
सरकार ने २०७८ साल से ४० माइक्रोन से पतले प्लास्टिक थैलों के उत्पादन, आयात, बिक्री वितरण और उपयोग पर पूर्णतः प्रतिबंध लगा रखा है। हालांकि, प्लास्टिक थैला प्रतिबंध के क्रियान्वयन में असफलता के मुख्य कारण पर्याप्त आंकड़ों का अभाव, निगरानी की कमी और सस्ते विकल्पों की अनुपलब्धता बताए गए हैं। नई निर्देशिका में उत्पादकों की जिम्मेदारी, प्लास्टिक थैलों पर स्पष्ट छपाई और स्रोत पर सख्ती लागू करने का प्रावधान किया गया है। २६ चैत्र, काठमांडू।
उपभोक्ता जब आधा किलो आलू, एक पाव मिर्च या एक मुठ्ठी साग खरीदते हैं तो दुकानदार उन तीनों सब्ज़ियों को तीन अलग-अलग पतले प्लास्टिक थैलों में देते हैं। यह दृश्य नेपाल के किसी भी शहर या गाँव के लिए आम बात है। लेकिन सिंहदरबार के दराज़ में सड़ रही सरकारी फाइलें बताती हैं कि ये पतले प्लास्टिक थैले वर्षों से ‘गैरकानूनी’ और ‘प्रतिबंधित’ हैं। सरकार ने बार-बार प्लास्टिक थैला प्रतिबंध की घोषणाएं की हैं, लेकिन क्रियान्वयन में हमेशा कठिनाइयाँ रही हैं।
फिलहाल पुनः प्लास्टिक प्रतिबंध का मुद्दा चर्चा में आया है। आर्थिक वर्ष २०७८/७९ में संघीय सरकार ने बजट के माध्यम से १ साउन २०७८ से ४० माइक्रोन से पतले प्लास्टिक थैलों के उत्पादन, आयात, बिक्री वितरण और उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी। इसके तहत शॉपिंग मॉल और डिपार्टमेंटल स्टोरों में प्लास्टिक थैले की जगह सूती, जूट या कागज के थैलों के उपयोग को अनिवार्य करने की व्यवस्था बनाई गई है।
नई निर्देशिका में प्लास्टिक थैलों की मोटाई, आकार, रंग और उत्पादक की जिम्मेदारी को विस्तार से स्पष्ट किया गया है। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ४० माइक्रोन से कम मोटाई वाले किसी भी प्लास्टिक थैले का उत्पादन, आयात, भंडारण, बिक्री वितरण और उपयोग पूर्णतया प्रतिबंधित रहेगा। लेकिन आम नागरिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के मन में एक ही सवाल है – क्या यह निर्देशिका भी पहले की तरह केवल ‘कागजी आदेश’ बनकर रह जाएगी, या वास्तव में यह बाजार को प्लास्टिक मुक्त बनाएगी?





