
समाचार सारांश
- अमेरिकी सर्वोच्च अदालत ने हुलाक मतदान पर सख्त नियम लागू करने की राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की योजना को अस्वीकार कर दिया है।
- अदालत ने नजदीक आते मध्यावधि चुनाव से पहले यह नियम लागू करने को मनमानी और तानाशाही करार देते हुए ट्रम्प प्रशासन की आपातकालीन अपील खारिज की है।
- फैसले के बाद डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों पक्ष के चुनाव अधिकारीयों ने माना कि चूंकि मतपत्र पहले ही छप चुके हैं, चुनाव के बिलकुल पास नियम में बदलाव से भ्रम की संभावना कम हो गई है।
३० भाद्र, काठमाण्डौ। अमेरिकी सर्वोच्च अदालत ने हुलाक (डाक सेवा) के माध्यम से मतदान पर कड़े नियम लागू करने की राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की योजना को रोक दिया है। आने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले मतदान प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की ट्रम्प प्रशासन की कोशिश को अदालत की यह अदालतीन कार्रवाई ने बड़ा झटका दिया है।
सोमवार को, परंपरावादी बहुमत वाली अदालत ने अमेरिकी जिला न्यायाधीश इन्दिरा तलवानी द्वारा जारी आदेश को खारिज कर दिया, जिन्होंने ट्रम्प के इस नियम के खिलाफ निषेधाज्ञा जारी की थी।
ट्रम्प प्रशासन ने हुलाक मतदान में व्यापक धाँधली होने की बात कहकर चुनाव से ठीक पहले इस नए नियम को लागू करने का प्रयास किया था। लेकिन डेमोक्रेट-नेतृत्व वाले राज्यों और मतदाता अधिकार समूहों ने इसे असंवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए खतरनाक बताया था।
ट्रम्प का नियम क्या था?
मार्च में ट्रम्प के एक कार्यकारी आदेश के बाद हुलाक सेवा ने नया नियम बनाया था। इस नियम के तहत राज्यों को हुलाक सेवा को मतदाताओं की सूची भेजनी होगी और केवल पूर्व-स्वीकृत मतपत्रों के ही इस्तेमाल की अनुमति होगी।
यदि मतपत्र इस मापदंड के अनुसार नहीं थे या मतदाता सूची से मेल नहीं खाते थे तो हुलाक सेवा उन मतपत्रों को अस्वीकार करने का अधिकार रखती थी।
लेकिन न्यायाधीश तलवानी ने कहा कि यह नियम अमेरिकी संविधान का उल्लंघन कर सकता है और आने वाले मध्यावधि चुनाव के समय इसे लागू करना संभव नहीं है, इसलिए इसे रोक दिया।
इसके बाद ट्रम्प प्रशासन ने ‘मतदाता धोखाधड़ी रोकने के लिए मजबूत संघीय नीति की जरूरत’ का हवाला देते हुए सर्वोच्च अदालत में अपील दायर की। हालांकि अगस्त के अंत में अदालत ने प्रक्रियात्मक आधार पर उनका पक्ष सुनते हुए नियम के वैधता पर कोई फैसला नहीं दिया था।
सर्वोच्च अदालत का नया फैसला
सोमवार के फैसले में अदालत ने हस्ताक्षररहित आदेश जारी करते हुए कहा कि ट्रम्प प्रशासन की चुनौती पर ‘गुण-दोष दोनों में सफल होने की संभावना नहीं है।’
अदालत के दो सबसे परंपरावादी न्यायाधीश सैमुअल अलिटो और क्लेरेन्स थोमस ने ट्रम्प के नियम को लागू किए जाने का समर्थन किया।
पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि ट्रम्प द्वारा नियुक्त तीन अन्य न्यायाधीशों ने भी ट्रम्प का पक्ष नहीं लिया, और रिपब्लिकन राष्ट्रपति द्वारा नामित प्रधान न्यायाधीश जॉन जी. रॉबर्ट्स जूनियर ने भी असहमति नहीं जताई।
न्यायाधीश कावानो ने कहा कि चुनाव के नजदीक होने के कारण इस समय नियम लागू करना मनमानी और तानाशाही होगा, हालांकि उन्होंने भविष्य में इस तरह की नीति का समर्थन करने का संकेत दिया।
फैसले के बाद राहत
अदालत के इस निर्णय के बाद डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों पार्टी के चुनाव अधिकारियों ने राहत की सांस ली है। कई राज्यों में मतपत्र पहले ही छप चुके थे और चुनाव के निकट नियम में बदलाव से राजनीतिक उथल-पुथल की आशंका थी।
कैलिफोर्निया के चुनाव प्रमुख डिन सी. लोगान ने कहा कि अदालत के फैसले से मतदाताओं को हुलाक मतदान में बिना किसी बाधा के हिस्सेदारी का भरोसा मिला है।
इसी तरह इस महीने की शुरुआत में मतपत्र भेजे जा चुके नॉर्थ कैरोलाइना के अटॉर्नी जनरल जेफ जैक्सन ने कहा, ‘मतदान प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। चुनाव के बीच नियम नहीं बदले जाने चाहिए।’
यूटाह जैसे राज्यों के रिपब्लिकन अधिकारियों ने भी कहा कि फैसले ने चुनाव प्रक्रिया को सरल बनाया है। यूटाह में केवल हुलाक मतदान होता है, और यदि ट्रम्प का नियम लागू होता तो मतदान के तरीके में बदलाव करना पड़ता।
ट्रम्प का प्रयास और आगे की चुनौतियां
अदालत के फैसले से ट्रम्प को बड़ा झटका लगा है, लेकिन चुनाव प्रक्रिया पर नियंत्रण की उनकी कोशिशें खत्म नहीं हुईं हैं।
हुलाक मतदान की जांच संघीय सरकार को राज्य-चालित चुनावों पर अधिक नियंत्रण देने की व्यापक योजना का हिस्सा है।
आलोचक कहते हैं कि ट्रम्प बार-बार हुलाक मतदान को असुरक्षित और धोखाधड़ी पूर्ण बताकर भ्रम फैला रहे हैं, जबकि वह खुद 2024 के चुनाव में भी हुलाक मतदान करना चाहते हैं।
अगर यह नियम लागू होता तो खासकर डेमोक्रेट समर्थक राज्यों के हजारों मतदाता मतदान से वंचित हो सकते थे।
(न्यूयॉर्क टाइम्स और अलजजीरा के सहयोग से)





