
२५ चैत्र, काठमाडौं। आज सिंचाई दिवस तथा जलस्रोत तथा सिंचाई विभाग के स्थापना दिवस को ‘‘जलस्रोत का व्यवस्थित उपयोग, समृद्ध देश निर्माण में सहयोग’’ के नारों के साथ विविध कार्यक्रमों के माध्यम से मनाया जा रहा है। तत्कालीन सरकार ने २००९ साल में नहर विभाग की स्थापना कर कृषि भूमि में सिंचाई की शुरुआत की थी। इसी अवसर के संदर्भ में सरकार सिंचाई दिवस मनाती है। सिंचाई के संस्थागत विकासक्रम में नहर विभाग, सिंचाई एवं खानेपानी विभाग, सिंचाई तथा जलवायु विज्ञान विभाग से होते हुए २०४४ साल में सिंचाई विभाग बना। विसं २०७२ में संविधान लागू होने के बाद व्यवस्था के तहत सिंचाई विभाग और जल उत्पन्न प्रकोप प्रबंधन विभाग को समाप्त कर २०७५ साल में जलस्रोत तथा सिंचाई विभाग की स्थापना की गई।
नेपाल के इतिहास में पहली बार सरकारी स्तर पर १९७९ साल में ‘‘चन्द्र नहर’’ का निर्माण शुरू हुआ जो १९८५ साल में पूरा हुआ। इसे पहला आधुनिक और नेपाल का सबसे पुराना सिंचाई प्रणाली माना जाता है। तत्कालीन राणा प्रधानमंत्री चन्द्रशम्शेर जवराकी विशेष पहल से बने इस नहर का तकनीकी नेतृत्व शाही सेनाध्यक्ष डिल्लीजङ्ग थापाले किया था। जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (जाइका) की आर्थिक एवं तकनीकी सहायता से हाल ही में शताब्दी पूर्ण कर चुके इस नहर के ३२ प्रमुख संरचनाओं का पुनर्निर्माण एवं सुदृढ़ीकरण पूरा हुआ है।
उदैयपुर की त्रियुगा नदी मुख्य जल स्रोत मानी जाने वाली इस नहर के माध्यम से २८ किमी मुख्य नहर और ११ शाखा नहरों से सप्तरी जिले के १०,५०० हेक्टेयर जमीन में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। यहां से लगभग ३५,००० परिवारों के किसान लाभान्वित हुए हैं। वर्तमान में कृषि योग्य जमीन पर सिंचाई पहुंच बढ़ रही है, फिर भी लगभग १० लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई पहुंचाना एक बड़ी चुनौती बनती हुई दिख रही है। जलस्रोत तथा सिंचाई विभाग के महानिदेशक ई. मित्र बराल के अनुसार कुल सिंचाई योग्य क्षेत्र २५ लाख ३६ हजार हेक्टेयर में से लगभग १५ लाख ८७ हजार ९१० हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा पहुंच चुकी है। सतही, भूमिगत, जलाशय तथा लिफ्ट सिंचाई के माध्यम से सिंचाई किए गए क्षेत्रों में हेक्टेयर उत्पादन औसत में वृद्धि देखी जा रही है।
नेपाल में कृषियोग्य जमीन का कुल क्षेत्रफल ३५ लाख ५७ हजार ७०० हेक्टेयर है। बराल ने कहा, ‘‘नेपाल की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित है तथा लगभग ६२ प्रतिशत जनसंख्या सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि व्यवसाय में जुड़ी है। टिकाऊ, भरोसेमंद और प्रभावी सिंचाई प्रणाली के बिना कृषि आधुनिकीकरण, उत्पादन वृद्धि और खाद्य सुरक्षा संभव नहीं है। इसी को ध्यान में रखकर कृषि योग्य जमीन में सिंचाई सुविधा बढ़ाने के लिए विभाग उच्च प्राथमिकता के साथ कार्यरत है।’’
राष्ट्रीय गौरव के परियोजनाएं : तीव्र प्रगति
विभाग के अंतर्गत छह राष्ट्रीय गौरव की योजनाओं ने गति पकड़ी है और इन्हें समय पर पूरा करने पर विभाग विशेष ध्यान दे रहा है। ये योजनाएं हैं – महाकाली सिंचाई आयोजना (कञ्चनपुर), रानी जमरा कुलरिया सिंचाई आयोजना (कैलाली), बबई सिंचाई आयोजना (बर्दिया), भेरी बबई डायवर्सन बहुउद्देश्यीय आयोजना (सुर्खेत), सिक्टा सिंचाई योजना (बाँके) और सुनकोशी मरिन डायवर्सन बहुउद्देश्यीय आयोजना (सिन्धुली)। इस वित्तीय वर्ष में इनमें से तीन परियोजनाओं की प्रगति अच्छी रही है।
- सिक्टा सिंचाई योजना में अब तक २२,५०० हेक्टेयर में सिंचाई संरचनाओं का विस्तार हो चुका है और कुल सिंचाई क्षेत्रफल ४२,७६६ हेक्टेयर है।
- बबई सिंचाई योजना में २७,३३० हेक्टेयर में सिंचाई संरचना का विस्तार हुआ है और कुल ३६,००० हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई करने का लक्ष्य है।
- रानी जमरा कुलरिया योजना में १४,३०० हेक्टेयर में सिंचाई संरचना का विस्तार हो चुका है और कुल सिंचाई क्षेत्रफल ३८,३०० हेक्टेयर है।
महाकाली सिंचाई योजना के तीसरे चरण में भी प्रगति हुई है। महानिदेशक बराल ने बताया, ‘‘सुनकोशी मरिन डायवर्सन बहुउद्देश्यीय योजना और भेरी बबई डायवर्सन बहुउद्देश्यीय योजना भी जल्द प्रगति करेगी।’’
तराई मधेश भूमिगत जल सिंचाई कार्यक्रम
तराई और भीतरी मधेस के लगभग ३ लाख १८ हजार हेक्टेयर जमीन में भूमिगत जल सिंचाई तकनीक के जरिए सिंचाई सुविधा प्रदान करने के लिए विभाग यह कार्यक्रम चला रहा है। कृषि योग्य जमीन में भूमिगत सिंचाई प्रणाली विकसित करके कृषि उत्पादन बढ़ाना, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना, भुखमरी समाप्त करना और रोजगार सृजन करना इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य है। यह कार्यक्रम तराई मधेस के १९ जिलों सहित उदयपुर, मकवानपुर, सुर्खेत, चितवन, दाङ, इलाम और सिन्धुली जैसे पहाड़ी जिलों में भी लागू है। बराल ने कहा, ‘‘भूमिगत सिंचाई प्रणाली के संचालन में आवश्यक तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण उपभोक्ताओं को नियमित रूप से समस्या समाधान के लिए विभाग प्रयासरत है।’’
पिछले वर्ष वर्षा के दौरान मधेस प्रदेश में सूखे के समय विभाग ने तेजी से समस्या समाधान व धानबाली संरक्षण के लिए भूमिगत जल सिंचाई निरंतर जारी रखी। सरकार ने साउन ६ को मधेस प्रदेश को तीन महीने के लिए सूखा प्रभावित क्षेत्र घोषित किया था। खाद्य, पानी, सिंचाई एवं कृषि संबंधित समस्याओं की पहचान कर समाधान के लिए गठित कार्यदल की रिपोर्ट के आधार पर भूमिगत जल सिंचाई से संबंधित जरूरी कदम उठाए गए हैं।
जलस्रोत संरक्षण एवं प्रबंधन
जलस्रोत संरक्षण विभाग एकीकृत नदी बेसिन सिंचाई एवं जलस्रोत प्रबंधन कार्यक्रम संचालित कर रहा है, जिसका लक्ष्य २५ हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई करना है। विभाग जलस्रोत संरक्षण, नदी नियंत्रण और जल उत्पन्न प्रकोप प्रबंधन योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ा रहा है। महानिदेशक बराल के अनुसार, ‘‘निर्मित सिंचाई प्रणालियों में नहर संचालन तथा प्रबंधन भी किया जा रहा है।’’ विभाग अब तक १,४७७ किलोमीटर तटबन्ध, १३,६७१ हेक्टेयर भूमि उगास एवं ६३५ चेकडेम का निर्माण कर चुका है। बराल ने कहा, ‘‘जलस्रोत संरक्षण, नदी नियंत्रण तथा जल उत्पन्न प्रकोप प्रबंधन में गतिशील रूप से कार्य किया जा रहा है।’’





