ज्ञानेन्द्र शाह का नया वर्ष अपील: सभी पक्षों की मांगों को समेटते संवैधानिक समाधान खोजने का अनुरोध

पूर्वराजा ज्ञानेन्द्र शाह ने नए वर्ष २०८३ के अवसर पर सभी पक्षों से संवैधानिक समाधान खोजने में देरी न करने तथा दृढ़ संकल्प बनने का आवाहन किया है। उन्होंने कहा है कि निषेध, विभाजन, बंद और विद्रोह से देश कमजोर होगा और राजनीति में परस्पर राग, द्वेष और प्रतिशोध की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। पूर्वराजा ने बताया कि राजनीति और शासन प्रणाली में केवल औपचारिक परिवर्तन हुए हैं और देश एक प्रयोगशाला की तरह बना हुआ है। ३० चैत्र, काठमांडू। पूर्वराजा ज्ञानेन्द्र शाह ने सभी पक्षों से आग्रह किया है कि संवैधानिक समाधान खोजने में विलंब न करें। उन्होंने सोमवार को नए वर्ष २०८३ की शुभकामनाओं के संदेश में स्पष्ट किया कि निषेध, राग और विभाजन जैसी राजनीति देश के लिए हानिकारक है। उन्हों ने कहा, “निषेध, फुट, बंद और विद्रोह से हम कमजोर होते हैं। परस्पर राग, द्वेष, प्रतिशोध राजनीति में नहीं होना चाहिए। जनचाहना को ध्यान में रखते हुए देश की भलाई को केंद्र में रखकर कदम आगे बढ़ाने में विलंब न करें। संवाद, सहमति और सहयोग से सभी पक्षों की मांगों को समाहित करते हुए संवैधानिक समाधान खोजने के लिए दृढ़ संकल्प बनाएं।” उन्होंने कहा कि राजनीति, राज्य व्यवस्था और प्रशासन प्रणाली में भले ही कई बदलाव हुए हों, लेकिन वे केवल औपचारिक परिवर्तन थे। देश को प्रयोगशाला की तरह देखे जाने और राष्ट्र निर्माण में पिछड़ने की बात भी उन्होंने कही। “राजनीति, राज्य व्यवस्था और प्रशासन प्रणाली में हमने कई परिवर्तन देखें, लेकिन वे केवल औपचारिक थे,” पूर्वराजा शाह ने कहा, “दलदल में उलझ कर हम बहुत पीछे रह गए हैं। लेकिन राष्ट्र की समृद्धि में काफी पिछड़ गए हैं। हमेशा प्रयोग, अभ्यास और विकल्प की तलाश में लगे रहे। नतीजतन हमारा देश केवल एक प्रयोगशाला बन गया।” नए वर्ष की पूर्वसंध्या पर ज्ञानेन्द्र शाह ने अपने संबोधन में कहा – “प्रिय नेपाली दाइबहिन तथा दाजुभाइ, हम नए वर्ष २०८३ में प्रवेश कर चुके हैं। इस पवित्र अवसर पर देश और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले सभी नेपाली भाइयों-बहनों को सुख और शांति की शुभकामनाएं देता हूँ। समय के प्रवाह के साथ देश और समाज को प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ना होगा। पिछले दोषों और कमियों को सुधारते हुए बाधाओं को हटाकर हम उच्चतम लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए तभी नववर्ष का सार्थक अर्थ होगा।” उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में विकास की दृष्टि से देश लगातार गिर रहा है। उन्होंने कहा कि राजनीति, राज्य व्यवस्था और शासन प्रशासन के क्षेत्र में काफी बदलाव हुए हैं, लेकिन केवल औपचारिक परिवर्तन ही हुए हैं। दलदल की स्थिति के बीच देश की समृद्धि और विकास में पीछे रहना निराशाजनक है। हमेशा प्रयोग और बदलाव की खोज जारी रही लेकिन असली स्थिरता नहीं आई। विधि, व्यवस्था या व्यक्तियों का परिवर्तन ही समस्या का समाधान नहीं है, यह बात हमें अनुभव से सीखनी होगी। उन्होंने युवा पीढ़ी की राजनीति और प्रशासन में बढ़ती भागीदारी को उत्साहजनक बताया और कहा कि शिक्षित और समर्पित युवा आने वाले समय में राष्ट्र के लिए फायदेमंद साबित होंगे। उन्होंने देश के समक्ष बहुमुखी समस्याओं को बताते हुए कहा कि आर्थिक स्थिति को सुधारने, पड़ोसी और मित्र देशों के साथ सहयोग बढ़ाने तथा आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की आवश्यकता है। नए वर्ष में जीवन सुरक्षा, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता और हक-हक़ूक की सुनिश्चितता हेतु सुरक्षा निकायों को चुस्त-दुरुस्त बनाने की रूपरेखा बनानी होगी। वर्तमान अस्थिर और अशांत विश्व में हमें अपनी सुरक्षा और उत्पादन की मजबूती पर गहरा ध्यान देना जरूरी है, ताकि आम नागरिक किसी प्रकार की शारीरिक, मानसिक या भौतिक कठिनाई न झेले। सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बढ़ाकर देश को मजबूत बनाना होगा। देश की समृद्धि उसके संसाधनों के सही उपयोग और संस्कृति की रक्षा में निहित है, इसलिए हमें इन मूलभूत कर्तव्यों को बखूबी निभाना होगा। पूर्वराजा शाह ने फिर पुनः कहा कि निषेध, विभाजन, बंद और विद्रोह से देश कमजोर होता है, इसलिए ऐसे कार्य राजनीति में जगह नहीं होने चाहिए। उन्होंने बताया कि संवाद, सहमति और सहयोग से सभी पक्षों की मांगों को संवैधानिक समाधान में जोड़ते हुए देश के हित में कदम बढ़ाने का समय है। उन्होंने कामना की कि नेपाल शांति और उन्नति का देश बने, जो अपनी सांस्कृतिक पहचान और गौरव से विकसित हो। सभी नेपाली न्याय, शांति और खुशहाली प्राप्त करें, यही हमारी सर्वोच्च आकांक्षा है। श्री पशुपतिनाथ सभी का कल्याण करें। जय नेपाल।





