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मंत्री बदलाव से जनता को गैस की सुविधा नहीं मिलेगी

  • देशभर एलपी गैस की कमी के बीच उद्योग, वाणिज्य एवं आपूर्ति मंत्री गौरीकुमारी यादव ने इस्तीफा दिया है और दीपककुमार साह को नया मंत्री नियुक्त किया गया है।
  • प्रतिनिधि सभामें सांसदों ने गैस की कमी के कारण सरकार की खामी पर कड़ी आलोचना करते हुए कहा — ‘मंत्री नहीं, गैस चाहिए।’
  • पूर्व सचिव और विशेषज्ञों ने गैस की कमी का मुख्य कारण वितरण प्रणाली में अव्यवस्था, कमजोर अनुश्रवण और भंडारण की कमी बताया है।

26 भदौ, काठमांडू। काठमांडू घाटी सहित देश के विभिन्न जिलों में इस समय खाना पकाने के लिए एलपी गैस की भारी कमी है। नागरिक सिलेंडर लेकर सड़कों पर घूम रहे हैं, कुछ सड़क पर ही चावल पका कर खा रहे हैं, तो कुछ गैस उपलब्ध कराने के लिए सरकार से मांग करते हुए आंदोलन कर रहे हैं।

उपभोक्ताओं के चूल्हे न जलने के कारण व्यापक आलोचना और दबाव के बीच उद्योग, वाणिज्य एवं आपूर्ति मंत्री गौरीकुमारी यादव ने अंततः पद से इस्तीफा दे दिया।

बालेन्द्र (बालेन) शाह के नेतृत्व वाली सरकार के गठन को डेढ़ माह से अधिक हो चुका है और गैस की इस गंभीर कमी से जूझ रहे आम जनता के लिए मंत्री के इस्तीफे और नए मंत्री की नियुक्ति बड़ी चर्चा का विषय बनी है, पर जनता के मन में आज भी एक सवाल है — ‘मंत्री बदलने से क्या घर में खाली सिलेंडर भरेंगे?’

नई शक्तिशाली सरकार बनने के बाद सहज आपूर्ति, सुशासन सुनिश्चित करने और कालाबाजारी खत्म होने की उम्मीद रखने वाले नागरिक फिलहाल निराश हैं।

स्थिति इतनी दयनीय है कि गैस सिलेंडर के लिए आम लोग 3 हजार रुपये तक देने को मजबूर हैं। सरकार द्वारा निर्धारित 2,060 रुपये के दाम में कालाबाजारी और लूटपाट होने के बावजूद राज्य तंत्र प्रभावी कदम नहीं उठा पाया है।

बल्कि, ‘पुराने राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता जानबूझकर गैस को छिपा रहे हैं’, इस आरोप के माध्यम से उपभोक्ता और जनता पर दोष मढ़ा जाने की कोशिश हो रही है।

अपने ही मंत्रालय के कर्मचारी सहयोग नहीं करने, नेपाल ऑयल निगम के असहयोग तथा गैस उद्योगवादियों की सिंडिकेट को तोड़ने में विफलता के कारण गौरीकुमारी यादव ने मंत्री पद छोड़ा।

पूर्व उद्योग मंत्री गौरीकुमारी यादव

गुरुवार को प्रधानमंत्री बालेन शाह ने उनकी जगह सुनसरी-4 से निर्वाचित दीपककुमार साह को नियुक्त किया। साह ने अपने पदभार ग्रहण के साथ ही गैस समस्या के समाधान के लिए काम शुरू कर दिया है।

लेकिन नए मंत्री के लिए भी तुरंत गैस आपूर्ति को सुगम बनाना थोड़ा मुश्किल और चुनौतीपूर्ण है। क्योंकि नेपाल की गैस संकट केवल एक मंत्री की समस्या नहीं है, बल्कि यह संरचनात्मक कमज़ोरी, नीतिगत असफलता, व्यापारियों की सिंडिकेट और आधारभूत संरचना की कमी से गहराई से जुड़ा हुआ है।

पुष 2082 से ही गैस की कमी शुरू हो चुकी है। पश्चिम एशिया में युद्ध ने आपूर्ति प्रणाली को प्रभावित किया है और यह समस्या अब तक हल नहीं हो पाई है। इसके बावजूद सरकार ने कई प्रयास किए हैं, पर सफलता नहीं मिली है।

संसद में जनता का आक्रोश: ‘मंत्री नहीं, गैस चाहिए’

गैस की कमी का मुद्दा सड़क से लेकर संसद तक गंभीर रूप से उठने लगा है। आज की प्रतिनिधि सभा की बैठक में सांसदों ने सरकार की कड़ी आलोचना की।

सरकारी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) की सांसद आशिका तामांग ने कहा कि सरकार न्यूनतम गैस व्यवस्था भी नहीं कर पाई है।

उन्होंने कहा, ‘मुझे हर दिन फोन आते हैं कि गैस दुकान में तो है, पर दुकानदार बेचने को तैयार नहीं। यह सुनना कठिन है, लेकिन मेरी सुनवाई हो रही है। क्या इस देश में सरकार से बड़ा कोई माफिया है?’

रास्वपा सांसद आशिका तामांग

सांसद तामांग ने दो-तिहाई सरकार को चेतावनी दी कि वे जनता को गैस न मिलने से भूखे रहने का दृश्य ना देखने दें।

उन्होंने कहा, ‘अगर सचमुच गैस नहीं है तो तत्काल घोषणा की जाए और जनता को चावल पकाने के लिए बर्तन खोजने को कहा जाए। अन्यथा महीने-2 मंत्री बदलते रहेंगे तो यह बड़ा नुकसान होगा।’

नेपाली कांग्रेस की सांसद गीता गुरुङ ने भी संसद में कहा कि नई मंत्रिपरिषद बनने से पहले गैस खोजना जरूरी है। ‘मंत्री बदले गए, अब घर में खाली सिलेंडर भी भरवाएं।’

भंडारण क्षमता की कमी और परनिर्भरता

पृथ्वी राजमार्ग पर कृष्णभीर की भूस्खलन घटना और भारतीय रिफाइनरी मरम्मत के कारण नेपाल में गैस की कमी फिर से दिखने लगी है। इसका मुख्य कारण राष्ट्रीय भंडारण संरचना की कमी है।

नेपाल में कोई आधिकारिक सरकारी गैस भंडारण गृह नहीं है। केवल 58 निजी उद्योगों के गैस बुलेट ही लगभग 10 हजार टन का राष्ट्रीय भंडारण कवरेज करते हैं। नेपाल तेल निगम के पास भी गैस बुलेट, बोतलिंग प्लांट और भंडारण गृह संचालित करने की क्षमता नहीं है।

गैस आपूर्ति प्रणाली पूरी तरह से निजी क्षेत्र के नियंत्रण में है। संकट के समय उद्योगी, डीलर और दलाल कृत्रिम रूप से कमी पैदा करके कीमतें बढ़ाते हैं। जब तक राज्य अपना नियंत्रण स्थापित नहीं करेगा, तब तक यह समस्या दोहराएगी।

गैस भंडारण गृह निर्माण कोई नया विषय नहीं है। हर बार गैस की कमी की वजह से सरकार ऐसे प्रोजेक्ट लाती है, लेकिन कार्यान्वयन नहीं हो पाता।

2072 के भीषण भूकंप और भारत द्वारा लगाए गए नाकाबंदी के समय देश में गैस संकट हुआ था। उस वक्त नेपाल तेल निगम ने 35 हजार टन क्षमता का भंडारण गृह बनाने का योजना बनाई थी, पर यह योजना सफल नहीं हुई।

2076 में झापा और चितवन में भंडारण गृह निर्माण प्रस्ताव मंत्रिपरिषद को दिया गया था, लेकिन ग्यास के उपभोग को घटाकर बिजली उपयोग बढ़ाने की सरकार की नीति के कारण यह योजना रद्द कर दी गई।

कोविड-19 महामारी के दौरान झापा, जनकपुर और चितवन में भंडारण गृह और बोतलिंग प्लांट निर्माण शुरू हुए, लेकिन अब तक प्रभावशील नहीं हो पाए।

भंडारण और पाइपलाइन की समस्याओं के कारण नेपाल भारतीय बुलेट का उपयोग कर गैस ला रहा है, जिस पर सालाना लगभग 6 अरब रुपये भारत को ढुलाई शुल्क के रूप में देते हैं।

अभी सिराही के नेत्रगंज में लगभग 45 से 50 हजार टन क्षमता वाले भंडारण गृह और पाइपलाइन बनाने की योजना है। सरकारी प्रतिनिधि बताते हैं कि अगले तीन वर्षों में यह परियोजना पूरी होगी।

परंतु निवेश की व्यवस्था तय नहीं होने के कारण इसे केवल कागजों तक सीमित रहने का डर है।

नीतिगत स्तर पर सुधार आवश्यक

उपभोक्ता अधिकार कार्यकर्ता माधव तिमल्सिन ने बताया कि मंत्री बदलाव से गैस आपूर्ति में तुरंत सुधार संभव नहीं है। उनके अनुसार गैस कमी की जड़ कमजोर वितरण प्रणाली और नीतिगत असफलता है।

‘हमारी वितरण प्रणाली, नियम, प्रक्रिया और सोच पुरानी है, इसलिए मंत्री बदलाव से तुरंत सुधार नहीं होगा,’ तिमल्सिन कहते हैं।

उनका कहना है कि गैस आपूर्तिकर्ता की कमजोर रणनीति मुख्य कारण है। मंत्री को गैस स्टेशन के बीच कूटनीतिक समन्वय एवं नीति बनानी चाहिए थी, पर वे स्वयं वितरण के मामलों में उलझे रहे।

सरकारी कर्मचारी तंत्र को भरोसे में लेकर काम न करने और अनावश्यक हस्तक्षेप से तेल निगम निष्क्रिय हो गया है।

नए मंत्री को प्राकृतिक आपदा की स्थिति में हेलीकॉप्टर से गैस लाने तक की तैयारी करनी चाहिए और जनता का विश्वास जीतना होगा।

आयात बढ़ाने और अनुश्रवण पर जोर

पूर्व वाणिज्य सचिव पुरुषोत्तम ओझा ने कहा कि गैस समस्या के समाधान के लिए आयात बढ़ाने और कड़ाई से अनुश्रवण करने की आवश्यकता है।

उन्होंने बताया कि नए मंत्री को सड़क अवरोध हटाने और 58 उद्योगपतियों की ट्रैकिंग करने पर तुरंत ध्यान देना चाहिए।

ओझा के अनुसार गैस की कमी के दो कारण हैं: आयात कम होना और वितरण व्यवस्था में समस्या।

‘पहला, आयात होने वाली गैस की मात्रा बढ़ानी होगी। दूसरा, ढुलाई की समस्या जल्द हल करनी होगी। राजमार्ग बंद होने पर तराई से ट्रक से गैस आने में लागत बढ़ी है,’ ओझा ने कहा।

उन्होंने बताया कि 58 उद्योगपतियों के आंकड़े रख कर कड़ाई से अनुश्रवण करना होगा, जिससे गैस की चुहावट और कालाबाजारी रोकी जा सके।

पूर्व मंत्री ने कर्मचारियों पर दोष लगाया था, पर ओझा ने कहा कि कर्मचारियों को दोष देना उचित नहीं है; नेतृत्व को भरोसे में लेकर काम करना चाहिए।

उद्योगपतियों का बयान: बाजार में गैस पर्याप्त, ‘पैनिक बाइंग’ समस्या

नेपाल एलपी गैस उद्योग संघ के पूर्व अध्यक्ष शिवप्रसाद घिमिरे के अनुसार बाजार में गैस आपूर्ति सामान्य से अधिक है। राजमार्ग अवरुद्ध होने की वजह से पैनिक बाइंग से गैस की कमी नजर आई है।

उन्होंने आंकड़े प्रस्तुत करते हुए बताया कि काठमांडू घाटी में रोजाना 35 से 40 हजार सिलेंडर गैस खपत होता है, लेकिन हाल के दिनों में इससे अधिक गैस भेजी गई है।

‘सामान्यतः घाटी में 19 भदौ को 34,134, 20 को 29,239, 21 को 42,142, 22 को 48,109, 23 को 46,218, 24 को 53,469 और २५ को 45,324 सिलेंडर भेजे गए,’ घिमिरे ने बताया।

राजमार्ग बंद होने पर छोटी गाड़ियों से ढुलाई हो गई जिससे कीमतें नियंत्रण से बाहर हुईं, इस बात को भी उन्होंने माना।

उन्होंने बताया कि बड़ी गाड़ियों से ढुलाई की व्यवस्था की गई है और छोटी गाड़ियों को काठमांडू में सामान्य वितरण का काम दिया गया है।

उनके अनुसार भारतीय गैस की मात्रा भी बढ़ाई गई है।

‘मासिक 40 से 45 हजार टन आयात होने वाले में भदौ माह में 60,200 टन से अधिक आयात हो चुका है।’

उन्होंने गैस कमी के लिए सरकार द्वारा उद्योगपतियों को दोष देना गलत बताया और ऐसी स्थिति में आरोप-प्रत्यारोप करना दुर्भाग्यपूर्ण माना।

प्रतीत होता है कि आपूर्ति पर्याप्त, पर वितरण व्यवस्था कमजोर

नेपाल तेल निगम के पूर्व कार्यवाहक निर्देशक एवं पेट्रोलियम विशेषज्ञ सुशील भट्टराई ने भी कहा कि नेपाल में बाजार में गैस पर्याप्त है, लेकिन वितरण प्रणाली और अनुश्रवण कमजोर होने से समस्या है।

‘हमें प्रति माह 45 से 46 हजार टन की जरूरत है, जबकि भारत 60 हजार टन तक उपलब्ध करा रहा है,’ उन्होंने कहा, ‘पर वितरण का तालमेल न होने के कारण समस्या बढ़ी है।’

वितरण प्रणाली कमजोर और मनोवैज्ञानिक डर के कारण सभी एकसाथ गैस मांगने पर समस्या उत्पन्न होती है।

‘पहले 1250 सिलेंडर लाने वाले बड़े गैस बुलेट सीधे काठमांडू घाटी आते थे, अब यह काम चार छोटी गाड़ियों से करना पड़ता है,’ उन्होंने बताया।

तेल निगम में अनुश्रवण कमजोर होने के कारण बाजार में व्यावहारिक रूप से ‘खालीपन’ (वैक्यूम) हो गया है। उन्होंने कहा कि निगम के पास गैस विक्रेता को दंडित करने का कानूनी अधिकार भी नहीं है।

ये सभी आंकड़े और विशेषज्ञों का विश्लेषण स्पष्ट करता है कि गैस समस्या केवल राजनीतिक निर्णय से हल नहीं हो सकती।

नए मंत्री के लिए गैस आपूर्ति को सुगम बनाना एक बड़ा चुनौती है। बाजार में कितनी गैस खपत हो रही है और कौन सा उद्योगपति कितना गैस ला रहा है, इसका डेटा सरकार के पास नहीं है।

डीलर प्रमाणन और न्यायसंगत वितरण प्रणाली अभी सार्वजनिक क्षेत्र में प्रभावी नहीं हुई है।

नई नेतृत्व को भारत सरकार और भारतीय तेल निगम के साथ कूटनीतिक समन्वय स्थापित करके निकटवर्ती स्टेशन से गैस लाने का माहौल बनाना होगा।

मंत्री का इस्तीफा गैस आपूर्ति की समस्या का समाधान नहीं है, न ही सड़कें तुरंत पुनर्निर्मित होंगी।

जब तक निजी क्षेत्र की सिंडिकेट नहीं टूटती, राज्य अपना नियंत्रण स्थापित नहीं करता और राष्ट्रीय गैस भंडारण गृह का निर्माण नहीं करता, तब तक उपभोक्ता की स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा।

मंत्री बदलाव केवल एक राजनीतिक घटना है, नागरिकों को सस्ती और उपलब्ध गैस देने के लिए राज्य को दीर्घकालीन संघर्ष जीतना होगा।