, दुर्गम क्षेत्रों में उद्धार में देरी और शव सड़ने लगे होने पर उन्हें सुरक्षित रखना एक जटिल विषय होता है। इसी संदर्भ में शवों को जलाना या अस्थायी रूप से दफनाने पर भी बहस होती है।
त्रिवि शिक्षण अस्पताल के फॉरेंसिक विभाग के प्रमुख डॉ. गोपाल चौधरी के अनुसार आपदा के समय शव प्रबंधन में केवल भावनात्मक पक्ष ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक, कानूनी और मानवाधिकारों का भी विशेष ध्यान देना होता है।
शव की सही पहचान सुरक्षित रखने के लिए डीएनए नमूना लेना, शव को टैग करना, प्रबंधन स्थल का अभिलेख रखना, उसका मैपिंग करना और पहचान के बाद रिश्तेदारों को जिम्मेदारी देना आवश्यक होता है।
इसी संदर्भ में त्रिवि शिक्षण अस्पताल के फॉरेंसिक विभाग प्रमुख डा. गोपाल चौधरी से बाढ़ में मृतकों के शव प्रबंधन, पहचान और अस्थायी दफन पर सुमित्रा लुइँटेल ने बातचीत की, जिसका अंश नीचे दिया गया है:
आपदा के समय बड़ी संख्या में शव मिलने पर प्रबंधन कितना चुनौतीपूर्ण होता है?
आपदा के समय शवों को सुरक्षित रखना बहुत बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य है। यह दुनिया के सभी देशों के लिए चुनौती है। सामान्य अवस्था में शवों को सुरक्षित रखने का सर्वोत्तम उपाय ठंडे फ्रिज (रेफ्रिजरेशन) में रखना होता है।
लेकिन आपदा के दौरान बड़ी मात्रा में मानवीय क्षति होती है। ऐसी स्थिति में एक साथ बहुत सारे शव आते हैं तो सभी को फ्रिज में रखना संभव नहीं होता।
हमारे देश की भौगोलिक परिस्थितियां भी अतिरिक्त चुनौतियां पेश करती हैं। कई जगहों पर उद्धार दल का पहुंचना मुश्किल होता है, जिससे शवों को तुरंत निकालना संभव नहीं होता और सड़न प्रक्रिया शुरू हो चुकी होती है।
सड़ने लगे शवों को फ्रिज में रखने से क्या वे सुरक्षित रहते हैं?
फ्रिज तभी प्रभावी होता है जब शव सड़ना शुरू करने से पहले उसमें रखा जाए। समय पर फ्रिज में रखने पर सड़न की प्रक्रिया को रोका या धीमा किया जा सकता है।
लेकिन जब एक बार सड़न की प्रक्रिया (डिकम्पोजीशन) शुरू हो जाए तो फ्रिज में रखने से इसे पूरी तरह रोकना संभव नहीं है।
सड़े हुए शव को फ्रिज में रखने पर भी भीतर की सड़न जारी रहती है। इसलिए अधिकांश मामलों में पहले से सड़े शवों को सभी को फ्रिज में रखना सर्वोत्तम समाधान नहीं होता।
तो बड़ी संख्या में सड़े शवों का वैज्ञानिक प्रबंधन कैसे किया जाना चाहिए?
ऐसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय अभ्यास के अनुसार अस्थायी रूप से जमीन में दफनाना एक महत्वपूर्ण उपाय है। बड़ी संख्या में शवों का प्रबंधन करते समय वैज्ञानिक विधि से अस्थायी दफन करना चाहिए, बिना कोई लापरवाही किए।
सबसे पहले शव की सभी जानकारियां अभिलेख में दर्ज करनी चाहिए। शव की पहचान के आधार और अन्य विवरण रिकॉर्ड करने चाहिए। डीएनए नमूने लिए जाएं और शव को स्पष्ट रूप से टैग किया जाए।
यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि शव कहाँ दफन किया गया है, इसके अभिलेख और मैपिंग रखी जाएं। यदि संभव हो तो डिजिटल या गूगल मैपिंग भी कर उस स्थान को सुरक्षित रखा जाए।
शव का डीएनए नमूना लेना क्यों जरूरी है?
डीएनए ही पहचान का प्रमुख आधार होता है। आपदा के दौरान शरीर की हालत खराब होकर चेहरा पहचान योग्य नहीं हो सकता। ऐसे में डीएनए द्वारा पहचान संभव होती है।
इसलिए शव प्रबंधन से पहले इसका डीएनए नमूना लेना और प्रोफाइलिंग करना जरूरी होता है। साथ ही गुमशुदा व्यक्तियों के रिश्तेदारों से भी डीएनए नमूना लेना चाहिए।
पुलिस या जांच एजेंसियां रिश्तेदारों के डीएनए नमूने संग्रहण में समन्वय करें।
प्रयोगशाला में नमूने की प्रोफाइलिंग कर मृतक के नमूने से तुलना की जा सकती है।

शव दफनाई गई जगह के अभिलेख क्यों जरूरी हैं?
अस्थायी रूप से दफनाने के बाद यह स्पष्ट होना चाहिए कि शव कहाँ है। इसलिए टैगिंग और मैपिंग बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। उदाहरण के लिए एक शव चितवन में तो दूसरा धुन्चे में अस्थायी रूप से दफन हो सकता है।
डीएनए परीक्षण के बाद पहचान होने पर टैगिंग से पता लगाया जा सकता है कि शव किस स्थान पर है।
फिर संबंधित स्थान से शव या अवशेष निकाल कर रिश्तेदारों को सौंपा जा सकता है। इसलिए लापरवाह तरीके से दफन करना सही नहीं, हर शव का अभिलेख और स्थान सुरक्षित रखना आवश्यक है और वर्तमान प्रबंधन इसी अनुसार है।
अस्थायी रूप से जमीन में दफन करने के बाद शव कितनी अवधि तक सुरक्षित रहते हैं?
जमीन में दफन करने पर सड़न की प्रक्रिया धीमी होती है क्योंकि जमीन में हवा कम होती है और तापमान ठंडा रहता है।
लगभग दो से तीन महीनों तक दफनाने से सड़न प्रक्रिया धीमी रहती है, लेकिन समय के साथ मृदु ऊतक (सॉफ्ट टिशू) सड़ने लगते हैं। लगभग एक वर्ष बाद शव अस्थि-पंजर में बदल सकता है।
इसलिए अस्थायी दफन का उद्देश्य शव को स्थायी रूप से सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि पहचान एवं रिश्तेदारों को जिम्मेदारी सौंपने तक वैज्ञानिक रूप से अस्थायी प्रबंधन करना होता है।
यदि शव पहले से ही सड़ चुका हो तो अस्थायी दफन क्यों उपयुक्त होता है?
डिकम्पोजीशन (सड़न) हो चुके शव को फ्रिज में रख कर पुरानी स्थिति में वापस नहीं लाया जा सकता। इसलिए ऐसे मामलों में अस्थायी तौर पर जमीन में दफन करना वैज्ञानिक तथा व्यावहारिक उपाय है।
एक वर्ष बाद मृदु ऊतक नष्ट हो जाने पर हड्डियां ताजा रहती हैं, जिनसे पहचान हेतु आवश्यक अवशेष सुरक्षित रखे जा सकते हैं। म्याच हो जाने पर अवशेष रिश्तेदारों को सौंपा जा सकता है, और वे अपनी धार्मिक व सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार कर सकते हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि शव दफनाने से बेहतर है जल्दी से जलाना, आपका क्या विचार है?
यह दृष्टिकोण वैज्ञानिक और मानवाधिकार की दृष्टि से उचित नहीं है। शव जलाने से पहचान के लिए आवश्यक सबूत नष्ट हो सकते हैं। मृतक की पहचान और उसके रिश्तेदारों के अधिकार सबसे महत्वपूर्ण होते हैं।
नेपाल में अधिकांश लोग हिन्दू हैं, लेकिन सभी का धर्म और संस्कार समान नहीं है। आपदा में विदेशी नागरिक भी गुम हो सकते हैं, जिनका भी अपना धर्म, संस्कार और अंतिम संस्कार के अधिकार होते हैं।
इसलिए शव सड़ने लगे हैं इस आधार पर तुरंत जलाना पहचान असंभव बना सकता है और रिश्तेदारों को अपने धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार करने का अधिकार छिन सकता है।
क्या यह नियम विदेशी नागरिकों पर भी लागू होता है?
हाँ, विदेशी नागरिकों के मामले में भी यही नियम लागू होता है। आपदा में नेपाल में विदेशी नागरिक भी प्रभावित होते हैं। संबंधित दूतावास अपने नागरिकों की खोज और खोजबीन करने का प्रयास करते हैं।
इसलिए यदि मृतक विदेशी नागरिक हैं, तो भी उनकी अधिकारों का सम्मान जरूरी है। शव की पहचान कर संबंधित परिवार या देश को सौंपने की प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए।
ऐसे मामले में “शव बहुत सड़ चुका है, बदबू आ रही है, तो जलाया जाए” कहना बड़ी मानवीय और कानूनी समस्या पैदा कर सकता है।
शव को लापरवाही से गाड़ना ठीक नहीं कहा जाता, क्या यह सच है?
शव को लापरवाही से दफनाना गलत है। अस्थायी दफन एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जो वर्तमान में सरकार द्वारा भी अपनाई जा रही है। इसमें शव का अभिलेख, डीएनए नमूना संग्रह, टैगिंग और स्थान की मैपिंग शामिल होती है।
यह पता होता है कि कौन सा शव कहाँ दफन है, कौन सा नमूना लिया गया है और वह कहाँ सुरक्षित है। डीएनए मैच होने के बाद शव निकाला जाता है और रिश्तेदारों को सौंपा जाता है।
शव प्रबंधन में मानवाधिकार का पक्ष कैसे जुड़ता है?
मानव अधिकार केवल जीवित व्यक्ति के अधिकार नहीं होते, मृतक को सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार करने का भी अधिकार महत्वपूर्ण होता है।
अगर पहचान किए बिना या अभिलेख के बिना शव को जलाया या दफनाया जाता है तो परिवार अपने सदस्य के शव का धार्मिक रीति-रिवाज अनुसार अंतिम संस्कार करने का अधिकार खो देता है। इसलिए अस्थायी दफन से पहचान सुरक्षा और मृतक तथा परिवार दोनों के सम्मान की गारंटी मिलती है।
अस्थायी दफन से महामारी का खतरा नहीं होता?
सड़े हुए शव को लंबे समय तक ढोने, पोस्टमार्टम करने या विभिन्न जगहों पर ले जाने से बदबू और स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। आपकी यह चिंता जायज है क्योंकि आपदा स्वास्थ्य संकट को बढ़ा सकता है।
इसलिए ऐसे शवों को वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीकों से अस्थायी रूप से जमीन में रखना उपयुक्त होता है। डीएनए नमूना और अभिलेख रखने के बाद मैच होने पर शव निकाला जा सकता है और परिवार को सौंपा जा सकता है।
क्या नेपाल में पहले भी इस तरह की प्रथाएं हुई हैं?
यह नेपाल के लिए नया नहीं है। 2072 साल के भूकंप के दौरान भी इसी तरह शव प्रबंधन किया गया था। उस वक्त लगभग 32 शवों को अस्थायी रूप से जमीन में दफनाया गया था।
कुछ वर्षों बाद रिश्तेदारों से डीएनए नमूने लेकर मृतकों से तुलना की गई और पहचान होने पर शव परिवार को सौंपा गया।
इसलिए वर्तमान अस्थायी दफन को स्थायी अंतिम संस्कार न समझना चाहिए। यह एक अस्थायी प्रक्रिया है जो पहचान और परिवार को जिम्मेदारी सौंपने तक का प्रबंधन है।

अभी मिले शव प्रबंधन में सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया क्या है?
सबसे महत्वपूर्ण पहला कदम शव के अभिलेख बनाना है। फॉरेंसिक विशेषज्ञ और चिकित्सक को शव की पहचान के आधार रिकॉर्ड करने चाहिए। इसके बाद डीएनए नमूना लेना और साफ़ टैगिंग करना जरूरी है। शव प्रबंधन किए गए स्थान को स्पष्ट करना और सुरक्षित रखना ज़रूरी होता है, यदि आवश्यक हो तो मैपिंग भी करें।
दूसरी ओर गुमशुदा व्यक्तियों के रिश्तेदारों से भी डीएनए नमूना लेकर प्रयोगशाला में प्रोफाइलिंग करनी चाहिए। मृतक और रिश्तेदार डीएनए मैच होने के बाद अभिलेख की मदद से शव का पता लगाया जा सकता है। फिर उसे खुदवाकर परिवार को सौंपा जाता है, जहाँ वे धर्म और संस्कृति के अनुसार अंतिम संस्कार कर सकते हैं।
अंत में, वर्तमान अस्थायी शव प्रबंधन के बारे में जनता को क्या समझना चाहिए?
मैं अनुरोध करता हूं कि अभी किए जा रहे प्रबंधन को स्थायी अंतिम संस्कार न समझा जाए। यह एक अस्थायी व्यवस्था है जिसका उद्देश्य शव की पहचान, अभिलेख और अवशेषों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
आपदा के दौरान भावनात्मक दबाव तो होता है, लेकिन ऐसी स्थितियों में वैज्ञानिक और व्यवस्थित निर्णय लेना आवश्यक है। शव को बिना सोचे-समझे जलाने या दफनाने से बेहतर है पहचान के सारे उपाय सुरक्षित रखें।
जैसे जीवन बचाना महत्वपूर्ण है, वैसे ही मृत्यु के पश्चात सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसलिए आपदा के समय शव प्रबंधन में वैज्ञानिक विधि, फॉरेंसिक प्रक्रिया, डीएनए पहचान, उचित अभिलेख और मानवाधिकार को एक साथ ध्यान में रखना जरूरी होता है।





