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देशभर जमीन से जुड़ी पास और नापी में बिचौलियाओं का नियंत्रण, बिना लेखापढ़ी सेवा सम्भव नहीं

सरकार मालपोत कार्यालय में बिचौलियाओं की सक्रियता और अनावश्यक शुल्क वसूलने वाले व्यक्तियों की गिरफ्तारी कर रही है। मालपोत कार्यालय में कार्यरत लेखापढ़ी व्यवसायी सरकारी एजेंसियों से लाइसेंस लेकर बिचौलियाओं का कार्य कर रहे हैं। डोल्मा प्रणाली ने मालपोत सेवाओं तक आम जनता की पहुँच कठिन बना दी है और लेखापढ़ी की सहायता आवश्यक हो गई है।

२६ चैत, काठमांडू। सरकार ने हाल के दिनों में मालपोत कार्यालय में बिचौलियाओं के काम करने और आम सेवाग्राहियों से अनावश्यक शुल्क वसूलने वाले लोगों को गिरफ्तार कर रहा है। इस बाबत भूसेवा सञ्चालन केन्द्र के संचालक, अर्थात मालपोत कार्यालय में लेखापढ़ी करने वाले लोग पुलिस की गिरफ्त में हैं। लेखापढ़ी व्यवसायी मालपोत और अन्य सरकारी कार्यालयों में बिचौलियाओं की भूमिका निभा रहे हैं। वे सरकारी निकाय से लाइसेंस लेकर आम जनता को अनावश्यक परेशान करते हैं, अतिरिक्त शुल्क लेते हैं और कर्मचारी को देने के नाम पर खर्च उठाते हैं, जिसके चलते पुलिस ने कार्रवाई तेज कर दी है।

सहायक के नाम पर कर्मचारी-विवादग्राही के बीच सीधे संपर्क न होने देने और अतिरिक्त शुल्क वसूलने का काम नया नहीं है। जनआन्दोलन के बाद बहुमत वाली सरकार ने सार्वजनिक सेवा को प्रभावी बनाने के अभियान के तहत बिचौलियाओं के खिलाफ कार्रवाई तेज की है। नेपाल लेखापढ़ी कानूनी व्यवसायी एसोसिएशन पाटन इकाई ने भी इसका विरोध किया है। बावजूद इसके, उन्हीं बिचौलियाओं के कारण मालपोत कार्यालय में सीधे सेवा लेना संभव नहीं हो पा रहा। घर-जमीन खरीद-फरोख्त व नाप-तौल जैसे कार्यों के लिए मालपोत कार्यालय के आसपास लेखापढ़ी के कार्यालयों तक जाना पड़ता है। बिना लेखापढ़ी योगदान के कर्मचारी काम नहीं करते।

मालपोत कार्यालय से जुड़े कामों में डोल्मा नामक प्रणाली का उपयोग हो रहा है। इस प्रणाली में आम जनता की सीधे पहुंच नहीं है और प्रक्रिया को जटिल बनाया गया है, जिससे लेखापढ़ी की मदद आवश्यक हो गई है। यही लोग इस प्रणाली का उपयोग करते हैं और मालपोत से जुड़े काम केवल इसी के माध्यम से शुरू होते हैं। यह ऑनलाइन प्रणाली पूरे देश के मालपोत कार्यालयों में उपलब्ध है, फिर भी आम लोगों के लिए इसे स्वयं उपयोग करना मुश्किल है क्योंकि कर्मचारी ऐसे प्रयासों को स्वीकार नहीं करते।

लेखापढ़ी की अनुमति केवल मालपोत कार्यालय ही देता है, इसके बाद ही काम आगे बढ़ सकता है। जनआन्दोलन के बाद बनी सरकार के भूमिसंबंधी मंत्री कुमार इङनाम ने सार्वजनिक रूप से कर्मचारियों को भ्रष्ट बताते हुए मालपोत में भ्रष्टाचार और अनियमितता की शिकायत की थी। उन्होंने कहा था, “वडा कार्यालय में तमसुक होने पर जमीन पास होती है और जब कर्मचारी ही काम करते हैं तो राज्य में परिवर्तन संभव है।”

“मालपोत के अधिकारी और कर्मचारी सीधे पैसे नहीं मांगते। मैंने राजस्व चुकाने के बाद भूसेवा केन्द्र में पांच हजार रुपये दिए हैं,” उन्होंने बताया। जनआन्दोलन के दौरान हुई आगजनी के बावजूद चाबहिल मालपोत में लेखापढ़ी व्यवसायी से मासिक २४ लाख रुपये की वसूली की गई, जिसके लिए मंत्री ने कार्रवाई शुरू की थी।

घर-जमीन के लेनदेन में सेवाग्राहियों के लिए प्रक्रिया स्वयं संचालित करना आसान नहीं है, काठमांडू मनमैजु मालपोत कार्यालय के एक कर्मचारी ने कहा, “सेवाग्राही बिना लेखापढ़ी के काम नहीं कर सकते, इसलिए यह अनिवार्य हो गया है।” डिल्लीबजार मालपोत कार्यालय में भी सेवाग्राही स्वयं काम नहीं कर पाते, इसलिए सभी लेखापढ़ी की सहायता लेते हैं।

लेखापढ़ी की अनुमति संबंधित मालपोत कार्यालय से ही प्राप्त होती है और भूसेवा केन्द्र निर्देशिका २०७५ के अनुसार भूमी व्यवस्था तथा अभिलेख विभाग उसकी मंजूरी जारी करता है। व्यक्ति के लिए अनुमति शुल्क तीन हजार और संस्था के लिए पांच हजार रुपये है। सेवा संचालन के लिए व्यक्ति को ५० हजार रुपये और संस्था को दो लाख रुपये की सुरक्षा राशि जमा करनी होती है। ये अनुमतियां वार्षिक नवीनीकरण के अधीन होती हैं और इसके लिए उचित भुगतान अनिवार्य है।

यह प्रक्रिया भू-जानकारी प्रणाली के शुल्क भी शामिल करती है और यह साबित होता है कि राज्य जमीन कारोबार में शुल्क लेकर बिचौलियों को प्रवेश दे रहा है। पहले लेखापढ़ी कहलाने वाले पेशे को अब भूसेवा केन्द्र के रूप में नामित किया गया है। मालपोत कार्यालय डिजिटल तो हैं, लेकिन सेवाग्राही और सेवा प्रदाता के बीच संपर्क लेखापढ़ी अर्थात भूसेवा केन्द्र के माध्यम से ही होता है। जमीन की लेन-देन में सरकार की भूमिका मुख्य रूप से साक्षी की होती है, पूर्व सचिव गोपीनाथ मैनाली ने बताया। “मालपोत प्रमाणित करता है लेकिन बाद में नापी जमीन का किस्मांकन करता है,” उन्होंने बताया।

“मालपोत में नापी होने के बावजूद गड़बड़ी ज्यादा है, इसलिए बिना निवेश के २०७५ में सामाजिक ऑनलाइन प्रणाली लागू करने का निर्णय लिया गया। पब्लिक एक्सेस मॉडल से सीधे भूमि और वडा कार्यालय का नाम दिखाई देता है। नापी को किट्टाकाट का कार्य थैली (ड्राफ्ट) बनाकर करना होता है,” मैनाली ने कहा। तत्कालीन मंत्रिपरिषद के निर्णय के खिलाफ लेखनदासों को सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम आदेश मिला था। “आखिरकार सरकार ने मामला जीत लिया, लेकिन मालपोत प्रशासन ने अभी तक स्वीकार नहीं किया है,” उन्होंने जोड़ा। मैनाली ने ये बातें पूर्व मंत्री कुमार इङनाम से जुड़े विषय पर भी साझा कीं।

जमीन लेनदेन होने वाले इलाकों में कर्मचारी व बिचौलियाओं के बीच गहरा संबंध या नेटवर्क है, मैनाली ने बताया। यही नेटवर्क खत्म करने में पूर्व प्रधानमंत्रियों भी असफल रहे। प्रधानमंत्री की अनिच्छा के कारण वर्तमान स्थिति बनी है। “प्रणाली को प्रभावी लागू करने के लिए मालपोत क्षेत्र के कर्मचारियों में बदलाव जरूरी था। मैंने २०० शाखा अधिकृत, ५० उपसचिव और २ सहसचिव की मांग की थी,” मैनाली ने बताया। “पर प्रधानमंत्री ने इसे स्वीकार नहीं किया, मेरा प्रस्ताव अनसुना किया गया।” मालपोत, जमीन प्रशासन और गुठी विभाग में कुछ ही कर्मचारी अच्छे हैं, मैनाली ने कहा। “अभी भी सुधार की मांग करने पर भी परेशानी होती है। सुधार जरूरी है, अन्यथा मालपोत की जाल में फंसे रहेंगे,” उन्होंने चेतावनी दी। उनका मानना है कि सुधार २००८ साल से अब तक नहीं हो पाया है। मैनाली ने सुझाव दिया कि नापी को ऑटोमेटिक प्रणाली अपनानी चाहिए।

मालपोत क्षेत्र में ‘सहजकर्ता’ के नाम पर बिचौलियों का प्रवेश होने से राज्य और सेवाग्राही दोनों ठगे जाते हैं, मैनाली ने कहा। इसलिए वे मानते हैं कि राजस्व प्रवाह को बढ़ाने और सेवाग्राहियों को सहज, सुलभ सेवा देने के लिए मालपोत में सहजकर्ता की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।