
समाचार सारांश
संपादकीय समीक्षा की गई।
- राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेतृत्व में बनी सरकार के पास 182 विधायक हैं, जो लगभग दो-तिहाई बहुमत है और यह काम करने में कुछ आसानी दे सकता है।
- नेपाल की राजनीति में भ्रष्ट कर्मचारी तंत्र और गुटबंदी ने समृद्धि की यात्रा में बाधा डाली है।
- राजनीतिक दलों के भीतर लोकतंत्र को मजबूत करने और कर्मचारी तंत्र का पुनर्गठन आवश्यक है।
इस बार के प्रतिनिधि सभा चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को अभूतपूर्व जनसमर्थन मिला। 275 सीटों के लिए कराए गए चुनाव में रास्वपा के 182 उम्मीदवार विजयी हुए। “घंटी” के चिन्ह पर भी इतने बड़े पैमाने पर मतदान होना नेपाली राजनीतिक इतिहास में विशेष अपवाद तो नहीं है, लेकिन इस बार बहुत से लोगों ने इस एक ही चिन्ह को चुनते हुए अलग आशा व्यक्त की है।
पिछले सात दशकों में इस तरह की जनलहरें बार-बार हमारी स्मृति में ताजा हैं। इस बार मतदाताओं ने रास्वपा के पक्ष में इतने वोट इसलिए डाले क्योंकि वे पुराने दलों की अकर्मण्यता के खिलाफ नए पीढ़ी के विद्रोह को देखना चाहते थे। समुदाय हमेशा राजनीति में आगे बढ़ने वाले नेताओं और नेतृत्व से अपेक्षा रखता है। जो नेतृत्व नहीं करते, वे चुनाव में हारने के लिए बाध्य होते हैं, यह लोकतंत्र का नियम है। इस नियम की अवहेलना का आक्रोश नवयुवाओं में विद्रोह की शुरुआत बना और वैसा ही आक्रोश साझा करते हुए चुनाव में वोट दिया गया, जो परिणामस्वरूप सामने आया।
अब लगभग दो-तिहाई बहुमत वाली सरकार से सभी को अपेक्षा है कि वह क्या करेगी। हमारी सामाजिक संरचना विविधता लिए हुए है और इसकी अपेक्षाएं भी अलग-अलग हैं। इन अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए राजनीतिक संस्कार और दक्ष कर्मचारी तंत्र आवश्यक है। पुराने जमाने के नेतृत्व संस्कार, जो पहले जनम और संरक्षण में रहे, अब काम के नहीं। वे विकृतियां, दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और अनियमितताएं बैठकर सुशासन के नारे तो लगाए जा सकते हैं, लेकिन समाज में वास्तविक परिवर्तन नहीं आ पाएगा। यही नेपाली राजनीतिक रंगमंच की पीड़ा है।
दशकों से नेपाली राजनीति मुख्यतः वंशवाद और निरंकुश शासन के प्रतिनिधि, भ्रष्ट मध्यवर्ग, दलाल और बिचौलियों के नियंत्रण में रही है। इन पात्रों के राजनीतिक व्यवहार को समझे बिना नेपाल की राजनीति को समझना संभव नहीं। बिना समझ के राजनैतिक परिवर्तन की हिम्मत भी नहीं हो सकती।
चलिए शुरू करते हैं उन राजनीतिक नेतृत्व को जन्म देने वाली संरचनाओं से, जिन्होंने भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को संस्थागत बना दिया है। आज तक ज्यादातर नेपाली समाज अपने आफनाओं, चापलूसों, झूठी हरकतों और छल-कपट के जाल में फंसा हुआ है। यह सांस्कृतिक प्रवृत्ति समाज के सभी स्तरों और समूहों में व्याप्त है। छोटी या बड़ी, दिखाई देने वाली या छुपी हुई, यह समस्या सबसे जुड़ी है। दलों में भी यही संस्कार व्याप्त है और इसके परिणामस्वरूप दल नेताओं और कार्यकर्ताओं को ही प्रशिक्षित करने की प्रणाली चला रहे हैं। इसका अंत करना आवश्यक है और राजनीतिक संस्कार में सामाजिक नैतिकता लाना ज़रूरी है।
समृद्धि की यात्रा तब ही शुरू होगी जब सिंहदरबार के दक्षिण द्वार के नजदीक स्थित प्रशासनिक कर्मचारी ट्रेड यूनियन का कार्यालय बंद किया जा सके, नहीं तो यह केवल भाषणों तक सीमित रहेगा।
सिर्फ दल नहीं, गुटों और उपगुटों में बदलाव की दौड़ भी तेज है। सभी को समझना चाहिए कि गुट-पक्ष की राजनीतिक पार्टियां समाज का नेतृत्व नहीं कर सकतीं, वे तो केवल खोई हुई जमात हैं। नए दल और नेता ही नहीं, कार्यकर्ताओं को भी यह समझना ज़रूरी है क्योंकि गुटों के समर्थकों के आरोप नेता नहीं बल्कि कार्यकर्ता ही अपने लिए बनाते हैं। इसलिए दल के अंदर लोकतंत्र के बीज जल्द नहीं बोए गए तो समृद्धि का सपना टूट जाएगा।
इस समय राजनीति में मध्यम वर्ग काफी प्रभावशाली है। इस वर्ग के वृहत्त विकास से ही समग्र प्रगति के मापदंड में सुधार आएगा, फिर भी आम नागरिकों के जीवन में तुरंत बदलाव नहीं आएगा। यह हर स्तर पर देखा जा सकता है। मध्यवर्ग का बिचौलियापन सत्ता व्यवस्था का गहना है, जिसका रंग समय-समय पर बदलता रहता है। यह प्रायः राजनीतिक चापलूसिता में लिप्त बुद्धिजीवी वर्ग होता है, जो सत्ता का लाभ उठाने के लिए सक्रिय है और भ्रष्ट कर्मचारी तंत्र के साथ मिलकर अवैध कार्यों में संलग्न रहता है।
कम वेतन पाने वाले कनिष्ठ कर्मचारियों को अपनी ढाल बनाकर भ्रष्टाचार में शामिल कर्मचारी तंत्र के नेता राजनैतिक नेतृत्व को भ्रष्ट करते और इसका लाभ उठाते हैं। इस प्रकार की मुखियाई प्रवृत्ति को बढ़ावा देना कर्मचारी तंत्र द्वारा राजनीतिक नेतृत्व में दखल देने से संभव हुआ है। कर्मचारी तंत्र ने अपने हितों के लिए राजनीतिक नेतृत्वों पर दबाव बनाए रखा है।
पीड़ित कहते हैं – भले निरंकुश राजनीतिक व्यवस्था बदली हो, लेकिन राणा शासन द्वारा लगाए गए और सामंतों द्वारा पाले गए प्रशासनिक कर्मचारी कहलाने वाला विषवृक्ष अभी तक जड़ से उखाड़ा नहीं जा सका है। यही समृद्धि में सबसे बड़ी बाधा है। समृद्धि की यात्रा तभी शुरू होगी जब प्रशासनिक कर्मचारी ट्रेड यूनियन कार्यालय सिंहदरबार के दक्षिण द्वार के पास अवरुद्ध किया जा सके, नहीं तो यह सब केवल भाषण तक सीमित रहेगा।
परिवर्तनशील माहौल में नई दृष्टि के साथ राजनीति को पुनर्परिभाषित और संशोधित करके समृद्धि की ओर आगे बढ़ना अनिवार्य है। अपनी सोच न बदलना और देश तथा समाज न बदलने का अर्थ मूर्खता है।
नीति के बिना सामाजिक व्यवस्था स्थापित नहीं हो सकती और सामाजिक संबंध भी प्रभावित होते हैं। कर्मचारी तंत्र जो सामाजिक स्थिति को बनाए रखने में सहायता करता है, वह अपने स्वार्थ के कारण निष्क्रिय हो गया है। इससे नेपाली उन्नति का सपना दशकों तक निराशायें झेल रहा है। इस विषय पर मुखर आवाज कम ही सुनाई देती है और मुख्य जिम्मेदार राजनीतिक नेतृत्व भी चुप है, क्योंकि परिवर्तन होने पर भ्रष्ट संरचनाओं में व्याप्त स्वार्थ विघटित हो जाएगा। यह भयावह स्थिति नया नेतृत्व कठोर कदम उठाने के लिए प्रेरित करनी चाहिए, नहीं तो नेपाली समाज की आशाएँ मर जाएंगी।
इस उत्साह को बनाये रखना जनप्रतिनिधियों का कर्तव्य है। नेपाल की विडंबना यह है कि विधि निर्माण करने वाले सांसद सबसे अधिक उपेक्षित हैं। औपचारिकता के लिए उन्हें कानून में स्वीकृति की जरूरत होती है, लेकिन वही सांसद जिनके लिए कानून बनाया जाता है, उन्हें कमजोर करने वाला कर्मचारी तंत्र सक्रिय है। यह तंत्र स्वयं या किसी अन्य के निर्देश पर चलता है और दलाल मध्यवर्गीय राजनीतिक नेतृत्व तथा पश्चिमी शिक्षा प्राप्त बुद्धिजीवी बिचौलियों के गठजोड़ द्वारा संचालित होता है। सुनने में आरोप जैसा लग सकता है, लेकिन यह हमारे समाज की कड़वी सच्चाई है। ऐसी स्थिति में संभावित दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सार्थक पहल जरूरी है। सशक्त आंतरिक दलगत लोकतंत्र, राजनीतिक तथा प्रशासनिक नेतृत्व की पारदर्शिता और नागरिक समाज की सक्रियता को बढ़ावा देना होगा, नहीं तो देश का परिवर्तन संभव नहीं।
नई परिस्थितियों में राजनीति को पुनर्परिभाषित कर समृद्धि को आगे बढ़ाना ही एकमात्र विकल्प है। अपने, समाज और देश का निर्माण अब हम सभी की जिम्मेदारी है। यदि स्वयं न बदलेंगे और देश, समाज नहीं बदलेगा तो निरंतर रोना-मचना व्यर्थ होगा। व्यवस्था बनाए रखने और नीतिगत भ्रष्टाचार रोकने के लिए निम्न कदम तुरंत उठाने होंगे :
पहला, जब तक दलों के भीतर लोकतंत्र मजबूत नहीं होगा, तब तक सही लोकतंत्र की कल्पना व्यर्थ है। गुटवाद हर पार्टी का कैंसर है और इसे खत्म कर दलों को नागरिक प्रतिनिधि समूहों और उनके नेताओं के संयोजन से चलाना होगा। यदि ऐसा नहीं होगा तो भ्रम खत्म नहीं होगा।
दूसरा, कर्मचारी तंत्र के पुनर्गठन के बिना स्थायी सरकार सेवा प्रदान करने में असमर्थ होगी। दल और नेताओं की चापलूसी में फंसे कर्मचारी तंत्र सामाजिक अपराध की जड़ है और इससे उत्पन्न विकृतियां आज के संकट का कारण हैं। इसे निकम्मा करने वाले पुराने तंत्र खारिज कर नए माहौल में पुनर्गठन करना होगा, अन्यथा उचित सेवा देना संभव नहीं।
तीसरा, नीति निर्माण में स्वार्थ समूहों के प्रभाव को कानूनी रूप से निरुत्साहित करना आवश्यक है। यह आसान नहीं क्योंकि नेतृत्व में मौजूद मध्यवर्ग को अनुशासित उद्यमी बनना सीखना होगा, अन्यथा बिचौलिया चालाकियां नहीं रुकेगीं। विधि निर्माण, पारदर्शिता और नैतिक नेतृत्व विकास पर भी ध्यान देना होगा। यह काम सांसदों के सामाजिक और कार्यकारी भूमिका को सशक्त करके किया जा सकता है। संसद को चुस्त बनाकर जनप्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाना जरूरी है।
नेपाल की समृद्धि यात्रा को सफल और स्थायी बनाने के लिए इस अवरोधक संरचना को बदलना अनिवार्य है। करदाता नागरिकों का कर उचित उपयोग हो और कर्मचारी सचमुच राष्ट्रसेवक के रूप में काम करें। वह दिन दूर नहीं है। वह दिन तभी संभव होगा जब राजनीतिक दल और उनके नेतृत्व उत्कृष्ट नागरिक नेतृत्व प्रदान कर सकें। अंततः नेपाल की समृद्धि की गाड़ी तभी चलेगी जब प्रशासन चुस्त और दुरुस्त होगा और अनुभवी तथा अनुशासित चालक संचालन में रहेंगे। जब सभी की सोच बदलेगी तभी उन्नति की यात्रा शुरू होगी। आइए, उस दिन का इंतज़ार करें, जो जल्द ही आने वाला है।





