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नेकपा एमाले में संघर्ष और जटिलताएं

समाचार सारांश स्रोत से संपादकीय समीक्षा के बाद प्रस्तुत। नेकपा एमाले की राष्ट्रीय युवा संघ ने पार्टी अध्यक्ष केपी शर्मा ओली और हिरासत में बंद कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग की है। एमाले सचिवालय ने मतदाता सूची अद्यतन पर ध्यान देने और आगामी १२ वैशाख को विरोध सभा आयोजित करने का निर्णय लिया है। ओली की गिरफ्तारी के बाद एमाले ने कानूनी प्रक्रिया और सुप्रीम कोर्ट में विश्वास जताते हुए ७ वैशाख को राजधानी केंद्रित शक्ति प्रदर्शन करने की योजना बनाई है। २४ चैत्र, काठमांडू। नेकपा एमाले के युवा संगठन राष्ट्रीय युवा संघ नेपाल का रविवार को पदाधिकारी बैठक हुई। बैठक में पार्टी अध्यक्ष केपी शर्मा ओली समेत हिरासत में बंद कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग की गई। ‘पार्टी अध्यक्ष को गिरफ्तार किया गया है। उनकी रिहाई के लिए आंदोलन के दौरान अन्य कार्यकर्ता भी गिरफ्तार हुए हैं,’ युवा संघ के अध्यक्ष महाराज गुरूँग ने कहा, ‘गैरकानूनी रूप से गिरफ्तार सभी नेता और कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग हम सरकार से उठा रहे हैं।’ बैठक के बाद जारी बयान में केवल ओली और अन्य नेताओं की रिहाई की ही नहीं, बल्कि ईंधन मूल्य वृद्धि को नियंत्रित करने, गुंडागर्दी के आरोप में गिरफ्तार लोगों की रिहाई तथा समर्थकों के खिलाफ जारी साइबर बुलिंग रोकने की भी मांग की गई है। ‘गृह मंत्री भी अपने ही भूमि मामले में फंसे हैं, कई अन्य अनियमितताएं हैं, जिनपर हमें आपत्ति है,’ गुरूँग ने बताया। बैठक ने १२ वैशाख को विरोध सभा आयोजित करने का भी फैसला किया है। ‘फिलहाल नेपाली जनता को कष्ट न हो इसके लिए कोई प्रदर्शन की तैयारी नहीं की गई है,’ उन्होंने कहा। १४ चैत्र को ओली को उनके निवास से गिरफ्तार किए जाने के बाद तीन दिन तक युवा संघ समेत कई एमाले कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किए थे। गिरफ्तारी वाले दिन सचिव महेश बस्नेत ने आंदोलन में सक्रियता बताए थे। बस्नेत, जो ओली के विश्वसनीय सहयोगी हैं, उनकी अभिव्यक्ति को ध्यान दिया गया था। हालांकि बस्नेत की चेतावनी के बावजूद आंदोलन निरंतर नहीं रहा। १४ और १५ चैत्र को सामान्य प्रदर्शन हुए जबकि १६ चैत्र को बागमती प्रदेश कमिटी के बैनर तले सड़क प्रदर्शन हुआ। इसके बाद, रिहाई से अधिक सरकार के फैसलों को लेकर असंतोष और आंतरिक मतभेदों के समाधान के प्रयास देखा गया। महासचिव शंकर पोखरेल ने २४ चैत्र को जारी सर्कुलर में भी पार्टी के आंतरिक अस्थिरता को दर्शाया। उन्होंने सभी प्रदेश और जिला अध्यक्षों को मतदाता सूची अद्यतन पर ध्यान केंद्रित करने का निर्देश दिया। पार्टी के आंतरिक निर्णयों से भी एमाले की जटिल स्थिति स्पष्ट होती है। २० चैत्र को सचिवालय बैठक में संसदीय दल के नेता रामबहादुर थापा के वक्तव्यों में सुधार की मांग, सरकार के फैसलों पर असहमति सहित कई निर्णय लिए गए थे। विशेष रूप से १९ चैत्र को संसदीय सभा की पहली बैठक में थापा ने एमालेलाई परास्त करने के लिए नेपाली सेना, कर्मचारी, सुशीला कार्की नेतृत्व वाली सरकार और विदेशी शक्तियों के संलिप्त होने की बात कही जो पार्टी की छवि के लिए नुकसानदेह थी। इसके बाद आकस्मिक सचिवालय बैठक बुलाई गई। इस बैठक ने थापा के विवादित अभिव्यक्ति से उत्पन्न संकट और संसदीय दल के भीतर उठे सवालों पर चर्चा की। इसके अलावा संसदीय दल के नेता पद के उम्मीदवार सुहाङ नेम्वाङ को नामांकन से रोकने से भी पार्टी में असंतोष बढ़ा है। युवा वर्ग महासचिव पोखरेल की इस्तीफा मांगते हुए नेतृत्व पुनर्गठन की माँग करते हुए प्रदर्शन कर रहा है, जो युवा पीढ़ी के प्रति पार्टी के नरम रुख को भी दर्शाता है। ओली की गिरफ्तारी के खिलाफ सड़कों पर उतरने के लिए आम लोगों से की गई अपील का कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है। जनता का समर्थन न मिलने से अधिकांश वक्तव्य और सोशल मीडिया प्रतिक्रियाएं ही दिखाई देती हैं। बैठक बाद जारी बयान में स्पष्ट किया गया है, ‘लोकतांत्रिक प्रक्रिया से लिए गए निर्णय का सम्मान करें और अनुपयुक्त टिप्पणी न करें, पार्टी की सभी शाखाओं से यह अपील है। पार्टी ने युवा वर्ग की सकारात्मक सुझावों को गंभीरता से लिया है।’ इसी दौरान विद्यार्थी संगठन अनेरास्वियु की गतिविधियां कमजोर दिख रही हैं। १९ चैत्र को अनेरास्वियु ने एसईई परीक्षार्थियों को शुभकामना देते हुए बयान जारी किया। एक अन्य बयान में अध्यक्ष दीपक धामी ने हस्ताक्षर कर विश्वविद्यालय द्वारा संगठन को निरस्त किए जाने के सरकारी फैसले का विरोध किया। पार्टी अध्यक्ष ओली की गिरफ्तारी के बाद समाज में उत्पन्न हुए विवादों में एमाले का दबदबा नहीं दिखने को पार्टी के नेता भी मान रहे हैं। ‘केपी ओली को छुआ तो देश ठप्प करने की चेतावनी देते थे, लेकिन उनकी गिरफ्तारी के बाद हम आवश्यक दबाव नहीं बना सके,’ एक नेता ने कहा। हालांकि प्रचार संयोजक मीनबहादुर शाही के अनुसार पार्टी नियत कार्यक्रमों के अनुसार सक्रिय है। ‘हम मौन नहीं बैठे हैं, सर्कुलर के अनुरूप कार्यक्रम चल रहे हैं,’ उन्होंने कहा, ‘मुद्दा अदालत में है और पार्टी के भीतर बैठकें हो रही हैं।’ तीन सचिवालय बैठकों में नरमी और व्यापक कार्यक्रम का फैसला हुआ, जो ओली की गिरफ्तारी के बाद आयोजित हुईं। इससे पता चलता है कि नेतृत्व की विश्वास सड़क प्रदर्शन से अधिक कानूनी प्रक्रिया और सुप्रीम कोर्ट पर केंद्रित है। पहले बैठक के फैसले से भी यही संकेत मिलते हैं। कुछ नेताओं ने देश को ठप्प करने की चेतावनी दी थी, लेकिन सचिवालय बैठक ने जिला प्रशासन के माध्यम से ज्ञापन पत्र देने और प्रदर्शन की जिम्मेदारी जन संगठनों को सौंपने का निर्णय लिया था। इसके बाद, १५ चैत्र को ज्ञापन पत्र देश भर में वरिष्ठ प्रशासनिक कार्यालयों को सौंपा गया। ज्ञापन पत्र प्रस्तुत करने, अन्य दलों के साथ सहकार्यता प्रस्ताव, संसद में विरोध और कानूनी लड़ाई जारी रखने के निर्णय भी लिए गए। विष्णुप्रसाद पौडेल ने संपर्क और समन्वय, रामबहादुर थापा ने संसद में विरोध, और गोकर्ण बिष्ट ने कानूनी उपचार का समन्वय करने की जिम्मेदारी पाई। लेकिन इन प्रयासों का कोई ठोस असर नहीं दिखा है। बंदी प्रत्यक्षीकरण के रिट में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश नहीं दिया है और बयान की अवधि बढ़ाई जाती रही है। कांग्रेस के आंतरिक विवाद और अन्य दलों के साथ मोर्चाबंदी न होने से कार्रवाई प्रभावी नहीं हो पाई है। थापा के अभिव्यक्ति से स्वयं संकट और बढ़ गया है। सड़क प्रदर्शन के लिए की गई अपील को जनसमर्थन नहीं मिला, जिसके कारण प्रदर्शन सीमित रहे। एमाले के संस्थागत फैसलों से भी जन प्रदर्शन में विश्वास की कमी झलकती है। १७ चैत्र को सचिवालय बैठक ने १२ वैशाख को शक्ति प्रदर्शन करने का निर्णय लिया। इस निर्णय के तहत २५ चैत्र को जिला स्तर पर कार्यकर्ता सभा और प्रशिक्षण, २८ चैत्र को नगरपालिका स्तर पर और ३ वैशाख को व ward स्‍तर पर बैठक आयोजित की जाएगी। ७ वैशाख को प्रदेश स्तरीय प्रदर्शन के बाद राजधानी में शक्ति प्रदर्शन होगा। ओली की गिरफ्तारी के एक माह बाद यह पहला उच्च स्तरीय प्रदर्शन होगा। एक नेता ने कहा, ‘हम इतिहास के सबसे बड़े संकट में हैं। जनता ने हमारा सम्मान खो दिया है। ऐसे समय में आवेशपूर्ण बयान से ज्यादा आत्ममंथन जरूरी है। जनता का विश्वास दोबारा जीतना और आगे बढ़ना ही पार्टी का एकमात्र विकल्प है।’ २१ फागुन के चुनाव में एमाले ने अभूतपूर्व कमजोर प्रदर्शन किया। ओली की गिरफ्तारी से संकट और बढ़ गया है तथा पार्टी के फैसलों में असंगतियों से समस्या झलकती है। इसी बीच विशेष महाधिवेशन की मांग को लेकर हस्ताक्षर अभियान भी शुरू हो चुका है। अभियानकारियों का तर्क है, ‘एमाले के संकट का समाधान सिर्फ सचिवालय या केन्द्रीय समिति नहीं कर सकती, विशेष महाधिवेशन बुलाना ही जरूरी है।’