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खाड़ी देशों ने इरान पर सीधे हमले क्यों नहीं किए?

इरान ने अमेरिका और इज़राइल पर हमले के जवाब में खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाते हुए हमले जारी रखे हैं। हालांकि, खाड़ी के देश प्रत्यक्ष हमले करने के बजाय अपनी रक्षा प्रणालियों को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं और कई मिसाइलें हवा में ही मार गिराईं गई हैं। क्षेत्रीय युद्ध के संभावित खतरे, आर्थिक स्थिरता, कूटनीतिक संयम और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए इन देशों ने इरान पर सीधे हमले से परहेज किया है, ऐसा विशेषज्ञों का मानना है। १० चैत्र, काठमांडू।

अमेरिका और इज़राइल द्वारा इरान पर हमले के बाद इरान ने भी खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। इरान के निशाने पर बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब, कतर, ओमान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे देश हैं। इन देशों के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थानों को निशाना बनाते हुए हवाई अड्डे, ऊर्जा बुनियादी संरचना, होटल और आवासीय क्षेत्रों को चोट पहुंचाने की खबरें मिली हैं। हाल ही में, इज़राइल ने इरान के साउथ पार्स नामक विश्व के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस क्षेत्र पर हमला किया था, जिसके जवाब में इरान ने कतर के रास लफान ऊर्जा केंद्र पर हमला कर व्यापक नुकसान पहुँचाया था।

खाड़ी देशों द्वारा इरान पर सीधे हमले से बचने के पीछे कई मुख्य रणनीतिक और राजनीतिक कारण हैं। क्षेत्रीय शांति और युद्ध की संभावनाओं, आर्थिक विकास योजनाओं की रक्षा, कूटनीतिक संयम और मध्यस्थता प्रयास तथा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की संवेदनशीलता ये वे प्रमुख कारण हैं जिनकी वजह से ये देश सीधे हमले से परहेज कर रहे हैं। यूएई के हवाई अड्डे पर भी इरान के हमले की खबरें आई हैं, लेकिन कई खाड़ी देश अपनी सेना के दम पर इरान पर सशस्त्र हमले के बजाय अपनी सुरक्षा प्रणालियों को मजबूत करने को प्राथमिकता दे रहे हैं।

इस समय संयुक्त अरब अमीरात समेत २२ देशों ने मिलकर एक संयुक्त बयान जारी किया है, जिसमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों पर हुए हमलों की कड़ी निंदा की गई है। लंदन स्थित किंग्स कॉलेज के अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के प्रोफेसर रॉब जाइस्ट पिनफोल्ड का कहना है कि हालांकि खाड़ी देश इरान के व्यवहार को ‘आतंकवादी गतिविधि’ के तौर पर निंदनीय मानते हैं, फिर भी वे संयम बरत रहे हैं ताकि अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक भविष्य और क्षेत्र के विनाश से बचा जा सके।