
समाचार सारांश
सम्पादकीय समीक्षा के बाद तैयार।
- इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य तनाव से अंतरराष्ट्रीय पेट्रोलियम आपूर्ति प्रभावित हो रही है जिससे नेपाल में ईंधन संकट गहराने का खतरा है।
- नेपाल में एलपी गैस की भंडारण क्षमता केवल एक सप्ताह के लिए है और पेट्रोलियम पदार्थ पाइपलाइन और टैंकर के माध्यम से आपूर्ति हो रहे हैं।
- आयल निगम घाटे को कम करने हेतु सरकार से कर छूट और मूल्य समायोजन की मांग कर रहा है तथा वाहन उपयोग पर जोरबिजोर प्रणाली लागू करने पर भी चर्चा चल रही है।
१० चैत, काठमांडू। इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य तनाव के तुरंत खत्म होने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं। युद्ध की प्रकृति बदलते हुए दोनों पक्ष सैन्य केंद्रों के अलावा गैरसैन्य क्षेत्रों को भी निशाना बना रहे हैं, जिनमें पेट्रोलियम उत्खनन क्षेत्र और रिफाइनरी प्रमुख रूप से प्रभावित हो रहे हैं।
इस लंबे संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पेट्रोलियम पदार्थ और गैस की आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो रही है और आने वाले दिनों में नेपाल को और भी गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है।
नेपाल में मासिक ४५ से ४६ हजार टन एलपी गैस की खपत होती है। हालांकि पर्याप्त भंडारण की कमी के कारण निगम की मौजूदा भंडारण क्षमता केवल एक सप्ताह की सेवा प्रदान कर सकती है।
इसी प्रकार, निगम के पास पेट्रोल के लिए १० दिन, डीजल के लिए १२ से १३ दिन और हवाई ईंधन के लिए १५ दिन का भंडारण सुविधा उपलब्ध है।
वर्तमान में गैस बुलेट ट्रकों के जरिए लाई जाती है और अधिकांश पेट्रोलियम पदार्थ मोतिहारी–अमलेखगंज पाइपलाइन से आयातित हो रहे हैं।
उद्योग, वाणिज्य तथा आपूर्ति मंत्रालय ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण पेट्रोलियम आपूर्ति में आई चुनौतियों पर नजदीकी नजर रखी हुई है और बाजार में तत्काल पैनिक स्थिति नहीं होने की सूचना दी है।
मंत्रालय के सह सचिव एवं प्रवक्ता नेत्रप्रसाद सुवेदी ने कहा कि ईंधन आपूर्ति पूर्णतः नियमित नहीं है लेकिन पाइपलाइन से निरंतर आपूर्ति आ रही है और कोई व्यापक अफरा-तफरी नहीं है, इसलिए सरकार फिलहाल ‘पर्खो और देखो’ रणनीति अपना रही है।
उनके अनुसार, पाइपलाइन के अलावा टैंकर से आपूर्ति के दौरान भारतीय पक्ष ने कुछ नियंत्रण लगाए हैं जिससे आपूर्ति में मामूली प्रभाव पड़ा है।
प्रवक्ता सुवेदी ने कहा, ‘पूर्णत: नियमित ईंधन आपूर्ति का दावा नहीं किया जा सकता। पाइपलाइन के अलावा अन्य परिवहन साधनों को पर्याप्त तेल उपलब्ध नहीं कराया गया है। भारत ने भी जल्दबाजी न करने का आग्रह किया है। आने वाली परिस्थिति मध्य पूर्व की युद्ध की निरंतरता या समाप्ति पर निर्भर करेगी।’
पिछली बैठक में आयल निगम ने आईओसी के पास तीन महीने का कच्चा तेल भंडारण बताया था। समस्या पाइपलाइन के बजाय टैंकर में देखी गई है।
‘अन्य परिवहन साधनों को आवश्यक तेल पर्याप्त मात्रा में नहीं दिया गया है। भारत में वितरण भी नियंत्रित तरीके से हो रहा है, जिससे असर पड़ा है,’ सुवेदी ने बताया।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़े हुए दामों के कारण आयल निगम भारी घाटा झेल रहा है। वर्तमान में प्रति माह दो बार आईओसी के मूल्य सूची के अनुसार नेपाल में मूल्य निर्धारण होता है।
भारत से प्राप्त ताजा मूल्य सूची में डीजल के दाम प्रति लीटर ५४ रुपए और पेट्रोल के दाम ३१ रुपए बढ़ाए गए थे। पर निगम ने उपभोक्ताओं पर पूरा भार न डालते हुए पेट्रोल के दाम मात्र १५ और डीजल के १० रुपए बढ़ाए हैं।
इस वृद्धि के बाद पेट्रोल का दाम प्रति लीटर १५७ से १७२ रुपए और डीजल १४२ से १५२ रुपए हो गया है। खाना पकाने के एलपी गैस सिलेंडर पर २१६ रुपए का घाटा होने के बावजूद निगम ने इसकी कीमत नहीं बढ़ाई है।
निगम के प्रवक्ता मनोज ठाकुर के अनुसार भारत से आए मूल्य वृद्धि के बावजूद कम बढ़ोतरी करने के कारण पिछले १५ दिनों में निगम को लगभग ३ अर्ब ९३ करोड़ रुपए का घाटा हुआ है।
उन्होंने बताया, ‘दशहरा, तिहार, छठ जैसे त्योहारों और हालिया चुनाव के समय भी आम जनता पर अतिरिक्त बोझ न पड़े इसलिए ऐतिहासिक रूप से तेल की कीमतें नहीं बढ़ाई गई थीं।’

ठाकुर ने कहा, ‘त्योहारों के समय और चुनाव के पहले कीमतें न बढ़ाई गईं तो लगभग १० करोड़ का घाटा हुआ, उसके बाद १५ दिनों में ४८ करोड़ का घाटा हुआ, पर जब एक बार में दाम बढ़े तो १५ दिनों में ही लगभग ४ अरब का घाटा हुआ।’
मध्य पूर्व में जारी युद्ध और रिफाइनरियों पर प्रभाव की वजह से कच्चे तेल की तुलना में परिष्कृत तेल की कीमतें दोगुनी हो गई हैं। उन्होंने कहा कि यह घाटा आने वाले मूल्य सूची में और बढ़ सकता है।
आयल निगम नियमित रूप से आईओसी को भुगतान कर रहा है, लेकिन वर्तमान स्थिति बनी रही तो निगम के लगभग साढ़े १९ अरब रुपए के कोष के डेढ़ से दो महीनों में समाप्त होने की संभावना है।
‘यदि आईओसी को समय पर भुगतान नहीं किया गया तो भारत से तेल आपूर्ति बंद हो सकती है और इसका बाजार पर प्रभाव पड़ेगा,’ प्रवक्ता ठाकुर ने कहा।
इस संकट से बचने के लिए निगम तीन तरह की रणनीति पर काम कर रहा है। तत्काल समाधान के लिए निगम मूल्य स्थिरीकरण कोष से पैसा निकालकर आईओसी को भुगतान कर रहा है, जो केवल डेढ़ महीने तक चलेगा।
कोष खत्म होने की आशंका के साथ निगम ने मंत्रालय से ‘बैकअप प्लान’ की मांग करके तेल खरीद के लिए धन कहां से और कैसे जुटाया जाए, इस पर चर्चा भी की है।
प्रवक्ता ठाकुर ने स्पष्ट किया कि यदि लाभ बांटा नहीं गया तो निगम इस घाटे को खुद वहन नहीं कर सकेगा।
उनके अनुसार सरकार को ईंधन पर कर छूट देनी चाहिए, निगम को खर्च कम करके कुछ घाटा सहन करना होगा और मूल्य समायोजन के जरिए उपभोक्ता को थोड़ा बोझ उठाना होगा।
‘जब तक ये तीनों पक्ष सहयोग करते हैं, तब तक उपभोक्ता के कंधे पर पूरा बोझ नहीं पड़ेगा और निगम संकट का सामना कर सकेगा,’ ठाकुर ने कहा।
जैसे-जैसे तेल और गैस की खपत बढ़ती है, निगम का घाटा भी बढ़ता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार की अस्थिरता और बढ़ते दामों के कारण श्रीलंका समेत कई देशों ने ईंधन खपत कम करने के लिए पहल की है।
इंधन की खपत कम करने के लिए सवारी साधनों में जोरबिजोर प्रणाली लागू करने जैसे विकल्प भी चर्चा में हैं, लेकिन अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है, मंत्रालय ने बताया।
नेपाल सरकार और आयल निगम के बीच ईंधन संकट कम करने के लिए विभिन्न उपायों पर बातचीत चल रही है, मंत्रालय के प्रवक्ता सुवेदी ने बताया।

सुवेदी ने कहा, ‘नेपाल में ऊर्जा पर जोर देने वाले मुद्दों पर चर्चा हुई है। वाहन में जोरबिजोर प्रणाली और इंडक्शन प्रचार आदि विकल्प सामने आए हैं, लेकिन अभी कोई निर्णय नहीं हुआ है।’
अभी बाजार में तेल की लंबी कतार नहीं है, इसलिए सरकार अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम देखकर आवश्यक निर्णय लेने की स्थिति में है।
‘चर्चा तो चल रही है लेकिन निर्णय लेने का समय अभी नहीं है। मानसिक रूप से हम थोड़े चिंतित हैं, इसलिए अफवाहें फैल रही हैं,’ सुवेदी ने स्पष्ट किया।
खाद्य एवं अन्य वस्तुओं के परिवहन पर सामान्य प्रभाव पड़ा है, लेकिन व्यापारी इसे बड़ी समस्या नहीं मानते।
श्रीलंका सरकार ने ईंधन बचाने के लिए चार दिवसीय कार्य सप्ताह लागू किया है और राष्ट्रीय ईंधन पास के जरिए कड़ी राशन प्रणाली लागू की है।
इसी तरह, पाकिस्तान, फिलीपींस, थाईलैंड, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे एशियाई देशों ने ऊर्जा संकट से निपटने के लिए विभिन्न उपाय अपनाए हैं।
नेपाल में भी ऐसे उपाय अपनाने की वरिष्ठ सरोकारवालों ने जरूरत बताई है।
पूर्व वाणिज्य सचिव पुरुषोत्तम ओझा ने पिछले अनुभव के आधार पर अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन उपाय सुझाए हैं।

ओझा ने २००८ में तेल के दाम १४७ डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने के दौरान आई संकट की याद दिलाते हुए कहा कि तत्काल घाटा प्रबंधन के लिए मूल्य स्थिरीकरण कोष उपयोगी है, पर यह स्थायी समाधान नहीं है।
तब भारत के साथ उच्च स्तरीय राजनीतिक प्रयासों से उधारो तेल उपलब्ध करवाने का अनुभव लेकर उन्होंने कहा कि अब भी ऐसे विकल्प खुले हैं।
साथ ही कर्मचारी संचय कोष और नागरिक लगन कोष से उधार लेकर ईंधन खरीदा जाता रहा है, जिसे बाद में सामान्य कीमत पर चुकाया जाता है।
ओझा ने सुझाव दिया कि सरकार को ईंधन आयात कम करना, खपत घटाना, सवारी साधनों में जोरबिजोर प्रणाली लागू करना, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना तथा सार्वजनिक परिवहन का प्रयोग बढ़ाना चाहिए।
अंत में उन्होंने आशा व्यक्त की कि अंतरराष्ट्रीय संघर्ष जल्द खत्म होगा, लेकिन युद्ध के कारण तेल पूर्वाधार को हुए नुकसान से आपूर्ति में समय लगेगा, इसलिए तत्काल विभिन्न विकल्पों पर चर्चा कर संकट कम करने की पहल करनी चाहिए।





