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दलित कोटे में गैरदलित सिफारिश के आरोप पर मामला सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन

गण्डकी प्रदेश लोक सेवा आयोग पर दलित कोटे में गैरदलित उम्मीदवार को सिफारिश करने के आरोप के साथ मामला सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन है। राष्ट्रीय दलित आयोग ने दलित सूची से कुछ जाति/थरों को हटाकर प्रमाणपत्र रद्द करने हेतु सातों प्रदेश लोक सेवा आयोगों को पत्र भेजा है। मामला सर्वोच्च अदालत में होने के कारण अंतिम निर्णय वहीं से आने की उम्मीद है और दलित कोटे की प्रमाणिकता विवादित बनी हुई है। २ वैशाख, काठमाडौं।

लोक सेवा आयोग के तहत स्वास्थ्य सेवा, हेल्थ इन्स्पेक्शन समूह के पाँचवें स्तर के हेल्थ असिस्टेंट (एचए) पद के एक परिणाम पर विवाद उत्पन्न हुआ है। दलित कोटे में गैरदलित को उत्तीर्ण कर सिफारिश करने के आरोप के चलते मामला सर्वोच्च अदालत पहुंचा और नियुक्ति विवादित हो गई। गण्डकी प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा ३ असार को प्रकाशित परिणाम के अनुसार, पर्सा के मुकेश सहनी मलाह दलित कोटे से उत्तीर्ण होकर पर्वत के महाशिला गाउँपालिका के लिए सिफारिश किए गए थे।

लेकिन उसी पद की वैकल्पिक सूची में पहले स्थान पर रहने वाले सप्तरी के तिरहुत गाउँपालिका-२ के देवकृष्ण मंडल ने इस सिफारिश को नियमों के खिलाफ बताते हुए न्याय पाने के लिए विभिन्न संस्थाओं से संपर्क किया है। देवकृष्ण ने दलित कोटे में गैरदलित सिफारिश किए जाने के खिलाफ राष्ट्रीय दलित आयोग, लोक सेवा आयोग और गृह मंत्रालय तक लिखित आवेदन दिया है। उनका मामला लगभग ८ माह से सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन है।

इस बीच, राष्ट्रीय दलित आयोग ने २०७९ वैशाख १० को देश के सभी सात प्रदेश लोक सेवा आयोगों को “अत्यंत आवश्यक” बताते हुए पत्र भेजा था। आयोग ने २०७८ असार २९ की बैठक में तराई-मधेशी समुदाय में आने वाली पटवा, चिट्लार, विन, मुखिया, मलाह (सहनी), लोहार और गोढिया जाति/थरों को दलित सूची से हटाने का निर्णय लिया। पत्र में कहा गया कि इन जाति/थरों के द्वारा प्राप्त दलित प्रमाणपत्र रद्द किए जाएं और दलित कोटे में गैरदलित समुदाय के लोगों की सिफारिश न हो, इसके लिए संबंधित संस्थाओं को निर्देश दिया जाए।

आयोग के अनुसार, कुछ जिला प्रशासन कार्यालयों ने उक्त थरों को दलित के रूप में प्रमाणपत्र जारी किए हैं, जिसके आधार पर लोक सेवा आयोग के परीक्षा में दलित कोटे से भाग लेकर सिफारिश भी हुई है, इस संबंध में शिकायत आयोग को मिली है। आयोग को आशंका है कि कुछ लोग उन प्रमाणपत्रों का उपयोग कर सामाजिक सुरक्षा भत्ते भी ले रहे होंगे। इसी संदर्भ में आयोग ने गृह मंत्रालय, संघीय मामिला तथा सामान्य प्रशासन मंत्रालय, लोक सेवा आयोग और प्रदेश लोक सेवा आयोगों को पत्राचार कर कहा है कि संबंधित प्रमाणपत्र रद्द करें तथा दलित कोटे में गैरदलित समुदाय के लोगों की सिफारिश न हो, उसकी व्यवस्था करें।

देवकृष्ण मंडल द्वारा आवेदन करने के बाद राष्ट्रीय दलित आयोग ने २ साउन को गण्डकी प्रदेश लोक सेवा आयोग से अतिरिक्त स्पष्टीकरण मांगते हुए पत्र भेजा था। जवाब में आयोग ने छह दिन बाद भेजे गए पत्र में स्पष्ट किया कि मुकेश सहनी ने न्यूनतम योग्यता के दस्तावेज और पर्सा जिला प्रशासन कार्यालय से जारी दलित प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया था, इसलिए आवेदन स्वीकार किया गया और परीक्षा की पूरी प्रक्रिया पूरी कर उत्तीर्ण होने के बाद सिफारिश की गई। दलित कोटे की प्रमाणिकता और जातीय सूची पर स्पष्टता नहीं होने के कारण विवाद उत्पन्न हुआ है। मामला सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन होने के कारण अंतिम निर्णय वहीं से आने की संभावना बनी हुई है।

मंडल ने कहा, ‘मैं अन्याय के शिकार महसूस करता हूं। आठ महीनों से विभिन्न संस्थाओं के पास गुहार लगा रहा हूं। सर्वोच्च अदालत बार-बार मेरी समय सीमा बढ़ा रही है। दलित के नाम पर गैरदलित को सुविधा नहीं मिलनी चाहिए। मैं सचमुच अन्याय में हूं।’