
समाचार सारांश दैलेख की सुकी बडुवाल अपने पति के घरेलू हिंसा से पीड़ित होकर अपने बच्चों सहित कर्णाली नदी में कूद गई थीं, और उनके पति को डेढ़ साल कैद की सजा सुनाई गई है। सुर्खेत की माया कठायत ने भी अपने पति की चरम यातना से तंग आकर अपने तीन बच्चों सहित भेरी नदी में कूद कर आत्महत्या का प्रयास किया, जिस पर आत्महत्या उकसाने का मामला दर्ज हुआ है। कर्णाली प्रदेश में पिछले पाँच वर्षों में १,३७५ आत्महत्याओं में से ३७२ मामले पारिवारिक कलह और घरेलू हिंसा के कारण हुए हैं, यह आंकड़ा प्रदेश पुलिस कार्यालय ने प्रस्तुत किया है। ९ चैत्र, सुर्खेत। २३ फागुन २०७७ को विश्वभर श्रमिक महिला दिवस मनाया जा रहा था। महिलाओँ पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ़ एक अभियान चल रहा था, इसी बीच दैलेख की सुकी बडुवाल (३५) अपने चार बच्चों के साथ अचानक घर से निकलीं। उनके पति घर में शराब पी रहे थे। सुकी करीब डेढ़ घंटे की यात्रा कर बच्चों के साथ जाक्सी पहुँचीं, जहाँ उनका रिश्तेदार रहता था। लेकिन वहाँ न गए बिना वे शाम को सीधे कर्णाली नदी किनारे चली गईं। पुलिस के अनुसार, उन्होंने अपनी दो बेटियों के हाथ एक डोरी से बांध कर नदी में पहुंचाया। इसके बाद बेटे, सबसे छोटे बच्चे और अपने आपको भी एक ही डोरी से बांध कर कर्णाली नदी में कूद गईं। पुलिस जांच में पता चला कि सुकी पूरी तैयारी के साथ कर्णाली नदी में कूदी थीं और जब वे मरने को तैयार थीं, तभी अपने पति के छोरों को तकलीफ देने के डर से अपने बच्चों को भी साथ ले गई थीं। सुकी और उनके बच्चों के कर्णाली नदी में जाने की खबर ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में हलचल मचा दी। सभी के मन में यही सवाल उठा- ‘सुकी ने अपने पाले हुए बच्चों को क्यों अपने साथ कर्नाली नदी में छोड़ने या साथ जाने के लिए मजबूर किया?’ पुलिस का निष्कर्ष है कि पति के अत्याचार के कारण उन्होंने सामूहिक मृत्यु का रास्ता चुना। इसके बाद सुकी के भाई बजिरबहादुर थापा ने अपने भानजे मानसिंह बडुवाल (४३) के खिलाफ आत्महत्या उकसाने का मुकदमा दर्ज कराया। उन्होंने जिला पुलिस कार्यालय दैलेख में जान से संबंधित मामला दर्ज कराया। मामले के दर्ज होने के एक साल बाद, १६ फागुन २०७८ को दैलेख जिला अदालत ने मानसिंह को डेढ़ साल कैद और १५ हजार रुपये जुर्माना सुनाया। न्यायाधीश दण्डपाणि लामिछाने की अदालत ने मुलुकी अपराध संहिता ऐन २०७४ की धारा १८५ उपधारा (२) के तहत यह सजा दी।
सुकी की ही नियति सहली माया
सुकी की घटना के ठीक पांच साल बाद, सुर्खेत की एक महिला ने अपने बच्चों सहित भेरी नदी में कूद कर जीवन समाप्त करने का प्रयास किया, जिसने समाज और मीडिया में फिर से तहलका मचा दिया। १ चैत्र २०८२ को गुर्भाकोट–१२ पिप्ले की ३८ वर्षीय माया कठायत ने अपनी ११ वर्ष की बेटी और ५ वर्षीय बेटे के साथ भेरी नदी में छलांग लगाई। यह घटना समाज और मीडिया में बड़ा विषय बनी। माया ने २९ फागुन को घर छोड़कर अपने बच्चों के साथ मायके पहुंची थीं। गुर्भाकोट–१२ में अपने छोटे पिता के घर वह अपने बच्चों दीपक और आशा सहित ठहरी थीं। करीब चार साल बाद माया अपने छोटे पिता के यहाँ आईं और बताया कि वे नशे की बीमारी से पीड़ित हैं और नेपालगंज में उपचार करा रही हैं। लेकिन मायके पहुंचने के उसी रात माया के पति भूपेन्द्र कठायत ने माया को थप्पड़ मारे। माया के छोटे पिता अमरदेव गिरी के अनुसार, “मेरी बेटी नेपालगंज से नहीं, बल्कि पति के अत्याचार सह न पाने की वजह से आई थी। जेठ कुटी करते हुए बेटी ने अपने ऊपर हुए अत्याचार के किस्से बताए।”
दिल टूटने की दहलीज पर
दसैं से पहले तक माया और भूपेन्द्र के संबंध ठीक थे। भूपेन्द्र भारत में मजदूरी करते थे और त्योहारी अवसरों पर घर आते थे। माया घर-परिवार का पूरा प्रबंध संभालती थीं। पिछले दशैं में भूपेन्द्र ने भारत न जाने और गांव में ऑटो रिक्शा चलाने का निर्णय लिया था। लेकिन एक-दो महीने बाद उनके व्यवहार में बदलाव आया। वे शराब और नशे के आदी हो गए। रात को १२ से १ बजे घर आते और माया के सामने घंटों अन्य महिलाओं से वीडियो कॉल करते। माया के सवाल करने पर वे मारपीट करते। तीन महीने पहले सिर पर लगी चोट अभी तक दर्द देती थी, जो माया ने परिवार को बताया था। घर में छुरी रखी होती और रोज के धमकी मिलती थी। नंगा कर अपमानित किया जाता और दो-तीन दिन के अंतराल से मारपीट होती। दो रात मायके में आश्रय पाने के बाद, माया ने पति के घर जाने के बजाय अपने बच्चों सहित भेरी नदी में कूदने का निर्णय लिया। माया के पिता अमरदेव गिरी और भाई ने आत्महत्या उकसाने का मामला दर्ज कराया है। शिकायत में बताया गया है कि पति की चरम यातना के कारण माया ने अपने बच्चों को लेकर नदी में छलांग लगाई। पिता ने आरोप लगाया है कि पति शराब के नशे में पत्नी और बच्चों को प्रताड़ित करता था, जिसके कारण माया को ऐसी अंतिम कदम उठाना पड़ा।
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पति की चरम यातना, समाज की अपमान और बच्चों के प्रति जिम्मेदारी के अभाव में, यदि विकल्प होते तो सुकी और माया आज अपने परिवार के साथ शांतिपूर्ण जीवन बितातीं। पति के अत्याचार और असहाय मायके के कारण ये दो महिलाओं ने कर्णाली और भेरी नदी में छलांग लगाई, पर उनकी ये कहानियाँ किसी फिल्म से कम नहीं। माया कठायत के मामले में जीवन जीने का कोई विकल्प न होने के कारण उन्होंने अपने बच्चों के साथ नदी में छलांग लगाई। सुकी ने भी अपने चार बच्चों के साथ अपना जीवन समाप्त किया, जिन्हें उन्होंने रजिस और पसिनों से पाला था। इस तरह की घटनाओं में राज्य, पड़ोसी और परिवार आमतौर पर मौन रहते हैं। जब पति अत्याचार करता है, तो परिवार और पड़ोस वाले यह कहते हुए चुप रहते हैं कि ‘यह पति- पत्नी का निजी मामला है’ और मायके भी चुप्पी साधे रहते हैं। माया कठायत के गांव में भी इस मुद्दे पर लोग बोलने को तैयार नहीं थे। जब एक महिला बोलना चाही तो पति ने कहा, ‘दूसरों की बात छोड़, तुम्हें क्या मतलब?’ ऐसा प्रयास किया। नदी के किनारे बच्चों सहित पहुँचने वाली माताओं के वापस लौटने या भेरी-कर्णाली की धाराओं के साथ मिल जाने के कोई आंकड़े नहीं हैं। घरेलू हिंसा और अपमान की पीड़ा लिए जीवन आसानी से नहीं बिताया जा सकता।
यौन अधिकार कार्यकर्ता रचना सुनार कहती हैं, “निर्धारित उपाय न होने पर महिलाएं मृत्यु के अलावा और क्या सोचेंगी? माया और सुकी की स्थिति भी ऐसी ही थी। जब कोई विकल्प नजर नहीं आता, तो अंतिम विकल्प केवल मौत ही दिखाई देती है।” जब माताएँ नदी में छलांग लगाती हैं, तब अभियान शुरू होता है, मगर कारणों को समझने या समाधान करने की कोई रुचि नहीं होती। नदी की लहरों से अधिक गहरा चोट समाज की पीड़ा करती है। “माँ-बहनें अपने बच्चों को लेकर नदी किनारे नहीं पहुँचतीं, परिवार और समाज का व्यवहार उन्हें वहाँ पहुंचा देता है। मृत्युपरांत ही नहीं, कारणों का भी समीक्षा करने का समय आ गया है। ऐसी घटनाएँ दोहराई न जाएँ।”
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सुकी और माया जैसे मामलों में महिलाएं अत्यधिक घरेलू हिंसा के चलते मानसिक रूप से विचलित होकर सामूहिक मृत्यु को चुनती हैं, मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. सुशील समदर्शी बताते हैं। “जब मनोवैज्ञानिक विकार होता है तो व्यक्ति अपने साथ मूल्यवान वस्तुओं को ले जाना चाहता है। चरम घरेलू हिंसा भी ऐसी ही सोच उत्पन्न करती है,” डॉ. समदर्शी ने कहा। ऐसे लोगों में कभी-कभी पहले दूसरों को चोट पहुंचाकर बाद में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति भी देखी जाती है। डॉ. समदर्शी के अनुसार, दो साल पहले दैलेख में एक घटना हुई थी, जहां एक व्यक्ति ने अपने परिवार के सदस्यों की हत्या करने के बाद आत्महत्या करने की कोशिश की, जो असफल रही और वह जेल में है। डॉ. समदर्शी कहते हैं, “माया को मायके जाने की बजाय भेरी नदी में कूदना आसान लगता था और यह आकस्मिक नहीं था। उसे इतनी अधिक यातना मिली कि इसे सहने की हिम्मत नहीं बची।”
पिछले पांच वर्षों में कर्णाली प्रदेश में १,३७५ आत्महत्याओं में से ३७२ घटनाएँ पारिवारिक कलह और घरेलू हिंसाओं के कारण हुई हैं। प्रदेश पुलिस कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार, सन २०७८ से २०८२/८३ तक ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं। २०७८ से प्रदेश में ८५२ बलात्कार की घटनाएँ और ८ बलात्कार के बाद हत्या के मामले सामने आए हैं। शराब, नशा और घरेलू हिंसा की घटनाएं कर्णाली में तेजी से बढ़ रही हैं।
मनोवैज्ञानिक कारणों पर डॉ. नवराज केसी द्वारा लिखित पुस्तक ‘स्वस्पर्श’ के ‘सानी नानी’ अध्याय में ऐसी घटनाओं के मनोवैज्ञानिक कारण बताए गए हैं। इसमें मार्टिन सेलिगमैन के १९६७ के शोध का वर्णन है। उन्होंने पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय के प्रयोगशाला में कुछ कुत्तों को एक बॉक्स में रख कर विद्युत झटका दिया। पहली समूह के कुत्तों को पास के बटन दबाने पर झटका बंद करने की ट्रेनिंग दी गई थी। वे झटके से जल्दी बच गए। दूसरे समूह को बचने का कोई उपाय नहीं दिया गया। वे झटके से बचने की कोशिश करते लेकिन असफल रहे और अंततः हारे। यह शोध दिखाता है कि निरंतर दर्द के क्रम में जीवों के दर्द सहने की प्रवृत्तियाँ भिन्न होती हैं।
दूसरे चरण में दोनों समूहों को एक नए बॉक्स में रखा गया, जिसका आधा हिस्सा झटका वाला और आधा हिस्सा सुरक्षित था। पहले समूह के कुत्ते झटके के शुरुआत में ही सुरक्षित पक्ष की ओर भाग गए और खुद को बचाने की कोशिश की। लेकिन दूसरे समूह ने कोई प्रयास नहीं किया, वे झटके से ग्रस्त होकर वहीं गिर गए और असहाय हो गए। (पुस्तक: स्वस्पर्श का अंश लेखक की अनुमति से लिया गया है, पुस्तक के पृष्ठ १५१-१५३ से साभार।)
डा. केसी के अनुसार, लगातार पीड़ा शरीर में ‘स्ट्रेस हार्मोन’ पैदा करती है, जो मस्तिष्क के सकारात्मक सोचने वाले हिस्से को रोकता है और व्यक्ति को समस्या से बचने की कोशिश न करने के लिए प्रेरित करता है। जीवित जीवों में इसे ‘लर्न हेल्पलेसनेस’ कहा जाता है, जो मनुष्यों में भी पाया जाता है। सुकी और माया जैसी महिलाएं घरेलू हिंसाओं में फंसकर इसी मानसिक स्थिति से गुजरती हैं।





