
समाचार सारांश
- नेपाल में गैर-संचारी रोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और सालाना 1 लाख 93 हजार से अधिक लोग इन बीमारियों के कारण मृत्यु दर झेलते हैं।
- मिर्गौला रोगी हस्तिमाया लिम्बू और रामबहादुर तामाङ ने मिर्गौला प्रत्यारोपण कराया, लेकिन उपचार के खर्च ने उन्हें आर्थिक संकट में डाल दिया।
- सरकार ने गैर-संचारी रोगों की रोकथाम के लिए बहुक्षेत्रीय योजना लागू की है, लेकिन रोकथाम की अपेक्षा इलाज पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है।
१७ चैत, काठमांडू। झापाकी ५५ वर्षीय हस्तिमाया लिम्बू की जीवन कहानी किसी फिल्म की तरह है। जब उनके पति संपर्क विहीन हो गए, तो उन्होंने दो पुत्रियों की जिम्मेदारी अकेले उठाई और २०७३ साल में ओमान जाना पड़ा।
ओमान में हस्तिमाया की दिनचर्या बहुत कठिन थी। सुबह ५ बजे से लेकर रात ११ बजे तक घरेलू कामगार के रूप में लगातार काम करना पड़ता था। उन्होंने कहा, ‘सफाई, खाना बनाना, कपड़े धोना सभी काम करती थी,’ उन्होंने उन दिनों को याद करते हुए कहा, ‘दिन-रात काम करने से शरीर बहुत दुखता था। कभी-कभी पेनकिलर लेना पड़ता था।’
अत्यधिक गर्मी में भी वह गीला पानी पीती थीं। अत्यधिक काम के दबाव से पेशाब और मल रोकना पड़ता था। इस आदत ने स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाला। खाने की इच्छा कम हुई, कमर में दर्द होने लगा और लगातार उल्टी होती रही। एक दिन वह बेहोश हो गईं, तब उनके मालिक ने उन्हें अस्पताल ले गए। अस्पताल में होश खुलने पर पता चला कि दोनों मिर्गौले काम करना बंद कर चुके थे, जिससे वह स्तब्ध रह गईं।
चार दिन तक डायलासिस कराने के बाद नियोक्ता ने उन्हें नेपाल वापस भेज दिया। नेपाल लौटने के बाद कोरोना महामारी ने उनके लिए और चुनौती खड़ी कर दी। डायलासिस के दौरान कोरोना संक्रमण से उनकी सेहत गंभीर हो गई।

संघर्ष यहीं खत्म नहीं हुआ। उनकी बहन मिर्गौला दान के लिए तैयार थीं, लेकिन पित्ताशय में पथरी पाए जाने के कारण पित्ताशय निकालना पड़ा। चैत २०८० में हस्तिमाया का मिर्गौला प्रत्यारोपण सफल रहा। इसके लिए उन्होंने कहा, ‘६० लाख से अधिक खर्च हो चुका है।’
‘जहां काम करती थी, वहां रोजाना मांस के व्यंजन बनते थे, खासकर बहुत तैलीय मांस उन्हें पसंद था,’ उन्होंने कहा, ‘शायद तैलीय मांस खाने के कारण मेरे मिर्गौले प्रभावित हुए हैं।’
अब वह कुछ समय के अंतराल पर फॉलो-अप के लिए त्रिवि शिक्षण अस्पताल जाती हैं। ‘अब जीने के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है,’ हस्तिमाय ने कहा, ‘दवाइयों की लागत ही महीने के १५ हजार रूपए होती है।’
ऐसा ही अनुभव काभ्रेका ५२ वर्षीय रामबहादुर तामाङ को भी है। जो काठमांडू में किराये पर रहकर दैनिक मजदूरी करते थे और परिवार पालते थे। वह सुबह काम पर जाते और शाम को घर लौटते।
‘एकाकी रहने पर खाना बनाने का मन नहीं करता था। सुबह-शाम बाजार से ही खाने का सामान लेते थे,’ उन्होंने बताया, ‘इसका असर स्वास्थ्य पर भी पड़ा।’
उन्होंने माना कि बाजार में आसानी से मिलने वाले तैलीय, तले हुए, और जंक फूड स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है।
रामबहादुर को थकान, शरीर सुन्नापन और धीरे-धीरे स्वास्थ्य बिगड़ने की समस्या होने लगी। जब वे गम्भीर स्थिति में अस्पताल पहुंचे, तो मिर्गौला फेल बताया गया। वे कुछ वर्षों तक डायलासिस पर रहे।
दो साल पहले उनके पुत्र ने मिर्गौला दान किया और सफल प्रत्यारोपण हुआ, लेकिन आर्थिक तंगी ने परिवार को सड़क पर ला दिया।
‘बाजार में मिलने वाले तैलीय और जंक फूड का अधिक सेवन किया था,’ उन्होंने याद किया, ‘उसी आदत से मिर्गौले खराब हुए।’
सरकार ने मिर्गौला प्रत्यारोपण के लिए ५ लाख रूपए की सहायता दी थी, लेकिन दवाइयों और अन्य खर्च ने वह राशि पूरी नहीं की। ‘इलाज के लिए अपने घर और जमीन बेचनी पड़ी,’ उन्होंने बताया।
ये उदाहरण दर्शाते हैं कि गैर-संचारी रोगों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. केदार बराल के अनुसार, ‘जीवनशैली और खानपान में बदलाव से रोग बढ़ रहे हैं।’
विशेषज्ञों के मतानुसार पिछले वर्षों में खानपान व जीवनशैली में आए बदलावों के कारण रोगों का खतरा बढ़ा है। पहले मुख्य मौतों का कारण संक्रामक रोग थे, लेकिन अब गैर-संचारी रोग प्रमुख हो गए हैं।
नेपाल के १० प्रमुख मृत्यु कारणों में से ८ गैर-संचारी रोग हैं। रोग बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार सालाना १,९३,३३१ लोग गैर-संचारी रोगों से मरते हैं।
हार्ट और रक्त नली रोगों में सालाना ४६,३९९ लोगों की मृत्यु होती है। दीर्घ श्वास रोग से ४०,७९२ नेपाली अकाल मृत्यु के शिकार होते हैं। ट्यूमर और कैंसर से सालाना २१,६५३ लोगों की जान जाती है। अन्य रोगों से भी हजारों मौतें होती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसका मुख्य कारण आधुनिक जीवनशैली और अस्वस्थ खानपान है। नेपाल में ७१ प्रतिशत मृत्यु इन रोगों के कारण होती है।
पाटन स्वास्थ्य विज्ञान संस्थान के प्रो. डॉ. मधुसूदन सुवेदी ने कहा कि पिछले तीन दशकों में रोगी संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। पहले शारीरिक श्रम अधिक होता था, लेकिन अब मोटरसाइकिल, स्कूटर पर निर्भरता बढ़ी है।
गैर-संचारी रोगों के उपचार के खर्च ने कई परिवारों को आर्थिक संकट में डाल दिया है। सालाना पाँच लाख से अधिक नागरिक गरीबी रेखा के नीचे गिर गए हैं।
डा. सुवेदी के मुताबिक बाजार के तैलीय, संसाधित और फास्ट फूड के कारण दिल, मधुमेह, कैंसर की घटनाएं बढ़ी हैं।
‘हम सोचते हैं कि हम स्वस्थ भोजन करते हैं, लेकिन विषाक्त भोजन से स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है,’ वे कहते हैं।
वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. राजेन्द्र कोजू कहते हैं कि बाजार में मिलने वाले कई खाद्य पदार्थों में वसा की मात्रा अत्यधिक होती है। तली हुई तथा फ्रोज़न चीज़ें ट्रांस फैट से भरपूर होती हैं, जो लंबी अवधि में स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।
ट्रांस फैट कोलेस्ट्रॉल, उच्च रक्तचाप, मधुमेह और मोटापे को बढ़ाता है तथा दिल, किडनी और दिमाग के रोगों का खतरा बढ़ाता है।
तैलीय खाद्य पदार्थों में, जैसे बिस्कुट, कुकीज, समोसा, चिप्स, केक, पिज़्ज़ा, मोमोज़ आदि की खपत बढ़ी है।
विपन्नों के गैर-संचारी रोग खर्च ५ वर्षों में दोगुना
सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन बीमारियों से पीड़ित गरीब नागरिकों को दवाओं और उपचार में सहायता देने वाले कार्यक्रम में पांच सालों में सेवा लेने वालों की संख्या दो गुना हो गई है। कैंसर, हृदय रोग, डायलासिस, किडनी ट्रांसप्लांट जैसे रोगों के मरीज बढ़े हैं।
आर्थिक तौर पर खर्च भी दोगुना हो चुका है। वित्त वर्ष २०७७/७८ में २१४ करोड़ रुपए खर्च हुए, जबकि २०८१/८२ में यह ४४२ करोड़ रुपए पहुँच गया।
यह सेवा अब स्वास्थ्य बीमा बोर्ड के माध्यम से भी उपलब्ध हो रही है। कड़ी बीमारियों से पीड़ित ४६ हजार से अधिक गरीब वर्ग बीमा के तहत सेवा प्राप्त कर चुके हैं।
स्वास्थ्य सेवा विभाग के विश्लेषण के अनुसार उच्च रक्तचाप, मधुमेह और कैंसर रोगों में बीमा सेवा लेने वाले मरीजों की संख्या अधिक है। बीमा में होने वाले दावों का लगभग आधा हिस्सा गैर-संचारी रोगों का है।
नसर्ने रोगों के मरीज़ों में वृद्धि और आर्थिक बोझ स्वास्थ्य प्रणाली पर बढ़ रहा है, मल्ल बताते हैं।
नागरिकों का अपने खर्च पर इलाज का हिस्सा करीब ४० प्रतिशत है। किडनी, मधुमेह, कैंसर, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग दीर्घकालीन आर्थिक बोझ बढ़ा रहे हैं।
स्वास्थ्य अर्थशास्त्री घनश्याम गौतम के अनुसार यह एक दीर्घकालीन समस्या है। रोकथाम ज्यादा प्रभावी और लाभकारी है, सरकार को इलाज की जगह रोकथाम में निवेश करना चाहिए।
धूम्रपान, असंतुलित आहार, शारीरिक निष्क्रियता, मोटापा और तनाव ने समस्या को बढ़ाया है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक स्वास्थ्य सेवा के दौरान औसतन २७ हजार रुपए खर्च होते हैं, जो लंबी अवधि में वित्तीय समस्या उत्पन्न कर सकते हैं।
नेपाली आमतौर पर बीमारी होने पर ही इलाज पर ध्यान देते हैं। हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. भगवान कोइराला कहते हैं कि बीमारी न होने देना, रोकथाम और नियमित परीक्षण अनिवार्य है।
डॉ. कोइराला का कहना है कि सरकार को अब उपचार से अधिक रोकथाम पर ध्यान देना चाहिए।

प्रदूषण और जंक फूड से फैलता रोगों का जाल
विशेषज्ञों का कहना है कि धूम्रपान, अस्वस्थ खान-पान, शारीरिक निष्क्रियता, मोटापा और तनाव रोगों को बढ़ाता है।
धुलिखेल अस्पताल के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. राजेन्द्र कोजू के अनुसार अब युवाओं में भी दिल का दौरा पड़ रहा है, जिसका मुख्य कारण धूम्रपान है।
हृदय और रक्त नली रोगों से स्ट्रोक का खतरा भी बढ़ा है। वीर अस्पताल के न्यूरोसर्जन डॉ. राजीव झकाले का अनुमान है कि आने वाले ८-१० वर्षों में स्ट्रोक सबसे बड़ा मृत्यु कारण बन सकता है।
छाती रोग विशेषज्ञ डॉ. राजु पंगेनी का कहना है कि दीर्घकालीन श्वास रोग ९० प्रतिशत से अधिक मरीजों को प्रभावित करता है जिनमें COPD, दमा और अस्थमा शामिल हैं।
डॉ. पंगेनी के अनुसार ४० वर्ष से ऊपर के लोगों में दमा रोग ज्यादा होता है और वायु प्रदूषण व धूम्रपान इसके मुख्य कारण हैं।
‘वातावरण प्रदूषण और अस्वस्थ खान-पान से रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है,’ उन्होंने बताया।
कैंसर विशेषज्ञ डॉ. विवेक आचार्य ने खराब खान-पान, असंतुलित जीवन और अस्वस्थ जीवनशैली को कैंसर के खतरे का मुख्य कारण बताया।
कैंसर बढ़ाने में पैकेज्ड, जंक फूड और संसाधित खाद्य पदार्थों का विवादित उपयोग जुड़ा है।
अत्यधिक मांस, जंक फूड और तैलीय खाना पाचन तंत्र के कैंसर का खतरा बढ़ाते हैं, डॉ. आचार्य ने बताया।
‘दिनभर बैठने और कम सक्रियता वालों में मोटापा और कैंसर का खतरा अधिक होता है,’ वे कहते हैं।
पहले नेपाल में ज्यादातर घर पर बने भोजन का सेवन होता था, लेकिन अब फास्ट फूड और संसाधित भोजन की खपत बढ़ी है।
गैस्ट्रोएंटरॉलोजिस्ट डॉ. भूपेन्द्रकुमार बस्नेत के अनुसार तेल का अधिक इस्तेमाल पाचन समस्याएं और कैंसर बढ़ाता है।
रसायनों का भी स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
पाचन रोगों का समय पर पता न चलने से उपचार जटिल होता है और मृत्यु दर बढ़ती है।
मिर्गौला रोग भी एक गंभीर जनस्वास्थ्य चुनौती बन गया है। मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मोटापे से इसकी वृद्धि हो रही है।
मिर्गौला रोग विशेषज्ञ डॉ. ऋषिकुमार काफ्ले के अनुसार मिर्गौला फेल होने पर प्रत्यारोपण या डायलासिस जरूरी हो जाता है।
लेकिन यह हर किसी के लिए संभव नहीं है और कई मरीजों को जीवनभर डायलासिस पर निर्भर रहना पड़ता है, जो बड़ी चुनौती है।
मिर्गौला रोगियों की संख्या सालाना ३ हजार से बढ़ रही है। हजारों मरीज प्रत्यारोपण के इंतजार में हैं, पर वार्षिक मात्र २०० प्रत्यारोपण होते हैं।

सरकार की रोकथाम की अपेक्षा उपचार केंद्रित नीति
स्वास्थ्य एवं जनसंख्या मंत्रालय के अनुसार गैर-संचारी रोग महामारी के रूप में फैल रहे हैं। सरकार ने २०२१-२०२५ के लिए बहुक्षेत्रीय रोकथाम कार्यक्रम लागू किया है और २०२६-२०३० के लिए नई कार्ययोजना तैयार की जा रही है।
कार्ययोजना का उद्देश्य हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और दीर्घ रोगों से होने वाली अकाल मृत्यु दर को ३३ प्रतिशत कम करना है।
लेकिन इसके लिए सभी स्तरों और निकायों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
गैर-संचारी रोगों के मुख्य कारण स्वास्थ्य क्षेत्र से परे भी हैं, जैसे प्रदूषण, कूड़ा प्रबंधन, कीटनाशक और रासायनिक पदार्थ।

पिछली योजना में बहुक्षेत्रीय अवधारणा शामिल करने का प्रयास हुआ, लेकिन प्रभावी कार्यान्वयन नहीं हो सका। अब नीति, संसाधन और कार्यक्रमों का स्पष्ट समन्वय करने की योजना है।
स्वास्थ्य क्षेत्र के अलावा अन्य क्षेत्रों को भी स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाले तत्वों को कम करने के लिए कदम उठाने होंगे, डॉ. विकास देवकोटा ने बताया।
जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. केदार बराल कहते हैं कि गैर-संचारी रोग जीवनशैली से जुड़े हैं, इसलिए जीवनशैली सुधारना जरूरी है। ‘सरकार इलाज पर ज़्यादा ध्यान दे रही है, रोकथाम में अब भी सुधार की आवश्यकता है,’ उन्होंने कहा।
डॉ. शरद वन्त ने कहा कि सिर्फ स्वास्थ्य क्षेत्र नहीं, बल्कि अन्य क्षेत्रों के साथ सहयोग करना अनिवार्य है। नीति निर्माण और कार्यान्वयन अभी भी कमजोर है।
डॉ. रिता थापा ने बताया कि गैर-संचारी रोग महामारी के रूप में फैल रहे हैं और जीवनशैली व आदतें मुख्य कारण हैं।

‘बच्चे धूम्रपान उत्पादों का सेवन करते हैं और अभिभावक जंक फूड खिलाते हैं। शारीरिक सक्रियता कम हो रही है और तनाव बढ़ रहा है,’ डॉ. थापा ने कहा।
सरकार इलाज पर अधिक खर्च कर रही है लेकिन रोकथाम के प्रति कम ध्यान दे रही है, उन्होंने जोड़ा।
थापा के अनुसार स्कूल स्तर से स्वास्थ्य जीवनशैली की शिक्षा जरूरी है क्योंकि किशोरावस्था में धूम्रपान और जंक फूड की शुरुआत होती है।
विकसित देशों में ये रोग नियंत्रण में हैं, लेकिन नेपाल जैसे विकासशील देशों में गैर-संचारी रोग महामारी की तरह फैल रहे हैं।
चिकित्सा समाजशास्त्री मधुसूदन सुवेदी ने कहा कि सरकार को रोकथाम, स्क्रीनींग और जनजागरूकता कार्यक्रमों में निवेश बढ़ाना चाहिए।
डा. दास ने कहा कि धूम्रपान, अस्वस्थ खानपान और निष्क्रिय जीवनशैली इन रोगों के मुख्य कारण हैं और इनके ऊपर कर वृद्धि जरूरी है।
स्वास्थ्य अर्थशास्त्री गौतम ने साबित किया कि इलाज की तुलना में रोकथाम में निवेश लंबे समय में सस्ता और प्रभावी है।





