
यह देश-जीर्ण होती हुई एक फाइल है, जिसे धमिरा ने अपना विश्रामस्थल बना रखा है। धुएं से सनी दराज के अंधेरे कोने में फंसी हुई यह बेवारिस और भूली-बिसरी फाइल पहचान में आना मुश्किल हो गया है। इसके इतिहास-फाइल के पन्नों में उकेरी गई वे प्रतिज्ञाएं हैं, जो धूप न पड़ते ही पीली होकर गिर जाती हैं। इसकी तहों में जमा हुआ घना धूल जनता के आंसुओं का हिसाब छुपाए हुए है।
फाइल के भीतर भ्रष्टाचार का आश्रम जमाया हुआ है – कार्बन पेपर की तरह हजारों प्रतिलिपियां निकाली जा चुकी हैं। यहाँ ऊपर से नीचे तक सभी के हाथ कार्बन के दाग से साफ़ हैं। सुशासन यहां एक भूलभुलैया की तरह है, जिसमें कुछ फाइलें आगे बढ़ती हैं, कुछ खो जाती हैं और बाकी फाइलें ठहरी रहती हैं। नियमों के अक्षर यहां सिसाकलम से लिखे गए हैं। ठेकेदार अपनी जेबें रबर से भरी लेकर चलते हैं।
कुशासन ने हर फाइल को कब्र बना डाला है। न्याय की तलाश में भटकता हुआ इंसान अभी-अभी गिर पड़ा है। गरीबों की शिकायतें और दबे हुए स्वर जीवित दफन हो चुके हैं। मुंशी खजाने पर चढ़कर श्रेष्ठा को संतुष्ट करने में व्यस्त हैं। यह देश-मुख पर ‘अत्यंत जरूरी’ मुहर लगी हुई एक फाइल है, जो ‘पेन्डिंग’ की लंबी कतार में फंसी हुई है।
जहां पढ़े न गए फाइलों के पहाड़ के नीचे देश की तकदीर दब चुकी है। आज आशावान नजरें पूछ रही हैं, क्या कोई है यहां? जो नथी हुई, भीगी और फटी हुई फाइलों के इस अंतहीन सागर से इसे निकाल सके – एक दम घुटता हुआ देश।
