कल तक पूरा था गाँव
पूरा था बस्ती
आसमान जैसे विशाल आँगन में खेलते थे बच्चे
गोठ में बँधे रहते थे पशु-पशुपालन
स्कूल जाने की जल्दी में
छोटे-छोटे बच्चे स्कूल बस का इंतजार करते थे
माँयां रसोई में व्यस्त रहती थीं
अचानक हुआ-
बाढ़ का पहाड़ सिर पर गिरा
उलट दिया घर, बहा दिए वाहन और लोग
क्षण भर में गाँव मिट्टी बन गया
मिट्टी की खान क्या हुई?
यहाँ-वहाँ दिखाई देते हैं जैसे
दराज, पलंग और बर्तन
झोला, किताबें और टिफिन बॉक्स
अब
टूट चुके हैं पुल
जो जोड़ते थे रिश्तों को
अब
गुम हो गईं सड़कें
जो जोड़ती थीं भटके हुए यात्रियों को
ठीक अभी
पहाड़ की पेट में
अंधेरी सुरंग में बंद है मजदूर
छिपे मलबे के भीतर दम तोड़े हुए शव
खो गई है इंसान की याद
मैं सोच रहा हूँ –
घर फिर से बन सकता है?
पुल फिर से बन सकते हैं?
सड़क फिर खुल सकती है?
स्कूल फिर से रंगीन हो सकते हैं?
मैं सोच रहा हूँ –
मां की गोद से बहे बच्चों की वापसी कब होगी?
पिता के कंधे से गिरे सपने कौन-सी ईंट उठाएगा?
मिट्टी के नीचे दबा नाम फिर कौन-सा सवेरा पुकारेगा?
मैं समय से सवाल पूछना चाहता हूँ
क्या हंसता हुआ देश बड़ा होगा
या रोता हुआ सुनसान गाँव?







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