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भक्तपुर में प्रसिद्ध बिस्का जात्रा आज से शुरू

भक्तपुर में आज से प्रसिद्ध बिस्का जात्रा शुरू हो रहा है। यह जात्रा भक्तपुर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्ता को दर्शाती है तथा लिच्छविकाल से चली आ रही मानी जाती है। बिस्का जात्रा नौ दिन आठ रात तक चलने के कारण सुरक्षा व्यवस्था सख्त की गई है। २७ चैत, काठमाडौं। भक्तपुर में नौ दिन आठ रात मनाई जाने वाली प्रसिद्ध बिस्का जात्रा आज से शुरू हो रही है। यह जात्रा नेपाली नया वर्ष वैशाख १ से चार दिन पहले भैरव और भद्रकाली के रथ खींचे जाने के साथ शुरू होकर वैशाख ५ को समाप्त होती है। भक्तपुर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण यह बिस्का जात्रा लिच्छविकाल से निरंतर होने वाली परंपरा है।

जात्रा तौमढी (पाँचतले मन्दिर के सामने) से भैरव और भद्रकाली के रथ खींच कर प्रारंभ होती है, और नौ दिन तक विभिन्न जात्रा और कार्यक्रम आयोजित होते हैं। पहले दिन पाँचतल्ले मन्दिर प्रांगण से भैलख को क्वने और थने के लोग साथ लेकर आगे पाँच और पीछे चार रस्सियाँ लेकर अपने-अपने मोहल्लों की ओर ले जाते हैं। जात्रा का मुख्य आकर्षण यही भैलखः खींचना होता है। जात्रा में भैलखः खींचने का मार्ग क्वने राज्य की ओर तमारी, बुलुँचा, घट्खा, नासमना, मुलाखु, वंशगोपाल और तेखापुखुसम्म तथा थने राज्य की ओर क्वाछें, साकोठा, सुकुलढोका, गोमारी, इनाचो और दत्तात्रय तक फैला है।

जात्रा का दूसरा दिन शून्य माना जाता है। तीसरे दिन गःहिटी में भैरवनाथ को बैल की बलि दी जाती है और गुठी संस्थान द्वारा सरकारी पूजा की जाती है। बलि पूजा का मांस प्रसाद के रूप में लाकुलाछेवासी को वितरित किया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘स्याःक्वःत्याःक्वः’ कहा जाता है। जात्रा के चौथे दिन सुबह तालाक्व स्थित कुमाले मोहल्ले में ल्हामरु म्ह यसींद्यो (हाथ नहीं वाले लंबा लिंगो) खड़ा किया जाता है, जबकि शाम को तांत्रिक विधि से दशकर्म विधि कर ५५ हाथ लंबा यसींद्योः भेलुखेल स्थित ल्यसिङखेल में लगाया जाता है। यसींद्योः लगाने की परंपरा बिस्का जात्रा की एक और बड़ी खासियत है।

यसींद्योः लगाए जाने वाली रात नवदुर्गा देवता वहां उपस्थित हो कर तलेजु में दुमाजु की विशेष पूजा करते हैं। यसींद्योः लगाए जाते ही स्थानीय बाराही देवी की तिंप्वाः जात्रा तथा इन्द्रायणी देवी की त्वारिवा जात्रा मनाई जाती है। बिस्का जात्रा के पांचवें दिन अर्थात् नए वर्ष वैशाख १ की सुबह से ही चुपिङघाट और ल्यसिङखेल में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी है। इस दिन मोहल्ला-मोहल्ला विभिन्न बाजे बजाकर पारंपरिक पोशाक में भैरव, भद्रकाली, बेताल और यसींद्योः के दर्शन एवं पूजा की जाती है।

जात्रा के छठे दिन महाकाली और महालक्ष्मी की जात्रा मनाई जाती है। सातवें दिन तचपाल में ब्रह्मायणी और महेश्वरी की जात्रा आयोजित होती है। उसी दिन तालाक्व में बटुकभैरव और ज्याठा गणेश की सिंदूर जात्रा तथा खँला में परदेशी भीमसेन की खटजात्रा होती है। आठवें दिन भक्तपुर के शक्तिशाली देव-देवियों को उनके द्यो छें से निकाल कर प्रांगण, सतल और पाटी में रखकर पूजा की जाती है और विविध प्रसाद अर्पित कर द्यो स्वगं पूजा (सगुन जात्रा) मनाई जाती है। जात्रा के अंतिम दिन सुबह तालाक्व स्थित कुमाले मोहल्ले में ल्हामरु म्ह यसींद्यो (हाथ नहीं वाला लिंगो) हटाने की जात्रा आयोजित होती है।