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‘मीडिया का दायरा सीमित करना लोकतंत्र के लिए खतरा है’

१९ चैत, काठमाडौं। सरकार ने निर्णय लिया है कि सार्वजनिक निकायों के विज्ञापन केवल सरकारी मीडिया में ही प्रकाशित और प्रसारित किए जाएंगे। इस निर्णय के कारण देश भर में संचालित रेडियो स्टेशनों के अस्तित्व को गंभीर खतरा होने की संभावना बढ़ गई है। सामुदायिक रेडियो प्रसारक संघ के अध्यक्ष अर्जुन गिरी ने कहा, “सरकार का यह कदम ‘पुराना और संकुचित’ सोच का परिणाम है। यह लोकतंत्र और संघवाद के मूलभूत सिद्धांतों पर हमला है।”

गिरी ने आगे कहा, “आधुनिक और लोकतांत्रिक समाज में सूचना तथा विज्ञापन के प्रवाह को खुला और प्रतिस्पर्धात्मक बनाना आवश्यक है, लेकिन सरकार ने ‘सिन्डिकेट’ शैली अपना ली है।” उन्होंने कहा, “कल तक लोकतंत्र की प्राप्ति के लिए पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो और टेलीविजन द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका को सरकार इस नीति से अवमूल्यित कर रही है, जो कि हानिकारक प्रतीत होती है।”

संचार क्षेत्र पहले ही संवेदनशील स्थिति में है, ऐसे समय में राज्य का अभिभावकत्व ग्रहण करने की बजाय यह निर्णय और भी बड़ी समस्या खड़ी कर रहा है। खासकर स्थानीय सरकारों और प्रदेशों के साथ साझेदारी में संचालित सामुदायिक रेडियो इस निर्णय से सीधे प्रभावित हुए हैं। स्थानीय सरकारों के साथ समन्वय करके सुशासन, आर्थिक पारदर्शिता और देरी के खिलाफ जागरूकता फैलाने वाले रेडियो का विकास इस फैसले से भारी बाधा में पड़ा है।

मीडिया के दायरे को सीमित करने वाला यह कदम नागरिकों के सूचित होने के अधिकार पर भी गहरा प्रभाव डालेगा। संविधान ने संचार से जुड़े अधिकार स्थानीय और प्रदेश स्तर तक सौंपे हैं। लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय से जारी इस निर्देश ने संघवाद के मूल तत्त्वों को सीधे चुनौती दी है। इसी मनोभाव ने कुछ प्रदेश सरकारों को भी मीडिया प्रोत्साहन के लिए आवंटित बजट में कटौती करने के लिए प्रेरित किया है। लुम्बिनी प्रदेश सरकार की हाल की चर्चा ने भी केंद्र की नीति की नकल करते हुए मीडिया-हितैषी व्यवहार न करने का संकेत दिया है, जिससे संघीयता की स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न लग गया है। सरकार यदि इस भेदभावपूर्ण नीति में सुधार नहीं करती है, तो संचार क्षेत्र इसे स्वीकार नहीं करेगा और सशक्त आंदोलन की घोषणा करेगा।