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बालेन सरकार ने संविधान संशोधन के लिए ‘कठिन रास्ता’ चुना, सांसद न रहने प्रदेश संरचना समेत जटिल मुद्दे क्या हैं?

सरकार ने संविधान संशोधन के लिए बहस पत्र तैयार करने की प्रक्रिया बुधवार से औपचारिक रूप से शुरू की है। सरकार ने गठित संविधान संशोधन बहस पत्र सम्बन्धी कार्यदल की पहली बैठक कर इस प्रक्रिया की शुरुआत की है। लेकिन प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह बालेन के राजनीतिक सलाहकार असिम शाह की संयोजकता वाले कार्यदल की पहली बैठक में सदस्यों की आंशिक उपस्थिति ही रही। बैठक में शामिल होने के लिए राष्ट्रिय जनमोर्चा के महासचिव मनोज भट्ट काठमाण्डू आ रहे थे, पर वे नवलपरासी के दाउन्ने में ट्रैफिक जाम में फंस गए। उन्होंने कहा, “पहली बैठक में मैं पहुंच नहीं सका।” भट्ट न पहुंच पाने पर जनमोर्चा से दुर्गा पौडेल ने बैठक में भाग लिया। कार्यदल में प्रमुख विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस ने तो प्रतिनिधि ही नहीं भेजा है। कांग्रेस प्रवक्ता देवराज चालिसे ने कहा, “कुछ बातें स्पष्ट करना चाहते हैं, इसलिए सदस्य नहीं भेजे हैं। जब बातें स्पष्ट होंगी तब भाग लेंगे।” कांग्रेस अध्यक्ष गगनकुमार थापा ने पार्टी बैठक में पहले ही संविधान संशोधन सहित विषयों में सरकार की सहायता करने की तत्परता जताई है।

प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार निर्वाचन प्रणाली, प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी, पूर्ण समानुपातिक प्रतिनिधित्व, सांसद और मंत्री न होने की व्यवस्था, गैरदलीय स्थानीय सरकार और प्रदेश संरचना में सुधार जैसे विषयों पर चर्चा कार्यदल के लक्ष्य हैं। क्या सरकार जटिल विषयों में कदम रख रही है? कार्यदल के सदस्य जनमोर्चा के महासचिव भट्ट कहते हैं, “हम मुख्य रूप से प्रदेश संरचना की समाप्ति और स्थानीय तह के अधिकारों में वृद्धि पर जोर देंगे।” जनमोर्चा के साथ ही राष्ट्रिय प्रजातन्त्र पार्टी भी संघीयता को समाप्त करने के पक्ष में है। कार्यदल में आमंत्रित तराई के مرکزی दल संघीयता के कट्टर समर्थक हैं। नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी जैसे दल भी संघीयता के पक्ष में हैं।

सरकार का नेतृत्व करने वाली राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) प्रादेशिक संरचना में सुधार की मांग रखती आई है। उनके दस्तावेज़ों में शासकीय स्वरूप और निर्वाचन प्रणाली सुधार को मुख्यता दी गई है। इसलिए जनमोर्चा के महासचिव भट्ट संशोधन विषयों के इंसानुरूप खोज को जटिल मानते हैं। वे आगे बताते हैं, “रास्वपा और हम संघीयता खारिज करते हैं, प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी पर भी प्रमुख दलों में मतभेद है। इसलिए यह आसान नहीं है, जैसा वे प्रदर्शित कर रहे हैं।”

संविधान संशोधन के लिए राष्ट्रिय सभा में भी दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होता है। संशोधन विधेयक को संघीय संसद के दोनों सदनों में सक्रिय सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित करना संविधान में उल्लेखित है। राष्ट्रिय सभा में रास्वपा की उपस्थिति नहीं है। इसी तरह प्रदेश सम्बन्धी संशोधन के लिए प्रदेश सभा की सहमति जरूरी होती है। इसलिए अपनी गणितीय उपस्थिति और राजनीतिक कठिनाइयों को रास्वपा भी समझती है। कार्यदल के सदस्य और सांसद मोहनलाल आचार्य कहते हैं, “संविधान संशोधन के सभी विषय एक साथ खोले गए तो संविधान सभा ने संविधान बनाने में सात साल लगाए जैसे हमें भी अत्यंत कठिन और जटिल लगेगा।” वे जोड़ते हैं, “दल की धारणा एक जैसी नहीं है।”

सरकार ने चैती १३ को बैठक में स्वीकृति प्राप्त शासकीय सुधार से जुड़ी १०० कार्यसूची में कार्यदल गठन का बिंदु भी रखा है। इसमें “देश के दीर्घकालीन राजनीतिक एवं संस्थागत सुधार, निर्वाचन प्रणाली जैसे विषयों पर संविधान संशोधन हेतु राष्ट्रीय सहमति बनाने” के लिए कार्यदल बनाने का उल्लेख है। रास्वपा स्थापना से ही संविधान संशोधन का मुद्दा उठा रही है। २०७९ साल के आम चुनाव के वचनपत्र में प्रदेश की विशेषता अनुसार वहां अलग-अलग मंत्रालय होंगे, यह भी लिखा है। चितवन में कार्तिक २१-२२ को हुई केन्द्रीय समिति की विस्तारित बैठक में प्रस्तुत राजनीतिक रिपोर्ट में स्वतंत्र, गैरदलीय तथा प्रतिष्ठित व्यक्ति राष्ट्रपति के रूप में और राष्ट्रीय सभाध्यक्ष पदेन उपराष्ट्रपति के रूप में रहने का उल्लेख भी है। इसके साथ प्रत्यक्ष निर्वाचित प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री, और विशेषज्ञों को मंत्री बनाने की धारणा भी रास्वपा की है। रास्वपा ने अधिकार सम्पन्न स्थानीय सरकारों की संख्या ७५३ से घटाकर ५०० से कम करने का लक्ष्य रखा है। प्रदेश में सांसद न रहने की अवधारणा भी रास्वपा ने पेश की है। प्रदेश की पालिका सभाओं के सदस्यों में से समानुपातिक आधार पर चुनाव कर २० से ३५ सदस्यों वाली प्रदेश परिषद् गठन करने का प्रस्ताव रास्वपा ने पिछले आम चुनाव वचनपत्र में दिया था। परन्तु हाल के आम चुनाव वचनपत्र में ये विषय पहले जैसे खुल कर नहीं रखे गए हैं।