
समाचार सारांश
- इजरायल, अमेरिका और इरान के बीच जारी युद्ध ने मध्य पूर्व के लगभग 20 लाख नेपाली नागरिकों की जान, संपत्ति और रोजगार पर गंभीर खतरा उत्पन्न कर दिया है।
- नेपाल में इस युद्ध के कारण गैस, पेट्रोल और डीजल की कमी एवं मूल्यवृद्धि हो रही है, जिससे समग्र मूल्यस्तर में वृद्धि हुई है।
- युद्ध के असर से रेमिटेंस में कमी आने की आशंका बढ़ गई है और विदेशी मुद्रा संचय भी कमजोर होने का खतरा है।
९ चैत्र, काठमांडू । इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध का शीघ्र अंत दिख नहीं रहा है। दोनों पक्ष सैन्य क्षेत्रों के साथ-साथ गैरसैनिक क्षेत्रों में भी आक्रमण बढ़ा रहे हैं, विशेषकर ईंधन उत्खनन और प्रसंस्करण केंद्रों पर।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ४८ घंटे में स्ट्रेट ऑफ होरमज को खोलने के लिए चेतावनी दी थी, वरना ईरान के तेल संसाधनों पर हमला करेंगे, जो समय सीमा पहले ही समाप्त हो चुकी है। ईरान ने भी इसका जवाब देते हुए खाड़ी देशों के तेल संरचनाओं पर हमला करने की धमकी दी है।
दोनों पक्ष के तेल पूर्वाधार पर हमले से वैश्विक ऊर्जा संकट और गंभीर हो सकता है।
नेपाल न तो युद्ध में शामिल है और न ही सीधे हमले का शिकार है, लेकिन यह युद्ध दुनिया के कई अन्य देशों की तरह नेपाल के लिए भी गंभीर प्रभाव डाल रहा है।
नेपाल में इस युद्ध के प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष प्रभाव दिखाई देने लगे हैं।
अब आइए देखें यह युद्ध नेपाल को किस प्रकार प्रभावित कर रहा है।
१. पश्चिम एशिया में नेपाली जीवन, संपत्ति और रोजगार पर खतरा
मध्य पूर्व के देश नेपाली मजदूरों के लिए प्रमुख गंतव्य हैं। विदेश मंत्रालय के अनुसार लगभग 20 लाख नेपाली वहां कार्यरत हैं। इनमे से यूएई में एक नेपाली की युद्ध के कारण मृत्यु हो चुकी है और 16 घायल हैं। ईरानी सेना ने एक नेपाली को हिरासत में लिया है। कुछ अन्य को गलत सूचना फैलाने के आरोप में देश के अधिकारियों ने गिरफ्तार किया है।
अब तक 81 हजार नेपाली नेपाल लौटने के लिए आवेदन कर चुके हैं। यदि युद्ध लंबा चलता है तो लाखों नेपालीों को सुरक्षित वापस लाना पड़ सकता है, जिससे विदेशी रोजगार पर अस्थाई ठहराव आएगा क्योंकि लगभग आधे नेपाली खाड़ी देशों में काम करते हैं।
युद्ध के बाद पुनर्निर्माण काल में श्रमिकों की मांग में पुनः वृद्धि हो सकती है। सरकार के लिए यहां लौटे कामगारों का प्रबंधन चुनौतीपूर्ण होगा।
२. संकटग्रस्तों के उद्धार में कठिनाइयां
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार विश्व में लगभग 3.5 करोड़ प्रवासी मजदूर मध्य पूर्व में कार्यरत हैं। विकसित देशों ने अपने नागरिकों को वहां से वापस लौटा लिया है। भारत ने सवा दो लाख नागरिकों को लौटाया है।
नेपाल सरकार भी विभिन्न उपायों से अपने नागरिकों को वापसी के लिए तैयार कर रही है। वर्तमान में ट्रांजिट में फंसे लगभग 1,000 नेपाली वापस भेजे जा चुके हैं। आवश्यकता पड़ने पर समुद्री जहाज द्वारा भी वापसी की योजना है।
लेकिन एक साथ लाखों नेपालीों को वापस लाना सरकार की क्षमता से परे हो सकता है।
३. रेमिटेंस पर दबाव
नेपाल राष्ट्र बैंक के अनुसार नेपाल को मिलने वाली कुल रेमिटेंस का लगभग 41 प्रतिशत मध्य पूर्व के देशों से आता है। नेपाल रेमिटर्स एसोसिएशन के अनुसार औपचारिक और अनौपचारिक माध्यम से लगभग 50 प्रतिशत रेमिटेंस मध्य पूर्व से आता है।
यदि युद्ध बढ़ता है और नेपाली मजदूर रोजगार खो देते हैं तो रेमिटेंस में कमी आ सकती है, जो घरेलू आमदनी स्रोत को कमजोर करेगा। औसत परिवार आकार 4 के हिसाब से 80 लाख की आबादी प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होगी। रेमिटेंस में कमी से विदेशी मुद्रा भंडार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
४. ईंधन की कमी
पश्चिम एशिया में युद्ध लगभग तीन सप्ताह से जारी है, लेकिन नेपाल में खाना पकाने के लिए एलपी गैस की कमी दो महीनों से अधिक समय से है। नेपाल आयल निगम की कमज़ोरी और व्यापारियों की गलत नियत पहले से ही गैस की कमी का मुख्य कारण थी, जो युद्ध के बाद और गहरी हो गई है।
युद्ध से पेट्रोल और डीजल की कमी होने का खतरा बढ़ गया है। नेपाल पूरी तरह से भारत से ईंधन आयात पर निर्भर है, जो अपने कच्चे तेल का 55 प्रतिशत पश्चिम एशिया (सऊदी अरब, इराक, यूएई आदि) से आयात करता है।
नेपाल, भारत की कुल खपत का केवल 1 प्रतिशत इस्तेमाल करता है, लेकिन भारत में गैस की कमी होने पर इसका नेपाली बाजार पर प्रभाव पड़ेगा। फिलहाल आयल निगम ने भारत से ईंधन आपूर्ति में कोई कमी न होने का दावा किया है।
५. ईंधन की कीमतें और समग्र मूल्यवृद्धि
युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लगभग 70 डॉलर से बढ़कर 113 डॉलर हो गई है, जिससे नेपाल में भी तेल के दाम बढ़े हैं। आयल निगम ने १ चैत्र को पेट्रोल की कीमत प्रति लीटर 15 रुपये और डीजल की कीमत 10 रुपये बढ़ाई।
भारत से आयी मूल्य सूची के अनुसार पेट्रोल की कीमत में 31 रुपये, डीजल में 54 रुपये और गैस सिलेंडर की कीमत में 216 रुपये की वृद्धि होनी थी, लेकिन अभी कम वृद्धि हुई है, जो अप्रेल की शुरुआत में और बढ़ सकती है।
2022 में पेट्रोल की कीमत 199 रुपये तक पहुंची थी, इस बार इससे भी अधिक बढ़ने की संभावना है। तेल के दाम बढ़ने से व्यापारिक लागत, ढुलाई भाड़ा और उत्पादन लागत भी बढ़ती है, जिससे समग्र मूल्यवृद्धि होती है।
विश्लेषकों का मानना है कि ईंधन की कीमत बढ़ने से ढुलाई भाड़ा लगभग 40 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के नियम के अनुसार कच्चे तेल की कीमत प्रति बैरल 10 डॉलर की वार्षिक वृद्धि से मूल्यस्तर में 0.4 प्रतिशत वृद्धि होती है। अभी तेल की कीमत में 40 डॉलर से अधिक की वृद्धि हो चुकी है, जो कीमतें और बढ़ाएगी।
युद्ध के कारण अमेरिकी डॉलर की कीमत 150 रुपये से ऊपर जा चुकी है, जिससे आयातित वस्तुओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
६. विदेशी मुद्रा भंडार कमजोर होने का खतरा
नेपाल के पास वर्तमान में 22 अरब 76 करोड़ डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो 18 महीने तक के आयात के लिए पर्याप्त है। यह स्थिति अत्यंत मजबूत मानी जाती है, लेकिन इससे पहले का यह अभूतपूर्व स्तर प्रमुख रूप से रेमिटेंस की वजह से है। पिछले आर्थिक वर्ष में रेमिटेंस 17 खरब 23 अरब रुपैयाँ था।
यदि मध्य पूर्व से आने वाली आधी रेमिटेंस बंद हो जाती है तो नेपाल के विदेशी मुद्रा भंडार में बड़ा घातक असर हो सकता है। नेपाल ने 7 महीने के आयात को कवर करने वाले मुद्रा भंडार का लक्ष्य रखा है, अत: फिलहाल विदेशी मुद्रा संकट के आसार कम हैं, लेकिन मुद्रा भंडार को मजबूत बनाए रखने की आवश्यकता है।
७. रासायनिक उर्वरक की कमी
रासायनिक उर्वरक बनाने की प्रक्रिया में प्राकृतिक गैस आवश्यक होती है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति बाधित होने से यूरिया सहित उर्वरक की कमी बढ़ रही है और मूल्य 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ गया है।
कृषि मंत्रालय के अनुसार नेपाल में १५ असार तक पर्याप्त उर्वरक उपलब्ध है, इसके बाद की आपूर्ति के लिए टेंडर जारी किया गया है। इस स्थिति में धान लगाने के समय उर्वरक की कमी और मूल्य वृद्धि की संभावना अधिक है।
युद्ध के कारण प्लास्टिक के कच्चे माल की कमी भी बढ़ी है। तेल प्रसंस्करण में आवश्यक कच्चा पदार्थ सीमित होने से प्लास्टिक उत्पादों की उत्पादन क्षमता घट रही है।
इस कारण पानी की बोतलें, जार, पाइप जैसे प्लास्टिक उत्पाद बनाने वाले उद्योग संकट में हैं। कुछ उद्योग कच्चे माल की कमी के कारण बंद हो चुके हैं। यदि यह स्थिति जारी रही तो अन्य उद्योग भी भयंकर संकट में आ सकते हैं।
पाइप उद्योग के बंद होने से जल आपूर्ति पूर्वाधार प्रभावित होगा। प्लास्टिक के जार, बोतलें, बिर्को निर्माण में भी संकट बढ़ा है, जिससे इन उद्योगों में कार्यरत नेपाली श्रमिकों की नौकरियों पर असर पड़ेगा। शुद्ध जल की आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है।
आगे क्या?
नेपाल एक शांतिप्रिय और गैर-संलग्न विदेश नीति अपनाने वाला देश है। हम युद्ध में संलग्न नहीं हैं और न ही युद्ध का लक्ष्य हैं। यह संघर्ष हजारों किलोमीटर दूर है, लेकिन लाखों नेपाली जो विदेशी रोज़गार करते हैं, रेमिटेंस भेजते हैं और तेल आपूर्ति करने वाले देशों में रहते हैं, इस कारण इसका प्रभाव नेपाल पर पड़ा है।
विशेषकर विदेशी रोजगार और रेमिटेंस पर अत्यधिक निर्भर नेपाल के लिए यह संघर्ष बड़ा आर्थिक एवं कूटनीतिक परिवर्तन लाने की आवश्यकता को दर्शाता है।





