
समाचार सारांश
- भोटेकोशी बाढ़ ने रसुवा में 41 मोटरेबल पुलों को नुकसान पहुंचाया और 35 को पूरी तरह बहा दिया।
- रसुवा बेत्रावती से स्याफ्रुबेसी–रसुवागढ़ी सड़क पूरी तरह क्षतिग्रस्त होकर जिला सड़क संपर्क से कट गई है।
- विशेषज्ञों ने बाढ़ के बाद पुल मानकों, रणनीतिक पुल निर्माण तथा नदी बेसिन के आधार पर अवसंरचना योजना का पुनरावलोकन करने की आवश्यकता बताई।
१८ भदौ, काठमांडू। १० भदौ को दिन रसुवागढ़ी नाके से नेपाल में प्रवेश करने वाली भोटेकोशी नदी की प्रलयकारी बाढ़ ने निचले इलाकों तक पहुंचकर कम से कम ४१ मोटरेबल पुलों को क्षति पहुंचाई, जिनमें से ३५ पुल पूरी तरह बह गए।
रसुवा के बेत्रावती से मैलुँ होते हुए स्याफ्रुबेसी-रसुवागढ़ी को जोड़ने वाली सड़क पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई है। रसुवा जिले में मात्र ४० किलोमीटर सड़क पूरी तरह नष्ट होने की वजह से जिला सड़क संपर्क पूर्ण रूप से कट गया है।
वैकल्पिक सड़क तो खुली है पर वह पर्याप्त प्रभावी नहीं है। त्रिशूली पार के नुवाकोट भी वर्तमान में सीधे सड़क सुविधाओं से वंचित हैं।
८५ किलोमीटर लंबे गल्छी-रसुवागढ़ी सड़कखंड में लगभग तीन दर्जन पुल बने थे। पूर्व सचिव केशव शर्मा के अनुसार छोटी और कमजोर पुल बनाने का विकल्प इस बाढ़ ने सही नहीं साबित किया है।
उन्होंने कहा कि अवसंरचना विकास को जिले या स्थानीय तह के राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठाकर पूरे नदी बेसिन के भूगोल के आधार पर योजनाबद्ध करना सीखना चाहिए।
उनके अनुसार अब पुल निर्माण की योजना निश्चित दूरी पर बनानी चाहिए, जो पुल नदी के प्रवाह को सहन कर सकने वाले, जलवायु के अनुकूल एवं उपयुक्त तकनीकों के साथ बने। छोटे छोटे पुलों के बजाय रणनीतिक और बड़े पुल बनाकर उन्हें बस्तियों से जोड़ने वाले सड़क निर्माण पर ध्यान देना होगा।
राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण व प्रबंधन प्राधिकरण के पूर्व कार्यकारी प्रमुख अनिल पोखरेल ने कहा कि यह बाढ़ मौजूदा पुल निर्माण के मानकों को बदलने का स्पष्ट संकेत देती है।
‘अब तक बने पक्के पुल यहाँ के भूगोल में आने वाली बाढ़ को रोकने में असमर्थ साबित हुए हैं,’ उन्होंने कहा, ‘इसलिए दोबारा मानकों पर पुनर्विचार आवश्यक है।’
रसुवागढ़ी के मितेरी पुल से मुग्लिन तक जो पुल बने हैं, उनमें सबसे सुरक्षित लगभग नया मुग्लिन का आर्क ब्रिज पिछले बाढ़ में बचा। इसे बाढ़ के पानी के साथ बहने वाली वस्तुओं से बचाने के लिए डिजाइन किया गया है।
‘अब हमें केवल पानी नहीं, बल्कि गेग्रान जैसे अन्य वस्तुओं के प्रवाह पर भी ध्यान देना होगा। हिमालयी बाढ़ का प्रवाह अलग होता है, इसलिए उसी अनुसार अवसंरचना बनानी होगी,’ उन्होंने कहा।
पोखरेल ने बताया कि भोटेकोशी नदी की बाढ़ में पानी के मुकाबले अन्य वस्तुओं का प्रवाह अधिक था, जो अत्याधिक शक्तिशाली था, जिसे मानवीय अवसंरचना रोक नहीं पाई।
बहाए गए पुलों के पानी में डूबने के बजाय उच्च स्तर पर तैरते दिखने से साफ होता है कि बाढ़ में पानी के अलावा अन्य वस्तुओं की मात्रा अधिक थी। पोखरेल पुल निर्माण को राजनीतिक मुद्दा बनाने के विरुद्ध भी जोर देते हैं।
पुल मानकों ने कल्पना तक नहीं की थी ऐसी बाढ़
सड़क विभाग के अनुसार भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ का स्तर ऐसा था जिसको सामना करने के लिए कोई प्रचलित मानक तैयार नहीं थे।
विभाग के महानिर्देशक डॉ. विजय जैसी ने कहा कि पुल निर्माण के लिए निश्चित मानक होते हैं और उसी के अनुरूप पुल बनाए जाते हैं, परंतु इस प्रकार की बाढ़ कभी अनुमानित नहीं थी।
‘यह बाढ़ कितने सौ सालों में आई है, इसका अध्ययन बाद में होगा,’ उन्होंने कहा, ‘हमारे वर्तमान मानकों के अनुसार इस बाढ़ को सहन करने वाला संरचना नहीं बनाई गई है, बल्कि बची हुई पुलों के बचाव पर और अध्ययन की जरूरत है।’
ऊंचे और लंबे पुल बनाने का अवसर
सड़क विभाग के महानिर्देशक जैसी ने कहा कि यह बाढ़ कम से कम रणनीतिक पुल निर्माण में राज्य को पर्याप्त निवेश करने का स्पष्ट संदेश देती है। पुल का आकार बड़ा बनाया जा सकता है, हालांकि लागत बढ़ेगी।
परंतु इसमें जो आवश्यकता है, वह पूर्वाधार को प्रभावी बनाना है। आने वाले समय में पुलों के स्तर को वर्गीकृत कर रणनीतिक महत्त्व के पुलों को तेज डिजाइन के साथ बनाना जरूरी होगा, उन्होंने कहा।
उनका मानना है कि कम से कम जिला मुख्यालय को जोड़ने वाली राजमार्ग की पुलें लंबी और ऊंची होनी चाहिए।
डायरेक्टर जैसी ने यह भी बताया कि विभाग नई मानक जरूर बनाएगा। ‘ऐसी घटनाएं अन्य नदियों में भी दोहरा सकती हैं,’ उन्होंने कहा, ‘इसलिए मानकों को फिर से बनाना जरूरी है।’
जलवायु परिवर्तन के चलते हिमालयी क्षेत्र के देशों को भी इसी के अनुसार अवसंरचना बनानी होगी और जोखिम न्यूनीकरण प्राथमिकता लेनी होगी, विशेषज्ञों का मानना है।
महानिर्देशक जैसी के अनुसार मुग्लिन के आर्क ब्रिज जैसे डिजाइन अब रणनीतिक सड़कों पर नहीं बनेंगे। विभाग उसके अनुसार नए मानक बनाएगा। अभी भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों पर पुल पुनर्निर्माण की योजना के लिए अध्ययन के बाद ही निर्णय होगा।

तत्काल सड़क खोलने के उद्देश्य से सरकार तीन जगह बेलिब्रिज बनाने की तैयारी में है।
देवीघाट स्थित त्रिशूली नदी पर तादी खोला पुल बह जाने वाली जगह पर बेलिब्रिज लगाया जाएगा। दूसरा पुल त्रिशूली बाजार में पुराने पुल के बह जाने वाले स्थान पर लगाया जाएगा। तीसरा पुल नुवाकोट और रसुवा को जोड़ने वाले बेत्रावती क्षेत्र में स्थापित किया जाएगा।
‘इन तीन स्थानों पर बेलिब्रिज लगाने के बाद मुख्य राजमार्ग पुन: संचालित हो सकेगा,’ उन्होंने कहा, ‘फिर बाकी पुलों को तकनीकी अध्ययन व आवश्यकता के आधार पर स्थाई रूप से बनाया जाएगा।’
पूर्व सचिव शर्मा कहते हैं कि अब नदी किनारे और खड़ी भूभाग में अवसंरचना बनाने के लिए क्षेत्रीय मात्र के मानक और विशेषज्ञता काफी नहीं है।
उनके अनुसार अब स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग के साथ-साथ भौगोलिक, भू-प्राविधिक, जल विज्ञान, नदी के आकार और हिम नदी की स्थिति तक बहुआयामी विचार और अध्ययन होना चाहिए। इसके साथ ही संबंधित विषय विशेषज्ञों की सलाह भी माननी होगी।
वर्तमान में नेपाल के नदी किनारे सड़क रेखांकन, पुल और बांध १०० वर्षों की बाढ़ औसत इतिहास देखकर डिज़ाइन होते हैं। यह मानक वर्तमान आर्थिक वर्ष २०७५/७६ से लागू हुआ है। इससे पहले के मानक ५० वर्षों के इतिहास पर आधारित थे।
जलवायु परिवर्तन के कारण असामान्य भारी वर्षा (क्लाउड ब्रस्ट) और गेग्रान के प्रवाह, वायु परिवर्तन जैसी नई प्रवृत्तियों को ध्यान में रखते हुए उच्च बाढ़ स्तर और अतिरिक्त ऊंचाई सूचीबद्ध करनी होगी और प्रभाव सूचकांक के मानकों को पुनर्परिमार्जित करना जरूरी है, यह सुझाव भी उन्होंने दिया है।





