
समाचार सारांश
- पूर्णिमा शाह ने नर्स बनने का सपना अधूरा छोड़ कर कुकिंग में अपनी असली रुचि पहचानी और होटल प्रबंधन की पढ़ाई की।
सिरहा के कर्जन्हा नगरपालिका में जन्मी पूर्णिमा शाह का शुरू में खाना पकाने से जुड़ा सपना नहीं था। उन्होंने प्लसटू में विज्ञान विषय पढ़ा और नर्स बनने की इच्छा जताई, पर छात्रवृत्ति न मिलने के कारण उनका यह सपना पूरा नहीं हो पाया।
निराश होकर वह घर वापस लौटीं, जो कि युवा जीवन के सामान्य मोड़ों में से एक है। लेकिन कभी-कभी जीवन हमें हमारी सच्ची रुचि खोजने का अवसर देता है। पूर्णिमा की दिलचस्पी बचपन से ही रसोई में थी, जिसे उन्होंने महीन भावनाओं से महसूस किया था।
सेफ सन्तोष शाह ने उनकी इस रुचि को समझा और कहा, “अगर तुम्हें खाना बनाना पसंद है तो इस विषय को सीखो, होटल प्रबंधन करो, मैं तुम्हें मदद करूंगा।” इस सुझाव ने पूर्णिमा के जीवन की दिशा बदल दी।
जनकपुर से प्लसटू पूरा करने के बाद पूर्णिमा काठमांडू आईं और धुम्बराही में स्थित गेट कॉलेज में होटल प्रबंधन की पढ़ाई शुरू की। उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया और कभी भी दूसरे स्थान पर नहीं रहीं। “अनुभव के बिना पढ़ाई अधूरी है” के सोच के साथ उन्होंने पढ़ाई के साथ होटल में भी काम किया।
उन्होंने ‘सेफ नेपाल’ रियलिटी शो में भाग लिया और सातवां स्थान हासिल किया। कालेज के प्रशिक्षण के लिए दुबई जाना पड़ा तो उन्होंने प्रतियोगिता छोड़ दी। दुबई में दो साल के अनुभव ने उनका आत्मविश्वास और मजबूत किया।
रसोई को केवल पेशा न मानकर पूर्णिमा ने इसे अपनी पहचान बनाया। नेपाल लौटने पर वे मास्टर सेफ सन्तोष शाह द्वारा संचालित नक्साल के गैरीधारा स्थित मिथिला थाली से जुड़ीं। आज 23 वर्ष की उम्र में वे वहां की पूरी रसोई संभाल रही हैं। उनके लिए खाना बनाना सिर्फ काम नहीं, आनंद और जीवन है।
मिथिला थाली केवल भोजनालय नहीं, सांस्कृतिक अनुभव है। हर व्यंजन में मधेस और मिथिला क्षेत्र की परंपरा, जीवनशैली और स्वाद झलकता है। व्यंजनों का संयोजन, प्रस्तुतिकरण और स्वाद का संतुलन इसे अन्य भोजनालयों से अलग बनाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है इसका ‘घरेलू अनुभव’।
यहां का खाना केवल भूख मिटाने के लिए नहीं, परिवार, संस्कृति और आत्मीयता का प्रतीक भी है, जिसे पूर्णिमा जैसे युवा सेफ आधुनिक अंदाज में प्रस्तुत कर नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं।
रसोई के काम में कभी आलस्य न होने वाली पूर्णिमा कहती हैं, “मुझे खाना बनाते कभी थकान नहीं होती। कभी-कभी मैं आधी रात को भी उठकर खाना बनाती हूं। दूसरों को खिलाने में मुझे सबसे ज्यादा खुशी मिलती है।”
उनकी फिश करी बहुत लोकप्रिय है और उनकी खीर भी लोगों को बेहद पसंद आती है। काम की तारीफ मिलने पर वह अपने व्यंजन और बेहतर बनाने के लिए प्रेरित होती हैं।
दादी की चूल्हे की आग से विश्व के बाजार तक का सपना
पूर्णिमा का खाना पकाने से लगाव 7 वर्ष की उम्र से शुरू हुआ था। दादी द्वारा आग पर पकाया गया खाना उन्हें अत्यंत स्वादिष्ट लगता था। यही रुचि आज उनका पेशा बन गई है। वे नेपाली व्यंजन बनाना पसंद करती हैं और पंजाबी व्यंजन भी सीखने की इच्छा रखती हैं।
उनका बड़ा सपना स्वाद तक सीमित नहीं है, वे मिथिला के व्यंजनों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दृष्टि रखती हैं। “मैं इसे व्यवसाय के रूप में आगे बढ़ाना चाहती हूं,” वह बताती हैं।
पूर्णिमा अभी सीखने की प्रक्रिया में हैं और उनका अगला लक्ष्य है विदेश जाकर पोषण विज्ञान (न्यूट्रिशन साइंस) का अध्ययन करना। उनके अनुसार खाना सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि स्वास्थ्य से जुड़ा जीवनशैली का हिस्सा है। “हमें खाना बनाते समय साफ-सफाई और स्वास्थ्य का विशेष ध्यान देना चाहिए,” वह कहती हैं।
नेपाली रसोई में महिला सेफ की पहचान अभी पूरी तरह स्थापित नहीं हुई है। पूर्णिमा इसे अवसर मानती हैं। “अब तक नेपाली महिला सेफ ज्यादा परिचित नहीं हैं, मैं इस क्षेत्र में बदलाव लाना चाहती हूं,” वह बताती हैं। उन्हें विश्वास है कि खाना बनाना केवल पुरुषों का पेशा नहीं है, महिलाएं भी इस क्षेत्र में पूरी क्षमता दिखा सकती हैं।
सफल होने पर वे बहुत सी युवतियों को इस पेशे में आने के लिए प्रेरित कर सकेंगी, यह उनका विश्वास है। इसलिए वे न केवल अपना करियर बनाना चाहती हैं, बल्कि अगली पीढ़ी की महिला सेफ के लिए एक मिसाल बनना चाहती हैं।
प्रारंभ में नेपाल में सेफ के पेशे को बहुत प्रतिष्ठा नहीं मिली थी, पर मास्टर सेफ सन्तोष शाह ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेपाली स्वाद को पहचान दिलाकर इस पेशे को गौरव दिया है। पूर्णिमा के लिए वे प्रेरणा का स्रोत और रोल मॉडल दोनों हैं। “उन्होंने जो रास्ता दिखाया है, उसने हमें बड़ा सपना देखने का हौसला दिया है,” पूर्णिमा कहती हैं।
वे भी इस क्षेत्र को प्रतिष्ठित बनाने और नेपाली रसोई को विश्व स्तर पर पहुँचाने के प्रयास में जुटी हैं। वे कभी-कभी अपने बनाए व्यंजनों के वीडियो टिकटक पर पोस्ट करती हैं, जिनके 26 हजार से अधिक फॉलोअर हैं।
पूर्णिमा की इस प्रगति के कारण भविष्य में वे सफल महिला शेफ के रूप में देखी जा सकती हैं।
विदेश से ज्ञान और अनुभव लेकर नेपाल लौटकर वे और बेहतर शेफ बनने का योजना बना रही हैं। पूर्णिमा शाह की कहानी केवल एक युवती के करियर की कहानी नहीं, बल्कि जीवन की असफलताओं से सफलता का संदेश भी है।
नर्स बनने का सपना अधूरा रह गया, लेकिन रसोई में उन्हें अपनी सच्ची पहचान मिली। आज वे केवल खाना बनाने में ही नहीं, अपने सपनों को भी आगे बढ़ा रही हैं, जिनका स्वाद कल विश्व चखेगा।





