केपी ओली और रमेश लेखक की गिरफ्तारी: न्यायालय ने हिरासत में रखने की दी मंजूरी

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काठमांडू जिला अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक को पांच दिन की हिरासत में जांच के लिए रखने की अनुमति दी है।
जेन जी आन्दोलन के संबंध में गठित आयोग की रिपोर्ट के आधार पर शनिवार को गिरफ्तार किए गए ओली और लेखक के पुलिस द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंट और हिरासत अवधि बढ़ाने की मांग की सुनवाई रविवार को काठमांडू जिला अदालत में हुई।
काठमांडू जिला अदालत के सूचना अधिकारी दीपक कुमार श्रेष्ठ ने बताया कि मुुलकी फौजदारी कार्यविधि संहिता २०७४ की धारा १४(६) के अनुसार पांच दिन हिरासत में रखने की अनुमति दी गई है। उन्होंने कहा, “प्रतिवादी केपी शर्मा ओली की तबीयत खराब होने के कारण उन्हें अस्पताल में उपचार हेतु रखा गया है और प्रभावी उपचार के लिए आदेश जारी किया गया है।”
शनिवार की गिरफ्तारी के बाद पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक को 10 दिनों की हिरासत में रखकर जांच करने की मांग पर जिला अदालत के न्यायाधीश आनंद श्रेष्ठ की अदालत में बहस हुई।
अधिकारियों के मुताबिक पूर्व गृह मंत्री लेखक को अदालत में पेश किया गया जबकि पूर्व प्रधानमंत्री ओली की हालत नाजुक होने पर त्रिभुवन विश्वविद्यालय शिक्षण अस्पताल में भर्ती कराया गया और उन्होंने वर्चुअल माध्यम से सुनवाई में हिस्सा लिया।
अदालत में ओली और लेखक के पक्ष में वकील द्वारा प्रस्तुत तीन तर्क
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बहस के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता रमेश बडाल ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री ओली के महान्यायाधिवक्ता होने के कारण विपक्षी पूर्वाग्रह रहित आरोप ही लगाया जा सकता है। उन्होंने रिहाई की बात कही।
बडाल ने कहा, “गौरी बहादुर कार्की आयोग की रिपोर्ट स्वयं में विवादास्पद है। रिपोर्ट में उल्लेख है कि प्रधानमंत्री और मंत्रियों ने कोई निर्देश नहीं दिया और हत्या की घटना में संलिप्तता नहीं है। लेकिन पुलिस और प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई में प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की अनजान होने की बात कहना उचित नहीं, जिससे गंभीर लापरवाही दिखती है।”
उन्होंने यह भी कहा कि इस आधार पर आपराधिक मामला दर्ज करना संभव नहीं है, “रिपोर्ट में लिखी बात से ही उनकी संलिप्तता नहीं दिखती और प्रथम दृष्टया कोई अपराध भी नहीं दिखता।”
उन्होंने कहा कि पक्षपाती तौर पर अभियोजन नहीं होना चाहिए और पहले भी अख्तियार दुरुपयोग जांच आयोग के मुखिया के निर्देश पर मामला दर्ज होने पर अदालत द्वारा खारिज करने के उदाहरण मौजूद हैं।
बडाल ने कहा, “मंत्रिपरिषद के निर्णय दो भागों में बाँटे गए थे, हथियार लिए सुरक्षा कर्मियों के लिए एक निर्णय और नहोनें वालों के लिए अलग निर्णय।”
वे कहते हैं, “सुरक्षा संगठन के सदस्यों ने आगे जांच का फैसला किया था लेकिन अन्य के लिए तत्काल कार्रवाई का फैसला सरकार ने लिया।”
दूसरी ओर, गृहमंत्री ने केवल दो हथियार न लेने वालों पर कार्रवाई का निर्णय लिया जो इसे पूरी तरह राजनीतिक प्रेरित निर्णय बनाता है। ऐसी स्थिति में मामला आगे नहीं बढ़ सकता।”
बडाल ने बताया कि अदालत में उन्होंने तर्क दिया कि ओली और लेखक के बचने की संभावना न होने के कारण हिरासत की आवश्यकता नहीं है।
इस बीच, पूर्व प्रधानमंत्री ओली की पत्नी राधिका शाक्य ने सर्वोच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण संबंधी याचिका दायर की है।
सर्वोच्च न्यायालय के सह-रजिस्टार अर्जुन प्रसाद कोईराला के अनुसार इस याचिका की सुनवाई कल होगी।
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सरकार के प्रवक्ता ने क्या कहा था?
पूर्व सरकार के प्रवक्ता एवं शिक्षा, विज्ञान एवं तकनीकी मंत्री सश्मित पोखरेल ने कहा कि सरकार ने राजनीतिक पूर्वाग्रह के बिना ही ओली और लेखक को गिरफ्तार किया है।
उन्होंने कहा, “हमारी पार्टी ने चुनाव के दौरान अपने घोषणा पत्र के दूसरे बिंदु में आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की थी। यह कोई नई बात नहीं है, यह निर्वाचित जनता का आदेश है।”
उन्होंने कहा कि आयोग की रिपोर्ट को वाचापत्र के अनुसार लागू किया जा रहा है और अदालत तथा पुलिस अपनी प्रक्रिया पूरी कर रही हैं। साथ ही किसी के खिलाफ बदले की भावना से कार्रवाई नहीं हो रही है।
इसके अलावा शनिवार को सरकार द्वारा प्रकाशित प्राथमिकता सूची के १०० बिंदुओं में भदौ २४ को हुई तोड़फोड़ और जनधन के नुकसान की जांच के लिए आयोग गठित करने की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की गई है।
विशेष रूप से कांग्रेस और एमाले समेत अन्य दल उस दिन सिंहदरबार और राष्ट्रपति कार्यालय में हुई आगजनी के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
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