
समाचार सारांश
संपादकीय समीक्षा की गई।
- साल 2026 के अप्रैल में पश्चिम एशिया में युद्ध संकट के दौरान भारत की मध्यस्थता विफल रहने पर पाकिस्तान ने युद्धविराम कायम करने में निर्णायक भूमिका निभाई।
- प्रधानमंत्री मोदी के इजरायल दौरे और भारत-इजरायल के करीबी होने के कारण भारत की तटस्थता खत्म हुई और मध्यस्थता की विश्वसनीयता कमजोर हुई।
- विदेश मंत्री एस. जयशंकर द्वारा पाकिस्तान की मध्यस्थता पर ‘दलाल’ शब्द का प्रयोग विवाद का कारण बना और भारत की कूटनीतिक नीति अस्पष्ट दिखाई दी।
२६ चैत, काठमांडू। किसी भी राष्ट्र की कूटनीतिक परिपक्वता केवल कागज़ों में लिखे सिद्धांतों से नहीं, बल्कि संकट के समय लिए गए ठोस फैसलों और सक्रियता से मापी जाती है। वर्ष 2026 के अप्रैल माह ने भारत की कूटनीतिक क्षमता की कड़ी परीक्षा ली जहां वह अपेक्षाकृत असफल रहा।
उस समय पश्चिम एशिया एक बड़े युद्ध की कगार पर था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान पर सैन्य हमला करने की धमकी दी थी, जो हजारों साल पुरानी फारसी सभ्यता के विनाश का संकेत था।
ईरान ने ‘स्ट्रेट ऑफ होरमुद’ नामक मुख्य तेल मार्ग को बंद कर दिया, जिससे अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया। इस संकट में किसी देश को मध्यस्थता करनी जरूरी थी।
भारत के लिए यह वैश्विक मंच पर अपनी प्रभावशीलता दिखाने का सुनहरा अवसर था। अमेरिका के साथ गहरा रणनीतिक साझेदारी और ईरान के साथ मित्रता होने के कारण भारत के पास उच्चस्तरीय पहुंच थी।
भारत, जो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और ग्लोबल साउथ का निर्विवाद नेता बनने का प्रयासरत था, से निर्णायक भूमिका निभाने की उम्मीद थी। लेकिन यह अवसर खो गया और भारत की उपस्थिति पर प्रश्न उठे।
वहीं पाकिस्तान ने इस अवसर का कुशलतापूर्वक उपयोग किया। चरम आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और आंतरिक चुनौतियों के बीच भी पाकिस्तान ने महत्वपूर्ण कूटनीतिक भूमिका निभाई। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनिर ने सक्रिय कूटनीतिक प्रयास किए।
उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प को हमले से रोक दिया और ईरान का विश्वास भी कायम रखते हुए तनाव घटाया। परिणामस्वरूप दो सप्ताह का युद्धविराम संभव हुआ। ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से इसका श्रेय पाकिस्तान को दिया।
इस घटना ने भारत की विदेश नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। विश्वगुरु होने का दावा और कूटनीतिक वास्तविकता के बीच बड़ा अंतर स्पष्ट हुआ। संकट का सामना करने में असफल भारत सिर्फ नारों तक सीमित रह गया।
भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ नीति पर भी सवाल उठे। सभी पक्षों के साथ संबंध बनाए रखने का दावा करने के बावजूद अवसरवाद और सिद्धांतहीनता के आरोप लगे। पाकिस्तान की बड़ी कूटनीतिक सफलता के सामने भारत सिर्फ मूकदर्शक बना रहा, जिसने भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और क्षेत्रीय प्रभाव को चोट पहुंचाई।
पृष्ठभूमि
2025 के अंत से अमेरिका और इज़राइल के दबाव में 2026 फरवरी तक पूरी तरह युद्ध की स्थिति बन गई थी। ईरान ने मुख्य तेल मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होरमुद’ बंद कर दिया, जिससे विश्व के तेल आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ा।
ट्रम्प लगातार दबाव डाल रहे थे, लेकिन ईरान अडिग था। लेबनान में भी हिजबुल्लाह और इज़राइल के बीच युद्ध छिड़ चुका था। दुनिया बड़े ऊर्जा संकट और महायुद्ध के खतरे में थी।
7 अप्रैल 2026 को ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर लिखा, “आज रात एक सभ्यता का अंत होगा।” उन्होंने चेतावनी दी, “पूरे देश को एक रात में पूरी तरह तहस-नहस किया जा सकता है।”
यह केवल सैन्य धमकी नहीं, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी फारसी सभ्यता के विनाश का संकेत था। विश्व समुदाय ने कड़ी निंदा की, लेकिन ट्रम्प अपने निर्णय पर अडिग रहे।
ऐसे विकट समय में तटस्थ देश के रूप में भारत से मध्यस्थता कर महायुद्ध रोकने की उम्मीद थी, क्योंकि उस समय भारत सबसे उपयुक्त मध्यस्थ माना जाता था।
भारत क्यों?
इस गंभीर संकट में भारत सर्वश्रेष्ठ मध्यस्थकर्ता क्यों माना गया, इसके कई ठोस कारण थे:
अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ करीबी: भारत ‘क्वाड’ गठबंधन, ITU जैसे मंचों पर अमेरिका के साथ उच्च स्तर पर था। भारत को वाशिंगटन में सीधे पहुंच थी, जिससे वह अमेरिकी राष्ट्रपति पर प्रभाव डाल सकता था।
ईरान के साथ मित्रता: भारत-ईरान के बीच दशकों पुराना ऊर्जा, व्यापार और सांस्कृतिक संबंध था। चाबहार पोर्ट में बड़ा निवेश और भरोसेमंद मित्रता के कारण भारत की ईरान में पहुंच थी।
ग्लोबल साउथ नेतृत्व और आर्थिक प्रभाव: भारत G20 का सफल अध्यक्ष रह चुका था और विश्व की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में प्रभावशाली था।
अंतरराष्ट्रीय मान्यता: फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टुब से लेकर इज़राइली अधिकारियों ने भी भारत को संभावित मध्यस्थकर्ता के रूप में सुझाया था।
एसे कई मीडिया ने भारत को सबसे उपयुक्त भूमिका में बताया। परंतु जब भारत की सक्रियता सामने आई, तब ‘एशिया टाइम्स’ ने सवाल उठाया कि ‘ईरान युद्ध के मध्यस्थता मंच से भारत क्यों गायब हो गया?’
भारत की कूटनीतिक गलतियां
भारत ने यह अवसर खोया मुख्य रूप से इज़राइल के साथ असामान्य निकटता और इसके लिए त्यागी गई तटस्थता के कारण।
25-26 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री मोदी के इज़राइल दौरे और 27 फरवरी को द्विपक्षीय समझौतों ने भारत-इज़राइल संबंधों को ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ घोषित किया।
मोदी ने इज़राइली संसद ‘कनसेंट’ में भारत का पूर्ण समर्थन जताया, लेकिन यह दौरा युद्ध की घोषणा से 48 घंटे पहले था, जो भारत के झुकाव को इज़राइल-अमेरिका की ओर स्पष्ट करता था।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी ‘आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता’ की प्रतिबद्धता दोहराई, जिससे मानवीय संवेदनशीलता की अनदेखी हुई। नतीजा रहा कि भारत ईरान-इज़राइल युद्ध में मध्यस्थता की भूमिका से दूर हो गया।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इसे भारत की कूटनीतिक असफलता बताया। ‘द डिप्लोमेट’ ने मोदी को इज़राइल-अमेरिका खेमे में स्पष्ट रूप से खड़ा बताया। ‘ब्लूमबर्ग’ ने भारत की मूकता और इज़राइल दौरे को ‘अनौपचारिक समर्थन’ का संदेश माना।
‘द फेडरल’ ने लिखा, ‘अमेरिका और इज़राइल के साथ घनिष्ठता ने भारत की तटस्थ मध्यस्थता क्षमता को जटिल बनाया।’ विशेषज्ञ आफताब कमाल पासा ने कहा, ‘भारत ने अवसर गंवाया, अब उसकी विश्वसनीयता नहीं रही।’
मोदी सरकार की इज़राइल-केंद्रित नीति रणनीतिक प्राथमिकता तो साबित हुई, लेकिन इसकी बड़ी कीमत तटस्थता का नुकसान रही। कूटनीतिक सिद्धांत के अनुसार, बिना तटस्थता के मध्यस्थता असंभव है।
जयशंकर की ‘दलाल’ टिप्पणी
विदेश मंत्री एस. जयशंकर की विवादित टिप्पणी भारत की दूसरी बड़ी कूटनीतिक कमजोरी मानी गई। 25 मार्च 2026 को सर्वदलीय बैठक में पाकिस्तान की मध्यस्थता पर प्रश्न आने पर उन्होंने कहा, ‘हम दलाली नहीं करते। भारत दलाल राष्ट्र नहीं है।’
इस टिप्पणी से व्यापक विवाद और आलोचना हुई। विपक्षी कांग्रेस ने इसे ‘स्व-घोषित विश्वगुरु के लिए शर्म की बात’ बताया। द हिन्दू ने विरोध में लिखा कि ‘स्व-घोषित विश्वगुरु की असफलता से पाकिस्तान मध्यस्थकर्ता बन गया है।’
जयशंकर ने पाकिस्तान को ‘दलाल’ कहा, जबकि पाकिस्तान की मध्यस्थता की भूमिका विश्व स्तर पर प्रशंसित हुई, जिससे उनकी टिप्पणी विडंबना बन गई।
भारत की अस्पष्ट नीति
भारत की राजनीतिक असफलता का एक अन्य कारण उसकी ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ नीति है। किसी पक्ष का समर्थन किए बिना सभी के साथ संबंध बनाए रखने की नीति व्यवहार में असफल साबित हुई।
भारत अमेरिकी नेतृत्व वाले ‘क्वाड’, इज़राइल शामिल ‘ITU’, और रूस-चीन के ‘SCO’ में सक्रिय था, लेकिन व्यवहार में तटस्थ नहीं दिखा। इससे यह संदेश गया कि भारत संकट के समय किसी पक्ष के साथ दृढ़ता से खड़ा नहीं हो पाया, जिसने उसकी विश्वसनीयता खोई।

अनेकों अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भारत की भूमिका की कड़ी आलोचना की। ‘द डिप्लोमेट’ के विशेषज्ञ भरत भूषण ने कहा कि इज़राइल का समर्थन भारत की कद-काठी को घटाता है और नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाता है।
सक्रिय कूटनीतिक अभाव
भारत की प्रमुख कमजोरी सक्रिय कूटनीतिक पहल का अभाव थी। पाकिस्तान मार्च 2026 से कूटनीतिक अभियान चला रहा था, जबकि भारत निष्क्रिय दिखाई दिया।
पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में मिस्र, सऊदी अरब और तुर्की के विदेश मंत्रियों के साथ बैठक करके ‘इस्लामवाद एकॉर्ड’ तैयार किया। सेना प्रमुख मुनिर ने दोनों पक्षों से संपर्क बनाए रखा।
लेकिन भारत ने उस बड़े संकट में केवल अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ सामान्य फोन कॉल किया। यह निष्क्रियता रणनीतिक भूल मानी गई। पाकिस्तान फेल होगा यह धारणा के कारण भारत ने अपने प्रभाव और अवसर खो दिए।
ईरान के साथ जमी ठंड
प्रधानमंत्री मोदी के इज़राइल दौरे ने भारत-ईरान संबंध मात्र खराब नहीं किए, बल्कि दशकों पुरानी कूटनीतिक विश्वसनीयता को भी चोट पहुंचाई।
भारत ने अमेरिकी दबाव में ईरानी तेल आयात घटाया और अप्रैल 2025 में वैकल्पिक आपूर्ति योजना घोषित की, जिससे ईरान आर्थिक व कूटनीतिक रूप से अलग हो गया।
ईरानी विदेश मंत्री जवाद ज़रिफ के पाकिस्तान दौरे ने दक्षिण एशियाई कूटनीति में नया मोड़ दिया। भारत के विकसित चाबहार बंदरगाह को पाकिस्तान के Gwadar से जोड़ने का प्रस्ताव आया, जो भारत के लिए बड़ा झटका था।
भारत की अस्पष्ट नीति ने ईरान को पाकिस्तान की ओर झुकाया और इससे भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता और क्षेत्रीय प्रभाव पर सवाल उठे।
कूटनीतिक प्रासंगिकता में कमी
विकासशील देशों की आवाज होने का दावा करने वाला भारत पश्चिम एशिया के संकट में तटस्थ नहीं रहा और इज़राइल का समर्थन करके विश्व दक्षिण के देशों में अपनी छवि कमजोर कर बैठा।
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह खामेनई के निधन पर भारत ने शोक प्रकट करने में पांच दिन की देरी की, जिससे पड़ोसी देशों में आलोचना हुई।
भारत दुनिया के मंच पर अकेलापन महसूस कर रहा है। ब्रिक्स और शंघाई सहयोग (SCO) जैसे समूहों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इज़राइल पर हुए हमले की निंदा न करने के कारण अरब और अफ्रीकी देशों ने भारत की नैतिक नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाए हैं।
विदेश मंत्री जयशंकर ने सभी के साथ मित्रता बनाए रखने का सिद्धांत जताया, पर व्यवहार में यह नीति अब ‘व्यापारिक अलगाव’ जैसी लग रही है, जिससे भारत की कूटनीतिक प्रासंगिकता घट रही है।





