
समाचार सारांश
सम्पादकीय समीक्षा किया गया।
- नेपाल सन् २०२६ नवम्बर से विकासशील देश की श्रेणी से विकासोन्मुख देश के स्तर पर उभरा है, जबकि ५५ वर्ष से अधिक समय तक यह विकासशील देशों में ही रहा।
- हालांकि नेपाल ने २०१३ साल से योजनाबद्ध विकास शुरू किया, पर आर्थिक विकास की गति अब भी धीमी है और निर्यात व्यापार कमजोर बना हुआ है।
- नेपाल सरकार द्वारा गठित उच्चस्तरीय आर्थिक सुधार सुझाव आयोग द्वारा प्रस्तुत ‘रिफॉर्म २.०’ योजना को कार्यान्वित करते हुए अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाना अति आवश्यक है।
नेपाल विश्व के अत्यंत विकसित देशों की सूची में आता है और सन् २०२६ के नवम्बर से यह विकासोन्मुख देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है। लगभग ५५ वर्षों तक नेपाल विकासशील देशों की सूची में ही बना रहा, जो अब उसके लिए एक बड़ी उपलब्धि है। नेपाल ने सात दशकों से योजनाबद्ध विकास प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। नेपाल के समान विकास प्रक्रिया शुरू करने वाले कई देश आज समृद्ध और मजबूत बन चुके हैं, लेकिन नेपाल की आर्थिक विकास गति आज भी पर्याप्त नहीं है। विकास की राह में नेपाल ने कई प्रयोग, नीतियों और व्यवस्थाओं को अपनाया, फिर भी विकास का स्तर संतोषजनक नहीं हो पाया।
२०१३ साल से योजनाबद्ध विकास की शुरुआत हुई। २०४० दशक के बाद आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू हुआ। इस दौरान राजनीतिक परिवर्तनों का भी दौर रहा। राजतंत्र से संघीय गणतंत्र की स्थापना हुई, विदेशी निवेश खुला, निजी क्षेत्र को प्राथमिकता मिली और नीति निर्माण के प्रयास भी हुए।
विभिन्न राजनीतिक नेतृत्वों और प्रतिबद्धताओं के होते हुए भी नेपाल की विकास दर अत्यंत धीमी रही। वर्तमान में नेपाल की निर्यात व्यापार कमजोर है, आयात पर अत्यधिक निर्भरता है, व्यापार घाटा अधिक है, उत्पादकता कम है, उत्पादन उद्योग कमजोर हैं, युवा तेजी से विदेश पलायन कर रहे हैं, संस्थागत क्षमता कमजोर है, भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता कम है, विदेशी निवेश कम है, निजी क्षेत्र का मनोबल गिर रहा है, नीतिगत स्थिरता कमजोर है, कृषि क्षेत्र का आधुनिकीकरण नहीं हो पाया है, नीतियों में अस्थिरता और पारदर्शिता का अभाव है। राजनीतिक अस्थिरता और दूरदर्शी नेतृत्व के अभाव के कारण नेपाल अभी भी तीसरी दुनिया के वर्ग में ही है।
पूर्वी और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों ने अपनी प्रति व्यक्ति आय डबल करने में १० से १५ वर्ष लगाए, जबकि नेपाल इस लक्ष्य को ३० वर्षों में भी हासिल नहीं कर पाया। पिछले २५ वर्षों में नेपाल की औसत आर्थिक वृद्धि लक्ष्य ५.७ प्रतिशत थी, किन्तु वास्तविक प्राप्ति केवल ३.४ प्रतिशत है। नेपाल सन् २०१९ से निम्न मध्य आय राष्ट्र के दर्जे में है, जो आर्थिक उन्नति की बड़ी उपलब्धि है।
करीब ३० वर्ष पहले नेपाल की गरीबी, स्वास्थ्य और शिक्षा के सूचकांक न्यूनतम स्तर पर थे, लेकिन तब से नेपाल ने इनमें उल्लेखनीय सुधार किया है। नेपाल ने समावेशी और सतत विकास की अवधारणा अपनाई, हालांकि संरचनात्मक चुनौतियां अभी भी बनी हैं जिनका समाधान हुए बिना स्थायी आर्थिक विकास संभव नहीं।
पूर्व और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों ने प्रति व्यक्ति आय डबल करने में केवल १० से १५ वर्ष लगाए, जबकि नेपाल इसे ३० वर्ष में भी पूरा नहीं कर सका।
नेपाल की अर्थव्यवस्था में उत्पादनमूलक उद्योगों का योगदान कम है, और कुल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग २५ प्रतिशत हिस्सा रेमिटेंस से आता है। रेमिटेंस पर अत्यधिक निर्भरता, श्रम शक्ति का पलायन, राजनीतिक जोखिम, कृषि से गैर-कृषि क्षेत्र में रूपांतरण की धीमी गति, ये नेपाल की आर्थिक चुनौतियाँ हैं।
आर्थिक रूपांतरण में सिंगापुर को ३० वर्ष, दक्षिण कोरिया को ४० वर्ष, मलेशिया को ३० वर्ष, जापान को २० वर्ष और चीन को ४० वर्ष लगे। इतने कम समय में इन देशों ने आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण सफलता पाई, जबकि नेपाल की स्थिति अभी भी संतोषजनक नहीं है। ४०-५० वर्ष पहले समान आर्थिक स्थिति वाले देशों से नेपाल आज तुलना में कई गुना पिछड़ गया है, और वे देश अब नेपाल से आर्थिक सहायता भी देने लगे हैं।
चीन आज विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और ‘विश्व की उत्पादन शक्ति गृह’ कहलाता है। दक्षिण कोरिया ११वां विश्व और चौथा एशियाई सबसे बड़ा अर्थव्यवस्था है जिसने ४० वर्ष में आर्थिक चमत्कार करते हुए आधुनिक औद्योगिक शक्ति का दर्जा प्राप्त किया। १९६३ तक विकासोन्मुख राष्ट्र था, लेकिन अब विश्व बैंक का प्रमुख विकास साझेदार है।
सिंगापुर उच्च विकसित देशों की सूची में बनकर ‘चार एशियाई बाघों’ में से एक बन गया है। उच्च बेरोजगारी, न्यून पूर्वाधार और अनिश्चित भविष्य के बावजूद ३० वर्षों में चुनौतीओं को पार करते हुए तीसरी दुनिया से पहले दुनिया में बदला। इसका विकास मॉडल समस्त विश्व के लिए आदर्श है।
आंतरिक संघर्ष और आर्थिक बाधाओं के बीच मलेशिया ने लगभग ३० वर्षों में आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था स्थापित कर ली। मलेशिया के दूरदर्शी नेतृत्व और संघर्ष प्रबंधन मॉडल अन्य देशों के लिए अनुकरणीय हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान की अर्थव्यवस्था विश्व में उदाहरण बन गई। यह पहला गैर-यूरोपीय आधुनिक शक्तिशाली राष्ट्र बना, और जापानी आर्थिक चमत्कार के नाम से जाना जाता है।
जापान, सिंगापुर, मलेशिया, दक्षिण कोरिया और चीन ने नीतिगत सुधारों के साथ संरचनात्मक चुनौतियों का समय पर समाधान कर विकास के मॉडल बनाए, इसलिए वे आर्थिक रूप से आगे बढ़े। नेपाल अभी भी अपनी संरचनात्मक समस्याओं से जूझ रहा है। नेपाल उपयुक्त नेतृत्व और दक्ष कर्मी व्यवस्था विकसित नहीं कर सका, उत्पादनमुखी विकास में कमजोर रहा। चीन की तरह श्रम शक्ति का बेहतर उपयोग नहीं कर पाया, निर्यात व तकनीक में चीनी मॉडल अपनाया नहीं।
चीन की डिजिटल क्रांति, डुअल ट्रैक सुधार रणनीति और तीव्र अवसंरचना विकास को नेपाल सिर्फ़ देखता रहा। नेपाल ने दक्षिण कोरिया की तरह अनुसंधान व विकास में निवेश नहीं किया, मानव पूंजी विकास आवश्यक रूप से नहीं किया। पश्चिमी मॉडल के आधार पर तकनीकी नीति भी नहीं बना पाया, पञ्चवर्षीय योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं कर सका। कोरिया की तरह निर्यात केंद्रित औद्योगीकरण बना न पाया।
कुल मिलाकर, ‘मिराकल ऑन द हान रिवर’ से नेपाल ने कुछ नहीं सीखा। विडंबना यह है कि आज भी हजारों नेपाली श्रमिक हर वर्ष रोजगार हेतु दक्षिण कोरिया जाते हैं। मलेशिया जैसा कुशल संघर्ष समाधान नेपाल में सफल न हो सका, राष्ट्रीय एकता वैसी मजबूत नहीं हो सकी। मलेशिया की तरह नीति बनाने और लागू करने में भी नेपाल विफल रहा।
मलेशिया ने विभिन्न सरकारों के बीच आर्थिक नीतियों की निरंतरता बनाए रखी, जबकि नेपाल में सरकार बदलते ही राजनीतिक और आर्थिक नीतियाँ लगातार बदल रही हैं। मलेशिया जैसे सार्वजनिक सेवा सुधार नेपाल में न हो पाए। जापान की नीति अपनाकर उद्योग विस्तार और तकनीकी विकास में सरकार की भूमिका निभाने में नेपाल विफल रहा। गुणवत्ता नियंत्रण और निरंतर सुधार के द्वारा अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में सुधार नहीं कर पाया।
जापान ने विदेशी सहयोग का सदुपयोग किया, जबकि नेपाल ने सहायता का दुरुपयोग बढ़ाया। जापान ने पश्चिमी वैज्ञानिक, दार्शनिक, तकनीकी और राजनीतिक विचारों का उचित उपयोग करते हुए तेज आर्थिक विकास किया, जबकि नेपाल ऐसा करने में विफल रहा। इसलिए जापान का विकास मॉडल ‘ईस्ट एशियन मॉडल’ के रूप में जाना जाता है, और नेपाल केवल इसका दर्शक बना हुआ है।
नेपाल सरकार द्वारा गठित ‘उच्चस्तरीय आर्थिक सुधार सुझाव आयोग २०८१’ ने देश के आर्थिक और संरचनात्मक सुधार हेतु विस्तृत रोडमैप ‘रिफॉर्म २.०’ योजना बनाई। इसमें कर प्रणाली सुधार, व्यापार और निवेश वातावरण सुधार, निजी क्षेत्र के भूमिका और मनोबल वृद्धि, सार्वजनिक वित्त व्यवस्था में पारदर्शिता और दक्षता, अवसंरचना और ऊर्जा क्षेत्र विकास, वित्तीय प्रणाली मजबूती और सार्वजनिक सेवा सुधार शामिल हैं।
इस सुधार योजना को जल्द लागू करते हुए आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक संरचनाओं में आवश्यक परिवर्तन कर नेपाल की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़, आधुनिक, प्रतिस्पर्धी एवं व्यवसायिक बनाकर सतत आर्थिक प्रगति हासिल करनी होगी। नेपाल को अपनी ‘रिफॉर्म रणनीति’ स्वयं तैयार कर लागू करनी होगी। पहले नीति सुधारों को लागू करते हुए कार्यान्वयन सक्षमता बढ़ानी होगी, सुधारों को क्रमिक और नीति नियमों में समानता लानी होगी।
भ्रष्टाचार से पीड़ित शासन व्यवस्था के खिलाफ कड़ाई से शून्य सहनशीलता नीति लागू करनी होगी। जिम्मेदारी और जवाबदेही निभाने वाली, देश के विकास के प्रति समर्पित, स्वच्छ, दक्ष और निष्पक्ष कर्मचारी व्यवस्था ही संरचनात्मक सुधार की आधारशिला है। ये कदम लिए बिना नेपाल से दीर्घकालीन आर्थिक व सामाजिक विकास की आशा रखना जैसे ‘हवा में महल बनाना’ होगा।
(लेखक कँडेल नेपाल बैंक लिमिटेड के मुख्य प्रबंधक हैं।)





