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संविधान पुनः ट्रैक पर लौटा

१२ चैत्र, काठमांडू। जेनजी आंदोलन के बाद तत्कालीन संसद से निर्वाचित सत्ता पलटने के कारण संवैधानिक प्रक्रिया से बाहर गया देश बुधवार से पुनः पुराने ट्रैक पर वापस आ गया है।

नव निर्वाचित सांसदों ने बुधवार शपथ ग्रहण की, जिसके बाद नई प्रतिनिधि सभा जनता से निर्वाचित होकर तैयार हो चुकी है। अब नेपाल के संविधान के अनुसार संसदीय व्यवस्था पुनः ट्रैक पर आगे बढ़ेगी।

शासकीय अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के खिलाफ भदौ २३ और २४ को युवा आंदोलन हुआ था, जिसके बाद तत्कालीन राजनीतिक दलों की सत्ता गिरी और देश लगभग शासकीय संकट में पहुँच गया।

उस विषम परिस्थिति में राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने भदौ २७ को पूर्वप्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार गठित की थी। अंतरिम सरकार की प्रधानमंत्री कार्की ने शपथ ग्रहण के बाद प्रतिनिधि सभा विघटन की सिफारिश की थी और राष्ट्रपति ने उस सिफारिश के अनुसार प्रतिनिधि सभा को विघटित कर दिया था।

संसद के बाहर पूर्वप्रधान न्यायाधीश को प्रधानमंत्री बनाने और प्रतिनिधि सभा को विघटित करने के निर्णय नेपाल के संविधान २०७२ की अवधारणा से बाहर थे। इन निर्णयों से टूटा हुआ संविधान अब पुनः ट्रैक पर लौट आया है।

कल नव गठित प्रतिनिधि सभा के सदस्य बालेन्द्र शाह संविधान के अनुसार नए प्रधानमंत्री बनेंगे। संविधान के धारा ७६(१) के अंतर्गत बहुमत वाले दल के संसदीय दल के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करने का प्रावधान है, जिसके अनुसार शाह प्रधानमंत्री बनेंगे।

वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पूर्वसांसद राधेश्याम अधिकारी ने कहा, ‘विशेष परिस्थितियों में चुनाव कराने के लिए सरकार बनाई गई थी। इस पर अदालत में सवाल उठे थे। अब चुनाव होने और नई प्रतिनिधि सभा बनने के बाद संविधान पुनः ट्रैक पर आ गया है।’

जेनजी आंदोलन बढ़ने के बाद २४ भदौ को तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस्तीफा दिया था। उसके बाद देश के सभी हिस्सों में आगजनी हुई और राज्यविहीनता की स्थिति पैदा हुई जिससे नागरिकों में भयावह परिस्थिति बन गई।

राजनीतिक दल आंदोलनकारी पक्ष से संवाद के लिए तैयार नहीं थे और संसद से नई सरकार बनने की संभावना भी नहीं दिख रही थी। लेकिन तत्कालीन प्रतिनिधि सभा से राजनीतिक समाधान निकालने की मांग दलों ने की थी।

आंदोलनकारी पक्षों ने तत्कालीन प्रतिनिधि सभा की वैधता पर सवाल उठाया जिससे समाधान का रास्ता बंद हो गया।

सरकार बनाने को लेकर संवैधानिक धाराओं में असमंजस के बावजूद राष्ट्रपति पौडेल ने संविधान के धारा ६१ (४) के तहत पूर्वप्रधान न्यायाधीश कार्की को अंतरिम सरकार का प्रधानमंत्री नियुक्त किया था।

नेपाल के संविधान २०७२ में संसद के बाहर के व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाने की अलग व्यवस्था न होने के कारण पूर्वप्रधान न्यायाधीश को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया था।

संवैधानिक विद् विपिन अधिकारी ने कहा, ‘महान चुनौतियों के बीच संविधान को संकट में डालकर भी स्वीकार्य सरकार बनी थी। उस सरकार ने चुनाव करवाए जिससे प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र ट्रैक पर वापस आया है। अब देश संविधान की सरल राह पर है।’

पूर्वप्रधान न्यायाधीश को प्रधानमंत्री बनाने और संसद विघटन के फैसले के खिलाफ तत्कालीन एमाले और कांग्रेस के सांसदों ने सर्वोच्च न्यायालय में रिट दायर की थी।

आदेश विचाराधीन रहते हुए फागुन २१ को चुनाव संपन्न हुआ और अब नई प्रतिनिधि सभा गठित हो चुकी है।

इस प्रकार पूर्व संवैधानिक और कानूनी प्रश्न स्वतः समाप्त होने का अनुमान संविधानविद् कर रहे हैं क्योंकि संक्रमणकालीन निर्णय जनमत से अनुमोदित हुए हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता अधिकारी के अनुसार, ‘संवैधानिक और कानूनी प्रश्नों का अंत हो गया है।’

जेनजी आंदोलन के बाद देश संवैधानिक संकट और दीर्घकालीन राजनीतिक संक्रमण में फंसने के जोखिम में था, लेकिन राजनीतिक दल और आंदोलनकारी पक्ष सुझबुझ से इसे संभालते हुए चुनाव की स्थिति बना पाए।

संवैधानिक विद् अधिकारी ने कहा, ‘लोकतंत्र संकट में था। चुनाव नहीं होते तो सरकार और संवैधानिक अस्पष्टता में फंस जाती।’

भदौ २३ और २४ के आंदोलन की मुख्य मांग शासकीय सुधार थी और अब वह जिम्मेदारी नई प्रतिनिधि सभा को मिली है। प्रतिनिधि सभा सरकार बनाना, कानून बनाना, कार्यपालिका की निगरानी और संतुलन में रखने का काम करेगी।

संवैधानिक विद् अधिकारी का मानना है कि प्रतिनिधि सभा को परिपक्वता के साथ काम करना आवश्यक है।

इस बार की प्रतिनिधि सभा पिछली बार की तरह सत्ता संघर्ष का केंद्र बनने की संभावना कम है क्योंकि एक दल रास्वपा ने लगभग दो तिहाई सीटें हासिल की हैं।

२७५ सदस्यीय संसद में रास्वपा के पास १८२ सीटें हैं जो एकल बहुमत है। २०४७ के बाद पहली बार कोई दल इतनी बड़ी बहुमत के साथ प्रतिनिधि सभा बना पाया है।

इससे वह आवश्यक कानून बना कर देश को आगे बढ़ा सकता है और कानून के माध्यम से कार्य में बाधा समाप्त कर सकता है।

हालांकि, कभी-कभी जनता का अत्यधिक विश्वास दंभ बना सकता है और कमजोर विपक्ष की निगरानी तथा सचेत आवाज कम होने का खतरा होता है। कांग्रेस और एमाले के पास क्रमशः केवल ३८ और २५ सीटें हैं।

इस प्रतिनिधि सभा में बड़े बदलाव हुए हैं। पुराने सक्रिय राजनीतिज्ञ लगभग एक दर्जन ही हैं और अधिकांश नए युवा सदस्य हैं।

अनुभव की कमी हो सकती है, इसलिए संसद संचालन करने वाले सचेत, समन्वयकारी और परिपक्व होने चाहिए, यह संविधानविद् अधिकारी का सुझाव है।

उनका कहना है, ‘संसद की समितियों को प्रभावी बनाने और सदन का सुसंगत संचालन सुनिश्चित करने के लिए उचित नेतृत्व आवश्यक है।’