
नेपाल में संविधान द्वारा स्थापित कानूनी अदालत और स्मार्टफोन द्वारा उद्भव डिजिटल अदालत, दोनों समानांतर अदालतें चल रही हैं। आज के समाज में ये दोनों अदालतें एक साथ संचालित हो रही हैं। एक संविधान द्वारा बनाए गए ‘कानूनी अदालत’ है, जो साक्ष्य चाहता है, दोनों पक्षों की बात सुनता है और समय लेकर न्याय देता है। दूसरी ओर, स्मार्टफोन से उत्पन्न ‘डिजिटल अदालत’ है, जो १० सेकंड का वीडियो देखती है, तुरंत फैसला सुनाती है और झटपट सजा घोषित कर देती है। हम आज इसी तरह की डिजिटल भीड़तंत्र के माध्यम से न्याय खोजने की स्थिति में हैं।
हाल ही में बिना अनुमति किसी का वीडियो बनाना और उसे सोशल मीडिया पर वायरल करने की प्रतियोगिता बढ़ी है। कुछ मामलों में यह सकारात्मक बदलाव भी लाया है ऐसा दावा किया जा सकता है। अस्पतालों में देरी, सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार और सत्ता में रहने वालों के घमंड को नागरिकों के छोटे कैमरे सीधे चुनौती दे रहे हैं। इस तरह कैमरा कभी-कभी ‘नागरिक की तीसरी आंख’ बन जाता है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब कैमरा न्याय की तराजू न बने, बल्कि भीड़ के हाथ में रखे गए पत्थर जैसा बन जाए।
दुनिया के कई हिस्सों में ऐसे वीडियो शासन व्यवस्था को हिला देने के उदाहरण मौजूद हैं। अमेरिका में २०२० में जॉर्ज फ्लॉयड के 44 वर्षीय गोरे पुलिसकर्मी द्वारा हत्या का मामला विश्व कभी नहीं भूल सकता। उस घटना का वीडियो एक नागरिक ने रिकॉर्ड किया जो सत्य का अचूक प्रमाण बन गया और व्यवस्थागत रंगभेद के खिलाफ वैश्विक चेतना जगाई। लेकिन २०१९ में कोविंगटन कैथोलिक हाई स्कूल के एक छोटे वीडियो के वायरल होने पर गलत व्याख्या हुई। अदालत ने बाद में उन किशोरों को निर्दोष ठहराया और मीडिया कंपनियों को जुर्माना लगाया।
नेपाल में संविधान २०७२ लागू है। यह संविधान हमें अभिव्यक्ति का अधिकार और स्वतंत्रता प्रदान करता है। मुलुकी अपराध संहिता २०७४ और गोपनीयता संबंधी अधिनियम २०७५ बिना अनुमति के किसी की तस्वीर लेना या सार्वजनिक करना दंडनीय अपराध माना गया है। लेकिन दुखद बात है कि कानून केवल पढ़ाई तक सीमित है और फैसले फेसबुक के कमेंट बॉक्स में होते हैं।
नागरिक का कर्तव्य हो सकता है कि वह साक्ष्य एकत्रित करे, परंतु उसे ‘डिजिटल अदालत’ में बदलकर न्याय का ढोंग करना अन्याय है। यदि कोई प्रमाण हैं तो संबंधित निकाय को सौंपें। फिर भी बिना अनुमति वीडियो वायरल कर सामाजिक लाभ-हानि की कसौटी पर न तौलें। अंत में खुद से पूछिए — हम किस तरह का समाज बना रहे हैं?





